संपादकीय

‘आरएसएस की ‘आर्गेनाइजर’ ने’ ‘समझाया भाजपा नेतृत्व को!’

लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ ने अतिआत्मविश्वास और अहंकार को दोषी ठहराया है। अहंकार कहना इसलिए सही है, क्यों कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने चुनाव के दौरान यह कहा था कि भाजपा में इतने अधिक कार्यकर्ता हो गए हैं कि अब पार्टी को आरएसएस कार्यकर्ताओं से सहयोग लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इन्ही सब बातों को ध्यान में रखते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इशारों इशारों में भाजपा नेताओं को आड़े हाथों लिया था।

लोकसभा चुनावों में ‘अब की बार 400 पार’ का नारा लगाने वाली भाजपा अपने बूते पर बहुमत का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई और सहयोगी दलों की सहायता से ही गठबंधन सरकार बना पाई है। तभी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत सहित संघ के अन्य नेताओं द्वारा भाजपा की खामियों का विश्लेषण किया जा रहा है। जहां मोहन भागवत ने कहा कि सेवक को अहंकार नहीं करना चाहिए, वहीं ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की पत्रिका ‘आर्गेनाइजर’ में प्रकाशित एक लेख में ‘संघ’ के आजीवन सदस्य रतन शारदा ने भाजपा के खराब प्रदर्शन के लिए अनावश्यक राजनीति को भी एक कारण बताते हुए कहा था कि : 

‘‘चुनाव के नतीजे भाजपा के अति आत्मविश्वासी कार्यकत्र्ताओं व कई नेताओं का सच से सामना करानेे वाले हैं जो प्रधानमंत्री के आभामंडल के आनंद में डूबे रह गए। उन्होंने आम जन की आवाज को अनदेखा कर दिया और ‘संघ’ के कार्यकत्र्ताओं से सहयोग तक नहीं मांगा।’’ ‘‘संघ को आतंकवादी संगठन बताने वाले कांग्रेसियों को भाजपा में शामिल करने जैसे फैसलों ने भाजपा की छवि को खराब किया और संघ से हमदर्दी रखने वालों को भी ठेस पहुंची।’’ इसके बाद संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने 14 जून को कहा था कि ‘‘राम सबके साथ न्याय करते हैं। जिन्होंने राम की भक्ति की परंतु उनमें धीरे-धीरे अहंकार आ गया। उस पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी घोषित कर दिया। उनको जो पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए, जो शक्ति मिलनी चाहिए, वह भगवान ने अहंकार के कारण रोक दी।’’

और अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित मराठी साप्ताहिक ‘विवेक’ में प्रकाशित एक लेख ‘कार्यकत्र्ता हतोत्साहित नहीं परंतु भ्रमित’ में महाराष्ट्र के चुनावों में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन के लिए पार्टी के नेताओं, इसके कार्यकत्र्ताओं और राजग सरकार के बीच संवाद के अभाव तथा अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा के साथ गठबंधन को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा है कि : 

 ‘‘प्रत्येक (भाजपा) कार्यकत्र्ता महाराष्ट्र में लोकसभा चुनावों में विफलता के लिए राकांपा के साथ गठबंधन को जिम्मेदार मानता है। भाजपा कार्यकत्र्ताओं ने पार्टी का राकांपा से हाथ मिलाना पसंद नहीं किया।’’
‘‘शिव सेना (उद्धव ठाकरे) हिन्दुत्व आधारित होने के कारण भाजपा की स्वाभाविक सहयोगी थी जिसे मतदाताओं ने स्वीकार किया था परंतु राकांपा के साथ गठबंधन ने उस भावना को बदल दिया तथा जन भावनाएं पूरी तरह भाजपा के विरुद्ध हो गईं। (पार्टी में) असंतोष पैदा हुआ जो लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद और बढ़ गया।’’

‘‘भाजपा के कार्यकत्र्ता राकांपा से हाथ मिलाने के फैसले से सहमत नहीं थे और पार्टी के कायकत्र्ताओं के असंतोष को कम करके आंका गया।’’
‘‘भाजपा ही एकमात्र पार्टी है जो कार्यकत्र्ताओं को नेता बनाती है। इसी तरीके से पार्टी को अटल बिहारी वाजपेयी, प्रमोद महाजन व नितिन गडकरी जैसे नेता मिले, परंतु अब पार्टी के कार्यकत्र्ता महसूस करने लगे हैं कि इस परम्परा को पलट दिया गया है। विपक्ष ने यह धारणा कायम करने में सफलता पाई कि भाजपा में मूल कार्यकत्र्ता हमेशा निचली पायदान पर रहेंगे और दलबदलुओं को बड़े पद मिलेंगे।’’
लेख में विपक्ष द्वारा भाजपा के विरुद्ध ‘वाशिंग मशीन’ वाले तंज का भी उल्लेख किया गया और इस पर भी प्रश्न उठाया गया है कि क्या भाजपा द्वारा एमरजैंसी के विरुद्ध संघर्ष और राम मंदिर आंदोलन में दी गई कुर्बानियों के प्रचार का  इस वर्ष के अंत में होने वाले राज्य विधानसभाओं के चुनावों में युवा मतदाताओं पर कोई प्रभाव पड़ेगा? 

उल्लेखनीय है कि भाजपा ने महाराष्ट्र में राकांपा तथा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिव सेना के साथ गठबंधन करके (48 सीटों पर) चुनाव लड़ा था परंतु केवल 9 सीटें ही जीत पाई, जबकि 2019 के चुनावों में इसने 23 सीटें जीती थीं। मोहन भागवत, रतन शारदा और इंद्रेश कुमार के बाद अब संघ की पत्रिका ‘विवेक’ में प्रकाशित लेख पर कोई टिप्पणी न करते हुए हम इतना ही कहना चाहेंगे कि इन सभी बातों पर भाजपा नेतृत्व को विचार करके इनके द्वारा व्यक्त की गई खामियों को दूर करना चाहिए ताकि केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों में भी, जहां निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं, पार्टी की स्थिति मजबूत हो सके।

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