राष्ट्रीय

सेना को राष्ट्रवाद के चश्मे से देखे सियासत

विडंबना यह है कि जब राष्ट्र के असली नायकों का इतिहास पढ़ाया ही नहीं गया, तो युवाओं में राष्ट्रवाद के जज्बात का मिजाज कैसे पैदा होगा। लिहाजा बेहतर होगा यदि जाति-मजहब में उलझी सियासत सेना को राष्ट्रवाद के चश्मे से देखे। कर्नल सोफिया व व्योमिका ताकतवर भारतीय सेना की प्रवक्ता हैं…

हिंदोस्तान की सियासत वर्रे सगीर के दौर में ही जाति व मजहब का शिकार हो चुकी थी। यदि सियासी रहनुमाओं के दिमाग में मजहब का खुमार हावी न होता तो शायद भारत का बटवारा न होता। चूंकि हिंदोस्तान के बटवारे का सबब मजहब बना था। बर्तानिया बादशाही की गुलामी से भारत आजाद हुआ। मगर वोट बैंक की सियासत के चलते भारत का जम्हूरी निजाम दोबारा जाति, मजहब का गुलाम हो गया। देश में किसी भी संवेदनशील मुद्दे को जाति-मजहब के नजरिए तथा सियासी चश्मे से ही देखा जाता है। पाकिस्तान के लिए छह मई 2025 की रात शब-ए-कयामत साबित हो चुकी थी। पहलगाम आतंकी हमले के रद्देअमल में सेना ने ‘आपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान के कई आतंकी अड्डों को खाक में मिला दिया। परमाणु हमले की गीदड़ भभकी देने वाले पाक हुक्मरान आतंकियों की लाशों पर मातम मनाकर भारतीय हमलों को रुकवाने के लिए अमरीका से गुहार लगा रहे थे। भारतीय सेना सरहदों पर पाक को मुंहतोड़ जवाब दे रही थी। सेना की प्रवक्ता कर्नल ‘सोफिया कुरैशी’ व विंग कमांडर ‘व्योमिका सिंह’ सात मई से आपरेशन सिंदूर की जानकारी मीडिया को दे रही थीं। लेकिन हैरत की बात है कि देश के कई सियासी रहनुमां मीडिया से मुखातिब होने वाली सैन्य अधिकारियों की जाति व मजहब को जानने में मशगूल थे।

बेहतर होता यदि आपरेशन सिंदूर के पराक्रम पर सेना के मनोबल को बढ़ाया जाता। सिंतबर 2016 में सेना द्वारा पीओके में आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक के भी सबूत मांगे गए थे। मगर आपरेशन सिंदूर से बौखला कर पाकिस्तान दुनिया को अपनी बर्बादी के सबूत खुद दे रहा है। सेना राष्ट्रवाद की प्रतीक है। विभाजन के वक्त भारतीय सेना भी विभाजित हुई थी। उस वक्त ‘जिन्ना’ के कई प्रलोभनों को ठुकरा कर ‘ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान’ ने भारतीय सेना को चुना था। 22 अक्तूबर 1947 को जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर हमला किया तो उस वक्त सेना की ‘77वीं पैराशूट ब्रिगेड’ के कमांडर के तौर पर उस्मान जम्मू-कश्मीर के नौशेरा में तैनात थे। नौशेरा के नजदीक झांगड़ पर पाक सेना के भीषण हमले को नाकाम करके तीन जुलाई 1948 को मोहम्मद उस्मान ने शहादत को गले लगाकर नौशेरा को बचाया था। अदम्य साहस के लिए ब्रिगेडियर उस्मान को ‘महावीर चक्र’ मरणोपरांत तथा ‘नौशेरा का शेर’ उपमान से सरफराज किया गया था। उस्मान के नमाजे जनाजा में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू शामिल हुए थे। सन् 1962 की भारत-चीन जंग में सेना की ‘प्रथम सिख’ रेजिमेंट के सूबेदार ‘जोगिंद्र सिंह’ ‘परमवीर चक्र’ ने अपने बीस सिख सैनिकों के साथ चीन के सैंकड़ों सैनिकों का मुकाबला करके 23 अक्तूबर 1962 को अरुणाचल के ‘बुमला’ में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। जोगिंद्र सिंह सिख समुदाय से थे। उसी जंग में लद्दाख की ‘चांगला’ पोस्ट पर कई चीनी सैनिकों को हलाक करके 27 अक्तूबर 1962 को बलिदान हुए हिमाचल प्रदेश के शूरवीर ‘स्तेंजिन फुंचोक’ ‘महावीर चक्र’ बौद्ध समुदाय से थे। ‘नूरानांग’ के मोर्चे पर चीनी सेना से लडक़र 17 नवंबर 1962 को बलिदान हुए ‘जसवंत सिंह रावत’ ‘महावीर चक्र’ तथा 18 नवंबर 1962 को ‘रेजांग्ला’ की जंग में सर्वोच्च बलिदान देने वाले मेजर ‘शैतान सिंह भाटी’ ‘परमवीर चक्र’ दोनों शूरवीर राजपूत थे। उन शूरवीरों ने शहादत को गले लगा लिया, मगर मोर्चे से पीछे नहीं हटे। भारत-पाक जंग में सियालकोट सेक्टर में पाक टैंकों को ध्वस्त करके 16 सितंबर 1965 को बलिदान हुए ‘पूना हॉर्स’ के कर्नल ‘अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर’ ‘परमवीर चक्र’ पारसी समुदाय से थे।

