संपादकीय

रिजर्व बैंक को महंगाई की फिक्र

यह एक हकीकत है कि जहां दुनिया के अन्य विकसित देश मंदी के संकट से जूझ रहे हैं, भारत मंदी के दुष्प्रभाव से अर्थव्यवस्था को बचा पाया है। निस्संदेह, हमारी मौद्रिक नीतियां आर्थिकी को स्थायित्व प्रदान करने में किसी हद तक सफल रही हैं। यही वजह है कि संवेदनशील आर्थिकी के वैश्विक परिदृश्य में केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीतियों में बदलाव से परहेज किया है। निस्संदेह, भारत इस समय दुनिया में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। इस स्थिति को बनाए रखने के लिये खासी सावधानी भी जरूरी है। लेकिन ऊंची रेपो दर का नुकसान देश के उन उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है.

ऐसे वक्त में जब भारतीय बाजार त्योहार की रंगत में रंगने लगे हैं और कारोबारियों को बेहतर कारोबार की उम्मीद है, भारतीय रिजर्व बैंक महंगाई को लेकर फिक्रमंद है। उसे चिंता है कि महंगाई बढ़ी तो त्योहार की रौनक प्रभावित हो सकती है। तभी मौद्रिक नीति की घोषणा करते वक्त केंद्रीय बैंक ने रेपो दर को यथावत बनाये रखा है। बहरहाल, ये आने वाला वक्त बताएगा कि रिजर्व बैंक किस हद तक महंगाई पर नियंत्रण रखने में सफल हो पाता है। दरअसल, केंद्रीय बैंक का लक्ष्य है कि महंगाई की दर को चार फीसदी से नीचे रखी जाए। चिंता जतायी जा रही है कि आने वाले दो वर्ष में यह दर चार फीसदी से ऊपर रह सकती है। जब दो साल पहले खुदरा महंगाई की दर सात फीसदी के करीब पहुंच गई थी तो केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक उपायों से महंगाई पर काबू पाने का प्रयास किया। बैंक ने धीरे-धीरे रेपो दर में वृद्धि की थी। फिलहाल छह बार की बढ़ोतरी से फिलहाल इस दर में करीब ढाई फीसदी की वृद्धि हो चुकी है। अब महंगाई बढ़ने की फिक्र में केंद्रीय बैंक ने दसवीं बार रेपो दर को यथावत रखा है। जो फिलहाल साढ़े छह फीसदी है। दरअसल, बैंक का आकलन है कि आने वाले दो वर्षों में महंगाई की दर चार फीसदी से ऊपर रह सकती है। केंद्रीय बैंक यदि उद्यमियों के दबाव के बावजूद बैंक दरों में कमी नहीं कर रहा है तो उसकी वजह महंगाई की फिक्र में थमे कदम हैं। बैंक का आकलन है कि यदि हम महंगाई की दर को अपने लक्ष्य चार फीसदी से कम लाने में कामयाब हो जाते हैं तो देश की विकास दर के ऊंचे लक्ष्य हासिल किये जा सकते हैं। इतना ही नहीं, विकास दर दो अंकों का आंकड़ा छू सकती है। वैसे जिस तरह कोविड संकट से उबरती दुनिया को रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिम एशिया के संकट से जूझना पड़ रहा है, भारत उससे अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने में कामयाब रहा है।

यह एक हकीकत है कि जहां दुनिया के अन्य विकसित देश मंदी के संकट से जूझ रहे हैं, भारत मंदी के दुष्प्रभाव से अर्थव्यवस्था को बचा पाया है। निस्संदेह, हमारी मौद्रिक नीतियां आर्थिकी को स्थायित्व प्रदान करने में किसी हद तक सफल रही हैं। यही वजह है कि संवेदनशील आर्थिकी के वैश्विक परिदृश्य में केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीतियों में बदलाव से परहेज किया है। निस्संदेह, भारत इस समय दुनिया में तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। इस स्थिति को बनाए रखने के लिये खासी सावधानी भी जरूरी है। लेकिन ऊंची रेपो दर का नुकसान देश के उन उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है, जो घर-वाहन लोन की ईएमआई कम होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। हालांकि, देश के बुजुर्गों को बचत खाते में अधिक ब्याज मिलने से लाभ जरूर हो रहा है। लेकिन महंगाई का प्रभाव तो समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है। वहीं थोक व फुटकर की महंगाई के आंकड़े भले ही इसके कम होने की बात कर रहे हों, लेकिन व्यवहार में फल-सब्जी व खाद्य पदार्थों की महंगाई उपभोक्ताओं के बजट को प्रभावित कर रही है। दूसरी ओर कर्ज लेने वाले लोगों को बढ़ी किस्तें भी परेशान कर रही हैं। कारोबारी और कामकाजी लोग काफी समय से आस लगाए बैठे थे कि यदि रिजर्व बैंक रेपो दरों में कुछ कमी करता है तो ऋण सस्ते होने से उनके कर्ज की किस्त कुछ हल्की हो जाएगी। लेकिन महंगाई की चिंता कर रहा केंद्रीय बैंक ऐसे किसी कदम को उठाने से परहेज कर रहा है। लेकिन एक बात तो तय है कि महंगाई दर में कमी के दावों का अहसास आम आदमी को भी होना चाहिए। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि महंगाई के आंकड़ों पर काबू पाने का वास्तविक लाभ आम उपभोक्ता को कैसे और कब मिलेगा। कोशिश की जानी चाहिए कि त्योहार के मौसम में आम आदमी को दैनिक उपभोग की वस्तुएं मसलन खाद्यान्न, सब्जी-फल, डेरी उत्पाद व खाद्य तेल वाजिब दामों में मिले। तभी महंगाई पर नियंत्रण के सरकारी दावे सिरे चढ़ सकेंगे।

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