संपादकीय

बेटी बचाओ

ग्रेटर नोएडा के निक्की भाटी हत्याकांड को केवल एक अकेली घटना की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। सिस्टम पर सवाल के साथ ही यह उस समाज को भी आईना दिखाता है, जहां शादियों में दहेज का लेनदेन अब भी सामान्य है। यह हाल तब है, जबकि लंबे समय से देश में दहेज विरोधी कानून लागू है।

सामाजिक दबाव: निक्की और उसकी बहन की शादी साल 2016 में एक ही घर में हुई थी और तब से दोनों को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। सोचने वाली बात है कि परिवार को बेटियों के उत्पीड़न की जानकारी थी। इसके बावजूद उन्होंने जितना संभव था, उस हद तक जाकर ससुरालवालों के लालच को पूरा किया, इसकी वजह? समाज का वह अनदेखा दबाव जो कहता है कि बेटियां एक बार ससुराल चली गईं, तो वहीं की हो जाती हैं। इसी कथित सामाजिक मान-सम्मान की चिंता और बेटियों का घर कहीं टूट न जाए – इस आशंका ने निक्की को नरक जैसा जीवन झेलने पर मजबूर किया।

हजारों में केस: निक्की पर हुए अत्याचार की कहानी विडियो फुटेज के रूप में सामने है, लेकिन सच यह भी है कि देश में दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के कितने ही मामले सामने नहीं आ पाते – या फिर वे उन छोटे कस्बों और शहरों के होते हैं, जहां नजर नहीं जाती। दहेज उत्पीड़न और हत्या पर नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के सबसे हालिया आंकड़े भी 2022 के हैं। ये बताते हैं कि उस साल दहेज हत्या के 6,450 केस दर्ज किए गए थे। इसके पहले जाएं, तो 2020 में 6966 और 2021 में लगभग 6700 केस थे।

सजा की कम दर: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80 में दहेज हत्या के लिए न्यूनतम 7 साल से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान है। इसके बाद भी मामले रुक नहीं रहे, क्योंकि न्याय मिलने की रफ्तार धीमी और दर बहुत कम है। चार्जशीट दाखिल करने में देरी, मुकदमों का लंबा खिंचना, पीड़ित परिवार पर अदालत के बाहर ही समझौता करने का दबाव जैसे कई फैक्टर हैं, जिनकी वजह से इंसाफ नहीं मिल पाता। NCRB के ही डेटा के मुताबिक, 2022 में जितने केस पेंडिंग थे, उन सबको मिलाकर सजा की दर केवल 2% रही।

तेज हो जांच: बेटियों को सशक्त बनाने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही हैं, लेकिन जब तक उन पर होने वाले अत्याचार को रोका नहीं जाता, निक्की जैसे मामले नहीं रुकेंगे। जरूरत है तेज और निष्पक्ष जांच के बाद इंसाफ की।

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