शाहबानो का दूसरा किस्सा, प्रसन्न हैं मुस्लिम महिलाएं

औरतों के मामले में अरबी समाज के इस सामाजिक व्यवहार की कुछ व्यवस्थाएं तो अमानवीय या अंधकारयुगीन ही कही जा सकती हैं। मसलन तलाक और हलाला। शरीयत में पुरुष जब चाहे तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण करके अपनी विवाहिता पत्नी को छोड़ सकता है।
कुछ को डर है कि तलाकशुदा औरत को पूर्व पति द्वारा चार पैसे गुजारे के लिए देते रहने से इस्लाम ही खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाएं प्रसन्न हैं क्योंकि उनको यकीन है कि इस वक्त देश की सरकार उनके साथ खड़ी है। वह उन्हें धोखा नहीं देगी। वह अपने राजनीतिक फायदे के लिए मुल्ला मौलवियों के आगे बिक नहीं जाएगी। अब केवल हलाला का नर्क बचा है। भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाओं को इस नर्क से निकलने के लिए लडऩा है…
अरबों में सामाजिक व्यवहार और सामाजिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए कुछ विधि विधान हैं। ऐसे विधि विधान प्राय: हर समाज में होते हैं। अरब के ये विधि विधान वहां इस्लाम पंथ के उदय के बाद ही विकसित हुए। इस्लाम के आगमन से पहले भी वहां सामाजिक व्यवस्था के लिए नियम-उप नियम रहे होंगे, लेकिन इस्लाम के उदय के बाद वे सभी समाप्त हो गए और नए विधि-विधानों ने जन्म लिया। बाद में जब अरबों ने अन्य देशों को जीत कर वहां के लोगों को भी मतान्तरित कर लिया, तो उन देशों में भी अरबी समाज के ये सभी विधि-विधान लागू कर दिए। सामाजिक विधि-विधान के इन नियमों को फारसी में शरीयत कहा जाता है। वैसे तो दुनिया के सभी समुदायों में सामाजिक व्यवस्था के लिए ये विधि-विधान होते ही हैं, लेकिन वहां ये विधि-विधान समय और स्थान की जरूरत के हिसाब से बदलते या संशोधित होते रहते हैं। लेकिन शरीयत के मामले में ऐसा नहीं है। उसमें जड़ता है। परिवर्तन की गुंजाइश ही नहीं है। बाबा साहेब अंबेडकर ने भी इसका उल्लेख किया है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि अरबों ने अपनी इस शरिया को लागू करने का जिम्मा मुल्ला मौलवियों को दे दिया है। उन्होंने इसे मजहब का ही हिस्सा घोषित कर दिया है। शरीयत के मजहब का हिस्सा बन जाने के कारण उसमें मनुष्य की दखलअंदाजी के रास्ते बंद कर दिए जाते हैं। भारत का सामाजिक व्यवहार और सामाजिक व्यवस्था अरबों की सामाजिक व्यवस्था से भिन्न है। लेकिन इस्लाम के मुल्ला मौलवी शरीयत के नाम पर अरब की सामाजिक व्यवस्था भारत के देसी मुसलमानों (डीएम) पर भी लाद रहे हैं। जाहिर है भारत का देसी मुसलमान इसमें घुटन महसूस करता है।
जब वह शरीयत की बजाय अपने देश की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार चलने की कोशिश करता है तो यही मुल्ला मौलवी उसे खुदा के नाम पर डराते हैं। यह संकट उन भारतीय स्त्रियों पर सबसे ज्यादा है जिनके पूर्वज कभी किसी कारण से इस्लाम पंथ में मतांतरित हो गए थे। औरतों के मामले में अरबी समाज के इस सामाजिक व्यवहार की कुछ व्यवस्थाएं तो अमानवीय या अंधकारयुगीन ही कही जा सकती हैं। मसलन तलाक और हलाला। शरीयत में पुरुष जब चाहे तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण करके अपनी विवाहिता पत्नी को छोड़ सकता है। जब से तकनीकी युग ने पदार्पण किया है, तब से यह तलाक महिलाओं तक मोबाईल से भी पहुंचने लगा है। इससे वे शादीशुदा भारतीय महिलाएं, जिनके पूर्वजों ने कभी इस्लाम पंथ को स्वीकार लिया था, निरंतर भय में जीती हैं। ताज्जुब का विषय है कि इन भारतीय महिलाओं के जीवन को विदेशी मूल के मुल्ला मौलवी अभी भी नियंत्रित कर रहे हैं। लेकिन भारत सरकार ने साहस दिखाते हुए तीन तलाक की इस अरबी प्रथा को भारत में सदा के लिए समाप्त कर दिया। इतना ही नहीं, तीन तलाक के महज उच्चारण से तलाक देने वाले पुरुष को जेल भी जाना पड़ेगा। अब भारत में तीन तलाक की अवधारणा आपराधिक मामलों के अंतर्गत आती है, यह सिविल केस नहीं है। तलाक के लिए पुरुष हो या स्त्री, उसे वही पद्धति अपनाना पड़ेगी जो देश के अन्य नागरिकों के लिए निर्धारित है। इसे लेकर मुल्ला मौलवी बहुत चिल्लाए, अरब मूल के सैयदों ने तो आसमान सिर पर उठा लिया। लेकिन न्यायालय ने इन नए प्रावधानों को उचित ही ठहराया। पर असली सवाल तलाक के बाद का है। यदि किसी भारतीय मुसलमान महिला को देश के कानून के अनुसार ही पुरुष तलाक दे देता है तो उस तलाकशुदा महिला के भरण पोषण की व्यवस्था कैसे होगी। भारत का कानून उसकी व्यवस्था करता है।
