संपादकीय

बेमानी है सुरक्षा परिषद

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से भी पाकिस्तान खाली हाथ लौटा। वह यह राहत महसूस कर रहा होगा कि सुरक्षा परिषद में उसके खिलाफ न तो बयान जारी किया गया और न ही कोई प्रस्ताव पारित किया गया। यह तसल्ली होगी कि कश्मीर का मुद्दा आज भी जिंदा है और उसका अंतरराष्ट्रीयकरण किया जा सकता है। पाकिस्तान के आग्रह पर ही सुरक्षा परिषद के मई महीने के अध्यक्ष यूनान ने बैठक जरूर बुलाई और वह भी बंद कमरे में आयोजित की गई, लेकिन सारांशत: वह बैठक बेमानी ही रही। सुरक्षा परिषद की ओर से न तो कोई बयान जारी किया गया और न ही कोई प्रस्ताव पारित किया गया। पाकिस्तान भी 15 सदस्यीय शक्तिशाली सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य है। उसी लिहाज से भारत-पाक के तनाव और युद्ध सरीखे हालात के मद्देनजर बैठक बुलाई गई। पाकिस्तान से सख्त सवाल भी किए गए। उसके ‘आतंकवादी चरित्र’ पर सवालों के साथ टिप्पणियां भी की गईं। यहां तक कहा गया कि पाकिस्तान ने युद्ध के हालात पैदा किए हैं। उसके मंत्रियों और फौजी जनरलों ने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की बार-बार धमकियां भी दीं। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय परमाणु नियंत्रण नियमों से बंधा और प्रतिबद्ध है। तनाव की स्थितियों में ही पाकिस्तान ने दो मिसाइलों का परीक्षण कर युद्ध को भडक़ाने का काम किया है। धार्मिक आस्था के आधार पर पहलगाम नरसंहार की निंदा तो की गई, चिंता भी जताई गई, लेकिन पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के अंतर्संबंधों पर सवाल पूछने के अलावा कुछ ठोस नहीं किया गया। यह सुरक्षा परिषद की गरिमा, शक्ति, विश्वसनीयता पर ही सवाल है कि संयुक्त राष्ट्र का औचित्य ही क्या है? सुरक्षा परिषद में महाशक्तियां भी मौजूद थीं।

उनमें से 13 देशों ने भारत की ‘आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई’ का भरपूर समर्थन किया है, लेकिन वे भारत की विनम्रता, शांतिप्रियता, क्षेत्रीय स्थिरता की दलीलें देते रहे। आतंकियों ने कश्मीर के पहलगाम में 28 मासूम और बेकसूर सैलानियों का कत्लेआम कर दिया, उस पर पाकिस्तान और आतंकी संगठनों की जवाबदेही तय करने का निर्णय नहीं लिया गया। आखिर भारत कब तक ऐसे वहशियाना हमले स्वीकार और झेलता रहेगा? बैठक में उपदेश दिए जाते रहे कि भारत युद्ध न करे। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव गुटेरस ने कहा कि भारत-पाक का टकराव ‘आउट ऑफ कंट्रोल’ हो सकता है। दोनों देश संयम बरतें और आपस में विवादों को सुलझाएं। गुटेरस की मध्यस्थता की पेशकश किसी भी देश ने स्वीकार नहीं की, लिहाजा उस पर भी कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया जा सका। यकीनन भारत और पाकिस्तान में युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। भारत ने कूटनीतिक, आर्थिक, समुद्री बंदरगाह संबंधी और सिंधु जल संधि के प्रतिबंध पाकिस्तान पर थोपे हैं, उसके बावजूद लड़ाकू विमानों की गर्जनाएं सुनाई दे रही हैं और 244 जिलों में ‘मॉक ड्रिल’ के जरिए आम नागरिक को युद्ध के दौरान सुरक्षा के सबक सिखाए गए हैं। सवाल है कि सुरक्षा परिषद के सभी सदस्य-देश जानते हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद का ‘छाया-युद्ध’ बीते 30-35 सालों से भारत में जारी रखे है, लेकिन सुरक्षा परिषद बेजुबां और बेनतीजा रही है। क्या उसे बेमानी मान लिया जाए? युद्धों के कई उदाहरण हमारे सामने हैं। विध्वंस जारी हैं, मानवता के कत्लेआम किए जा रहे हैं, असंख्य लोग विस्थापित होकर शरणार्थी बन चुके हैं, भुखमरी के चौतरफा हालात हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद कोई प्रभावशाली भूमिका नहीं निभा सकी है। अब भारत-पाक का तनाव सामने है। अब महाशक्तियों को सीमापार युद्ध को मान्यता देनी चाहिए। पाकिस्तान को जिम्मेदार और जवाबदेह करार दें और उस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएं। पाकिस्तान को एक ‘गैर-जिम्मेदार देश’ घोषित किया जाए। यह भी स्वीकार किया जाए कि उसकी फौज आतंकवाद का सहारा लेती है।

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