संपादकीय

सैनी की ताजपोशी,अति-आत्मविश्वास से सावधान रहने की जरूरत

निस्संदेह, नायब सिंह सैनी, जिनको पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल की छाया में गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था, लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी ने पिछली बार से अधिक सीटें लेकर पूर्ण बहुमत से सरकार बनायी है। मगर जिस चीज से नायब सिंह सैनी को सावधान रहने की जरूरत है, वह है अति-आत्मविश्वास। भले ही यह अप्रत्याशित हो, लेकिन यह एक टकसाली हकीकत है कि हरियाणा में भाजपा को तीसरे कार्यकाल के लिये स्पष्ट जनादेश मिला है। हो सकता है पार्टी यह कहे कि यह निर्णायक जनादेश भाजपा के शासन मॉडल के प्रति विश्वास मत के रूप में अभिव्यक्त हुआ है, लेकिन इसके बावजूद जरूरत इस बात की है कि उन मुद्दों पर मंथन किया जाए जिनको लेकर चुनाव के दौरान जनता में असहजता थी। निस्संदेह, नायब सिंह सैनी, जिनको पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल की छाया में गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था, लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी ने पिछली बार से अधिक सीटें लेकर पूर्ण बहुमत से सरकार बनायी है। मगर जिस चीज से नायब सिंह सैनी को सावधान रहने की जरूरत है, वह है अति-आत्मविश्वास। हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने अति-आत्मविश्वास की कीमत चुकाई है। निस्संदेह, सैनी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार के पास हरियाणा में आधारभूत बदलाव से जनाकांक्षाओं को हकीकत में बदलने का सुनहरा मौका है। उन्हें पूर्ण बहुमत वाली सरकार के रूप में जनाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिये कृतसंकल्प होने की जरूरत है। दरअसल, चुनावी राजनीति में जनता के दरबार में उछले विपक्षी नेताओं के आरोप कई बार सत्तापक्ष को आत्मविश्लेषण का मौका भी देते हैं। चुनावी माहौल में जहां विपक्षी दल सत्ता पक्ष की रीतियों-नीतियों को लेकर मुखर होते हैं,वहीं ऐसे मौके पर जनता की अभिव्यक्ति का भी अहसास होता है। भाजपा जैसे कुशल संगठन वाली कैडर आधारित पार्टी से उम्मीद की जाती है कि जिस तरह उसने चुनावों में माइक्रो मैनेजमेंट किया, उसी तरह उसकी सरकार से भी उम्मीद की जाती है कि वह समस्याओं को भी बेहद करीब से सूक्ष्म स्तर पर महसूस करेगी। बहरहाल, भाजपा की इस जीत ने एक संदेश यह भी दिया है कि महज सत्ताविरोधी रुझान ही चुनाव परिणामों की दिशा-दशा तय नहीं करते। बदलाव की आकांक्षा को सुशासन व बेहतर प्रबंधन के मुद्दे भी गहरे तक प्रभावित करते हैं।

निश्चित रूप से मुख्यमंत्री की दूसरी पारी में कार्यभार संभालने वाले नायाब सिंह सैनी की सरकार पर जनाकांक्षाओं का भारी दबाव होगा। उनका प्राथमिक उद्देश्य जनता से किये गए वायदों और उनके क्रियान्वयन होगा, जिससे जनता सुशासन की उपलब्धि महसूस कर सके। निश्चित रूप से किसी योजना की सार्थकता इस बात पर निर्भर करती है कि जनता उससे किस हद तक लाभान्वित महसूस करती है। कई बार व्यवस्था की विसंगति इस मार्ग में बाधक बन जाती हैं। इसके लिये आश्वासन व क्रियान्वयन में साम्य जरूरी हो जाता है। निस्संदेह, पिछले मार्च में जब सैनी ने अपने गुरु मनोहर लाल खट्टर की छत्रछाया में सरकार का दायित्व हासिल किया था तो उन्हें राजनीतिक हलकों में गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन उन्होंने पिछले विधानसभा चुनावों में न केवल खुद को साबित किया बल्कि राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। निस्संदेह, हरियाणा के इस नये जनादेश के दूरगामी परिणाम होंगे। इतना ही नहीं इस जीत ने भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व में भी एक नया उत्साह भर दिया। यह उत्साह महाराष्ट्र व झारखंड के चुनाव अभियान में भी नजर आ रहा है। निश्चित रूप से इन चुनावों ने मुख्यमंत्री के रूप में नायब सिंह सैनी का राजनीतिक कद बढ़ाया है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से भी उन्हें सकारात्मक प्रतिसाद व संबल मिला है। वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं तो उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। उन्हें क्षेत्र व जाति की सीमाओं से परे ‘सबका साथ, सबका विकास’ का लक्ष्य हासिल करना है। उनके लिये यह सुखद है कि जहां राज्य में उन्हें पिछली बार के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलने से पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है,वहीं केंद्र से भी उन्हें भरपूर समर्थन मिल रहा है। निस्संदेह, उन्हें ‘डबल इंजन की सरकार’ के मुहावरे को साकार करने का अवसर मिला है। जरूरत इस बात की कि वे पूर्व सरकार के मुखिया की छाया से निकलकर शासन की नई सर्व स्वीकार्य दिशा तय करें। वे महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम नजर आएं, जिससे राज्य में सरकार की स्वीकार्यता बढ़ सके। जिसमें पार्टी के वरिष्ठ विधायकों का अनुभव व कनिष्ठ विधायकों की ऊर्जा मददगार होगी।

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