पति को अपनी तलाकशुदा पत्नी को उचित गुजारा भत्ता देना होगा। लेकिन शरीयत ऐसा नहीं मानती। इसका शिकार वही भारतीय महिलाएं हो जाती हैं जिनके पुरखों ने कभी अपना भारतीय पंथ छोड़ कर इस्लाम पंथ को अपना लिया था। इन महिलाओं ने विदेशी मूल के मुल्ला मौलवियों को चुनौती देते हुए, अपने बलबूते अपनी लड़ाई लडऩी शुरू की। शाहबानो नाम की एक महिला शरीयत द्वारा थोपे गए इस अन्याय से लड़ते-लड़ते उच्चतम न्यायालय तक की दहलीज तक पहुंच गई। इस मरहले पर भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाओं को लगता था कि यदि मुल्ला मौलवियों से लड़ती हुई वे जीत का मुकाम हासिल कर गईं तो देश की सरकार और देश के लोग उनका साथ जरूर देंगे। यह उसकी शानदार लड़ाई थी। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उसका पुराना पति उसको गुजारा भत्ता दे। यह देश का कानून है। शरीयत की आड़ में आप इससे बच नहीं सकते। शाहबानो जीत गई। यह ऐतिहासिक घटना 1985 की है। उसने अकेले अपने बल पर मुल्ला मौलवियों को धूल चटा दी थी। जीत के इस अवसर पर देश के लोगों ने तो शाहबानो का साथ दिया, लेकिन देश की उस वक्त की सरकार ने भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाओं का साथ देने के स्थान पर चंद वोटों की खातिर मुल्ला मौलवियों का साथ दिया। उस समय की कांग्रेस पार्टी की सरकार ने भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाओं की जीत को पराजय में बदलने के लिए 1986 में ही मुस्लिम वुमैन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डायवोर्स) एक्ट बना कर शाहबानो के नाम पर देश की मुस्लिम महिलाओं के मुंह पर चपत लगा दी। यकीनन यह शरीयत के नाम पर विदेशी मूल के मुल्ला मौलवियों द्वारा भारतीय महिलाओं पर शिकंजा कसे रहने का षड्यंत्र ही था। लेकिन क्या इससे भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाओं ने निराश होकर हार मान ली और अपने आप को शरीयत के हवाले कर दिया? ऐसा नहीं हुआ। वे लड़ती रहीं। अब तक लड़ रही हैं और लड़ते-लड़ते एक बार फिर 2024 में उच्चतम न्यायालय की देहरी तक जा पहुंची। उच्चतम न्यायालय का फैसला फिर वही है। भारत की मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक के बाद पति से गुजारा भत्ता लेने का अधिकार है। मुल्ला मौलवी चिल्लाते रहे। हुज़ूर अब मुस्लिम वुमैन (प्रोटक्शन ऑफ राइट्स ऑन डायवोर्स) एक्ट बना हुआ है। वह शरीयत का ही दूसरा रूप है।
कांग्रेस सरकार ने शरीयत को ही देश का कानून बना दिया था। पति तलाकशुदा औरत को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया। देश का कानून सब पर एक समान लागू होगा। गुजारा भत्ता देना ही होगा। मुल्ला मौलवियों के मोहल्ले में रोना धोना जारी है। कुछ धमकियों पर उतर आए हैं। कुछ को डर है कि तलाकशुदा औरत को पूर्व पति द्वारा चार पैसे गुजारे के लिए देते रहने से इस्लाम ही खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाएं प्रसन्न हैं क्योंकि उनको यकीन है कि इस वक्त देश की सरकार उनके साथ खड़ी है। वह उन्हें धोखा नहीं देगी। वह अपने राजनीतिक फायदे के लिए मुल्ला मौलवियों के आगे बिक नहीं जाएगी। अब केवल हलाला का नर्क बचा है। भारतीय मूल की मुस्लिम महिलाओं को इस नर्क से निकलने के लिए लडऩा है। एक मरहले पर उन्होंने लड़ाई जीत ली है। यकीन करना चाहिए कि दूसरे मरहले पर भी वे जीतेंगी। उनका केवल यही कहना है कि देश की सरकार उन्हें धोखा न दे। तब तक मुल्ला-मौलवियों का लाईव रुदन कार्यक्रम देखते रहिए। मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार मिला है।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री



