SCO Summit 2025 Message: दुनिया बदल गई… 2 तस्वीरें गवाह, अमेरिका की दादागिरी अब कोई मानने वाला नहीं

तिआनजिन में हुए एससीओ सम्मेलन में शी जिनपिंग, नरेंद्र मोदी, व्लादिमीर पुतिन समेत दर्जनों देशों के नेता शामिल हुए, जिससे पश्चिमी देशों की दादागिरी को चुनौती मिली है.
चीन के उत्तरी शहर तिआनजिन में हो रहा शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का शिखर सम्मेलन इस बार पूरी दुनिया के लिए बड़ा संदेश लेकर आया है. 2024 में अस्ताना में हुई समिट और 2025 की तिआनजिन समिट की तस्वीरों को साथ रखकर देखिए, फर्क खुद दिख जाएगा. एक साल पहले मंच पर कुछ गिने-चुने चेहरे थे, लेकिन इस बार मंच पर इतनी भीड़ थी कि तस्वीर में दुनिया का नक्शा समा गया. यही वजह है कि इसे अब तक का सबसे पावरफुल एससीओ सम्मेलन कहा जा रहा है.
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफ कहा कि एससीओ पर क्षेत्रीय शांति और स्थिरता की बड़ी जिम्मेदारी है. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत दुनिया भर के नेताओं को संदेश दिया कि अब ताकत सिर्फ पश्चिम या अमेरिका के हाथ में नहीं रहेगी. शी जिनपिंग का बयान सीधे-सीधे अमेरिका और पश्चिमी देशों की उस सोच को चुनौती थी जिसमें वे खुद को दुनिया का इकलौता नेता मानते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ने इस समिट की अहमियत और बढ़ा दी है. 2024 और 2025 की इन दो तस्वीरों ने दुनिया को बता दिया है कि समय बदल रहा है और अमेरिका की दादागिरी मानने वाला अब कोई नहीं.
2024 बनाम 2025 तस्वीर के 5 फर्क
- 2024 की अस्ताना समिट की तस्वीर देखें तो मंच पर कुछ ही नेता नजर आते हैं. सम्मेलन छोटा और सीमित था. तिआनजिन 2025 की तस्वीर में पूरा माहौल बदल चुका है. मंच पर इतनी भीड़ है कि यह खुद अपने आप में संदेश है.
- इस बार पुतिन हैं तो पीएम मोदी भी. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ हैं तो ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन भी. बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको, कजाखस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्त टोकायव, किर्गिस्तान के राष्ट्रपति सादिर जापारोव, तजाकिस्तान के राष्ट्रपति इमोमाली रहमान, उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव शामिल हैं.
- मंगोलिया, नेपाल, मालदीव, मिस्र, म्यांमार, तुर्की, अजरबैजान, आर्मेनिया, कंबोडिया के प्रतिनिधि स्तर के नेता हैं. इतना ही नहीं,इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, वियतनाम और तुर्कमेनिस्तान के लीडर्स भी आए हैं.
- दर्जनों नेता, दर्जनों संस्कृतियां और अलग-अलग क्षेत्रीय हितों की मौजूदगी इस सम्मेलन की ताकत बयान करती है. यही वजह है कि इसे अब तक का सबसे पावरफुल एससीओ कहा जा रहा है. यह बदलाव बताता है कि एससीओ अब पश्चिमी संगठनों जैसे G7 या NATO की बराबरी करने की दिशा में बढ़ रहा है.
- एक साल पहले अमेरिका और पश्चिम की दादागिरी बिना किसी चुनौती के चल रही थी. लेकिन आज हालात बदल चुके हैं. एशिया और उसके साझेदार देशों ने दुनिया को बता दिया है कि अब एक नई व्यवस्था आ रही है.
चीन-भारत-रूस का शक्ति प्रदर्शन
यह सम्मेलन सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन भी है. रूस-यूक्रेन युद्ध ने पश्चिम और रूस को अलग-अलग खेमों में बांट दिया है. चीन और अमेरिका के बीच तनाव चरम पर है. भारत और अमेरिका के बीच भी हाल ही में व्यापारिक मतभेद गहराए हैं. ऐसे माहौल में जब इतने सारे देश एक साथ खड़े होते हैं तो संदेश साफ होता है कि दुनिया बदल रही है और पश्चिम की दादागिरी अब नहीं चलेगी. शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन पहले से ही अमेरिका को चुनौती दे रहे हैं। अब भारत जैसे बड़े लोकतांत्रिक देश का इस मंच पर सक्रिय होना पश्चिमी देशों के लिए बड़ा संकेत है कि एशिया अपने तरीके से दुनिया को दिशा देना चाहता है.
छोटे देशों की बड़ी भूमिका
यह सम्मेलन छोटे और मध्यम आकार के देशों के लिए भी मंच बन गया है. नेपाल, मालदीव, मिस्र और म्यांमार जैसे देशों के नेताओं की मौजूदगी बताती है कि अब वे भी पश्चिम पर निर्भर रहने के बजाय नए विकल्प तलाश रहे हैं. भारत और चीन जैसे देशों के साथ खड़े होकर ये देश अपने विकास और सुरक्षा की नई राह देख रहे हैं.



