संपादकीय

भगदड़ के बावजूद स्नान के लिए उमड़ा जन-सैलाब

महाकुंभ में आस्था और श्रद्धा का जन-सैलाब उमडऩा ही था। भगदड़ की भी आशंकाएं थीं, क्योंकि कुछ भक्त सीमाओं को लांघने पर उतारू थे। मेले में भीड़ अपरिमित और आशातीत थी। अंतत: रात में ही करीब 2 बजे बैरिकेड लांघन का दुस्साहस किया गया, अनुशासन तोड़ दिया गया, प्रशासन के निर्देशों को नकार दिया गया, नतीजतन भगदड़ मची और श्रद्धालु घायल हुए। कुछ गंभीर घायल भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बताए हैं, लेकिन बुधवार सुबह 11 बजे तक हताहत और घायलों का कोई अधिकृत आंकड़ा घोषित नहीं किया गया था। कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया एजेंसियों ने मरने वालों की संख्या बताई है, लेकिन हम उसे अंतिम जिम्मेदारी नहीं मानते। यकीनन भगदड़ अप्रत्याशित होगी, तभी प्रधानमंत्री मोदी ने तीन घंटे में ही चार बार मुख्यमंत्री योगी को फोन किए और हालात की जानकारी लेते रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने भी फोन पर मुख्यमंत्री से बातचीत कर विस्तृत ब्योरा लिया। प्रधानमंत्री ने महाकुंभ में हुए हादसे को ‘दुखद’ करार दिया है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना भी जताई है। साफ है कि कुछ मौतें भी हुई हैं। बहरहाल मुख्यमंत्री आदित्यनाथ का अनुमान था कि ‘मौनी अमावस्या’ को ‘अमृत स्नान’ करने 9-10 करोड़ श्रद्धालु प्रयागराज में आए। बुधवार सुबह करीब 9 बजे तक करीब 4 करोड़ श्रद्धालु त्रिवेणी और आसपास के घाटों पर स्नान कर चुके थे। भगदड़ भयावह रूप धारण न करे, लिहाजा अखाड़ों के साधु-संतों ने मुख्यमंत्री और प्रशासन से बातचीत कर तय किया कि देश भर से पधारे भक्तों को पहले स्नान करने दिया जाए।

उसके बाद दबाव कम होने पर ही अखाड़े ‘अमृत स्नान’ करेंगे। अंतत: वह ‘प्रतीकात्मक स्नान’ ही कर पाए। अमूमन व्यवस्था यह होती है कि पहले शंकराचार्य और फिर अखाड़ों के साधु-संत, तय समय के अनुसार, स्नान करते हैं, फिर आम श्रद्धालु का नंबर आता है, लेकिन इस बार महाकुंभ में भक्तों के सैलाब ने विश्व-कीर्तिमान बना दिए, नया इतिहास लिखा गया और आस्था, अध्यात्म के तमाम रिकॉर्ड टूट गए। मंगलवार तक करीब 20 करोड़ भक्त संगम त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगा चुके थे और करीब 17 करोड़ ने अयोध्या के राम मंदिर में अपने प्रभु राम के दर्शन किए। ऐसा रहा सनातन का आस्थामय कीर्तिमान..! नतीजतन अयोध्या तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपत राय को सार्वजनिक अपील करनी पड़ी कि उप्र के श्रद्धालु 15-20 दिन बाद दर्शन करने आएं, क्योंकि कुंभ में जाने वाले अयोध्या आकर भी दर्शन-लाभ लेना चाहते हैं। उन्हें दर्शन करने दिए जाएं, क्योंकि वे दूरदराज से पधार रहे हैं। बहरहाल औसतन 1.21 करोड़ भक्तों ने हररोज संगम में आस्था की डुबकी ली और निर्वाण के पुण्य अर्जित किए। इतनी भीड़ का प्रबंधन और नियंत्रण ही ‘वैश्विक उदाहरण’ बन गया। अमरीकी कंपनी नासा ने अंतरिक्ष से उस आस्था-सैलाब की तस्वीरें भी वैश्विक कीं। इन लम्हों तक कोई भगदड़, कोई घटना, आपदा अथवा हादसा सामने नहीं आया, हालांकि कुंभ-आयोजन में हादसे होते रहे हैं। स्वतंत्र भारत के सर्वप्रथम कुंभ 1954 में तो व्यापक त्रासदी सामने आई थी, जब भगदड़ में करीब 800 मौतें हुई थीं। इस बार भी भगदड़ के बाद मुख्यमंत्री और साधु-संतों को आह्वान करने पड़े कि जो भक्त जिस घाट के करीब हैं, वे वहीं स्नान करें। उन्हें संपूर्ण पुण्य-लाभ मिलेगा। ये आह्वान विवशता के प्रतीक भी हो सकते हैं। कुछ मुख्यमंत्रियों ने भी मौत के अनौपचारिक आंकड़े जारी किए हैं। यह देशहित या श्रद्धालु-हित में नहीं है। महाकुंभ जैसे सनातन और आध्यात्मिक आयोजन पर राजनीति करने से बचना चाहिए। यह गरीबी, बेरोजगारी, रोटी और बच्चे के स्कूल न जा पाने की विवशताओं का भी पर्व नहीं है। यह विशुद्धत: आस्था, श्रद्धा, भक्ति, सत्य, समर्पण आदि का दैवीय महाकुंभ है, जो 144 सालों के बाद आया है और हमारी जिंदगी में दोबारा इसका आगमन असंभव है।

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