पाक सेना को अपने जरनैल ‘अयूब खान’ पर बहुत नाज था। सियालकोट सेक्टर में ही भारतीय सेना की ‘18वीं कैवलरी’ ने जोरदार हमला करके पाक पैटन टैंकों को ध्वस्त किया था। उस हमले में 18वीं कैवलरी के रिसालदार ‘मोहम्मद अयूब खान’ ने अपने टैंक से पाकिस्तान के चार टैंकों को खाक में मिलाया था। उस वक्त देश-दुनिया की अखबारों में छपा था कि भारत के पास भी एक दमदार अयूब खान है। युद्ध में शूरवीरता के लिए भारत के राष्ट्रपति ने अयूब खान को ‘वीर चक्र’ से सरफराज किया तो प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने कहा था, भले ही पाकिस्तान का तानाशाह अयूब खान है, मगर मुझे भारत के अयूब खान पर गर्व है। सेवानिवृत्ति के बाद कैप्टन अयूब खान सन् 1984 तथा 1991 में ‘झुंझनू’ से दो मर्तबा लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने। सन् 1995 में अयूब खान मरकजी हुकूमत में कृषि राज्य मंत्री रहे थे। सन् 1971 में पाकिस्तान के भूगोल की तकसीम के अजीम मुस्सविर जनरल ‘सैम मानेकशॉ’ पारसी थे। पूर्वी कमान के कमांडर ‘जगजीत सिंह अरोड़ा’ सिख थे। जनरल ‘जेएफआर जैकब’ ‘यहूदी’ तथा तेजपुर के कोर कमांडर ‘सगत सिंह राठौर’ राजपूत थे। विभाजन के समय पाकिस्तान का ऑफर ठुकराने वाले मुस्लिम अधिकारी ‘इदरीस हसन लतीफ’ सितंबर 1978 में भारतीय वायुसेना के 10वें एयर चीफ मार्शल बने।

1999 की कारगिल जंग में बटालिक सेक्टर में पाक सैनिकों को हलाक करके बलिदान हुए कैप्टन ‘कीशिंग क्लिफोर्ड नोंगरम’ ईसाई समुदाय से थे। जाति, मजहब अलग होने के बावजूद सैनिकों ने हमेशा राष्ट्र सर्वप्रथम व राष्ट्र सर्वोपरि के आदर्श को अपनाया है। विडंबना यह है कि जब राष्ट्र के असली नायकों का इतिहास पढ़ाया ही नहीं गया, तो युवाओं में राष्ट्रवाद के जज्बात का मिजाज कैसे पैदा होगा। लिहाजा बेहतर होगा यदि जाति-मजहब में उलझी सियासत सेना को राष्ट्रवाद के चश्मे से देखे। कर्नल सोफिया कुरैशी व व्योमिका सिंह दुनिया की चौथी ताकतवर भारतीय सेना की प्रवक्ता हैं। आपरेशन सिंदूर में थलसेना, वायुसेना व नौसेना की सैंकड़ों महिला सैनिकों ने भी पाकिस्तान के खिलाफ मोर्चा संभाला था। अत: राष्ट्रधर्म निभाने वाली सेना का सम्मान पूरी अकीदत से होना चाहिए। हर सैनिक राष्ट्र के प्रति फिदा-ए-वतन का जज्बा रखता है। इसीलिए दुश्मनों से घिरा भारत महफूज है। काश वतनपरस्ती की यह तहजीब सियासत में भी होती।

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