संपादकीय

बराबरी का प्रश्न

निस्संदेह, दुनिया भर में लैंगिक समानता और महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक दिये जाने के लिये विभिन्न मंचों से लगातार आवाज उठती रही है। वहीं दुनिया के कई संगठन चुनिंदा आंकड़ों के जरिये पूरी दुनिया में लैंगिक स्थिति मापने का दावा भी करते रहे हैं। यह भी तथ्य है कि सदियों तक औपनिवेशिक शासन के अधीन रहने वाले विकासशील देश विकसित देशों की महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक स्थिति का मुकाबला नहीं कर सकते। फिर दुनिया के सबसे बड़ी आबादी वाले एक देश की तुलना छोटे देश आइसलैंड से कदापि नहीं की जा सकती। इसके बावजूद विश्व आर्थिक मंच द्वारा हाल में प्रस्तुत किये गए लैंगिक अंतर के आंकड़े नीति-नियंताओं को आत्ममंथन का मौका जरूर देते हैं। समाज के लिये भी यह विचारणीय प्रश्न है कि शिक्षा, आय, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में आधी दुनिया को उसका हक क्यों नहीं मिल पा रहा है। निस्संदेह, हमारे सत्ताधीशों को सोचना चाहिए कि लैंगिक अंतर सूचकांक में भारत 146 देशों में 129वें स्थान पर क्यों है। निश्चय ही यह स्थिति भारत की तरक्की के दावों से मेल नहीं खाती। इसके बावजूद उम्मीद जगाने वाला तथ्य है कि पिछले वर्ष जनप्रतिनिधि संस्थाओं में महिलाओं की एक तिहाई हिस्सेदारी को लेकर विधेयक पारित हो चुका है। इसके बावजूद हाल में सामने आए आंकड़े परेशान करने वाले हैं और तरक्की के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। यह विचारणीय प्रश्न है कि सरकार द्वारा महिलाओं के कल्याण के लिए अनेक नीतियां बनाने और कायदे कानूनों में बदलाव के बावजूद लैंगिक असमानता की खाई गहरी क्यों होती जा रही है। ये स्थितियां समाज में इस मुद्दे पर खुले विमर्श की जरूरत को बताती हैं। हालिया लोकसभा चुनाव में सीमित मात्रा में महिलाओं के संसद में पहुंचने ने भी कई सवालों को जन्म दिया है। निश्चित रूप से तमाम सरकारी घोषणाओं के बावजूद जमीन पर संकट वास्तविक है। जो हमारी विकास योजनाओं और नीतियों के व्यापक मूल्यांकन की आवश्यकता बता रही है।

हमारे सत्ताधीशों के लिये यह तथ्य विचारणीय है कि हमारे समाज में आर्थिक असमानता क्यों बढ़ रही है। हम समान कार्य के बदले महिलाओं को समान वेतन दे पाने में सफल क्यों नहीं हो पा रहे हैं। जाहिर है यह अंतर तभी खत्म होगा जब समाज में महिलाओं से भेदभाव की सोच पर विराम लगेगा। यह संतोषजनक है कि माध्यमिक शिक्षा में नामांकन में लैंगिक समानता की स्थिति सुधरी है। फिर भी महिला सशक्तीकरण की दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। देर-सवेर महिला आरक्षण कानून का ईमानदार क्रियान्वयन समाज में बदलावकारी भूमिका निभा सकता है। जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक नेतृत्व इस मुद्दे को अपेक्षित गंभीरता के साथ देखे। हालांकि, किसी भी समाज में पूर्ण लैंगिक समानता हासिल करने में लंबा समय लगता है, लेकिन इस दिशा में सत्ताधीशों की तरफ से ईमानदार पहल होनी चाहिए। यह भी एक हकीकत है कि दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश के आंकड़ों की तुलना दक्षिण एशिया के छोटे देशों से नहीं की जा सकती। लेकिन विश्व आर्थिक मंच के आंकड़े हमें आत्ममंथन का अवसर जरूर उपलब्ध कराते हैं। लेकिन इसमें दो राय नहीं कि पूरी दुनिया में सरकारों द्वारा लैंगिक समानता के लिये नीतियां बनाने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं निकले हैं। जिसकी एक वजह समाज में पुरुष प्रधानता की सोच भी है। जिसके चलते यह आभास होता है कि आधी दुनिया के कल्याण के लिये बनी योजनाएं महज घोषणाओं तथा फाइलों तक सिमट कर रह जाती हैं। हमें यह सोचना होगा कि पिछले बार जहां हम विश्व आर्थिक मंच की सूची में 127वें स्थान पर थे, तो इस बार दो स्थान फिसलकर 129वें स्थान पर कैसे पहुंच गए। वहीं महिला/पुरुष राष्ट्राध्यक्षों की समानता के मामले में हम आज दसवें स्थान पर हैं। ऐसा नहीं है कि समाज की पुरुषवादी सोच में बदलाव नहीं आया। लेकिन बदलाव की गति धीमी है। निस्संदेह, आजादी के मुकाबले स्थितियां बहुत बदली हैं, लेकिन ये प्रगति संतोषजनक नहीं है। दरअसल, समाज में पुरुष वर्चस्व की मानसिकता को बदलने की जरूरत है। विश्वास किया जाना चाहिए कि बराबरी के सवाल पर हमारी पहल देर-सवेर रंग जरूर लाएगी।

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