संपादकीय

संघ के संस्कारों का सवाल…

यह आरएसएस का शताब्दी-वर्ष है। करीब 24 साल बाद भारत के प्रधानमंत्री संघ मुख्यालय गए। पहले वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संघ मुख्यालय गए थे। अब मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी नागपुर मुख्यालय गए। भाजपा के दोनों ही प्रधानमंत्री आरएसएस प्रचारक थे, उनकी राजनीतिक-सामाजिक-वैचारिक जड़ें संघ से ही जुड़ी थीं, लिहाजा संघ की शरण में जाना स्वाभाविक है। ऐसी व्याख्याएं गलत और भ्रामक हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को कोई चुनौती है या भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर कोई विरोधाभास हैं अथवा संघ भाजपा से कुछ मुद्दों पर नाराज है, लिहाजा संबंधों में तनाव है। भाजपा संघ का ही एक मातृ संगठन है, लिहाजा निर्देश और संस्कार संघवाले ही हैं। उन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती या उनका विरोध करने का दुस्साहस संभव नहीं है। संघ और भाजपा के संबंध एक विराट परिवार सरीखे हैं। वे आपस में विमर्श करते हैं और फिर एक साझा निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। करीब 90 फीसदी नेता और कार्यकर्ता आरएसएस की पृष्ठभूमि के होते हैं, जो बाद में भाजपा के लिए काम करते हैं। आरएसएस में करीब 60 लाख स्वयंसेवक हैं। उन्हीं में से प्रचारक बनते हैं। जिन्हें भाजपा में भेजा जाता है, वहां वे सांसद, मंत्री और फिर प्रधानमंत्री बन सकते हैं। 1951 में जब ‘जनसंघ’ का गठन किया गया था, तब पार्टी प्रमुख डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अटल बिहारी वाजपेयी, सुंदर सिंह भंडारी, दीन दयाल उपाध्याय सरीखे चेहरों को आरएसएस से ही मांगा था। दरअसल आज हम संघ के स्तुतिगान के पक्ष में नहीं हैं और न ही इतिहास बताना चाहते हैं। कुछ संवेदनशील और राष्ट्रीय चेतना के स्तर के मुद्दे हैं, जो संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, बंधुत्व, हिंदुत्व, एकता-अखंडता, सेवा-संस्कार और सामाजिकता के बिल्कुल विलोम हैं।

एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में संघ को महान, अक्षय और आधुनिक ‘वटवृक्ष’ माना है, लेकिन दूसरी तरफ झारखंड के हजारीबाग में भाजपा सांसद मनीष जायसवाल ने सरेआम तलवारें, लाठियां और डंडे कार्यकर्ताओं और समर्थकों में बांटे हैं। दरअसल बहुसंख्यक सांप्रदायिकता बेहद खतरनाक और हिंसक होती है, लिहाजा सांसद का यह कारनामा अक्षम्य है। दलील दी गई कि ये ‘राम नवमी’ त्योहार के उपलक्ष्य में बांटे गए हैं। प्रभु श्रीराम के नाम पर किसी पर्व या समारोह के लिए ‘हथियार’ कब बांटे गए हैं? क्या सनातन की भी ऐसी कोई परंपरा है? एक संकेत मिलता है कि भाजपा सांसद ने ‘राम नवमी’ की शोभा-यात्रा के दौरान किसी संभावित उपद्रव या हमले के मद्देनजर अपनी फौज तैयार की है। हजारीबाग में ही ‘मंगला जुलूस’ पर पथराव किया गया था। ऐसे पथराव बंगाल, बेंगलुरु, कानपुर, अलीगढ़ आदि शहरों में भी होते रहे हैं। क्या देश भर में भाजपा की ऐसी फौज तैयार और तैनात की जा सकती है? क्या आरएसएस के बुनियादी संस्कार और विचार यही हैं? सरेआम तलवारें बांटी गईं और नेतृत्व बिल्कुल खामोश है। क्या उसी की खामोश सहमति रही है? अब यह नाजुक दौर है, जब संघ और भाजपा नेतृत्व को देश के सामने साफ करना चाहिए कि क्या उनका विचार और संस्कार हिंदू बनाम मुसलमान का ही है?

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