संपादकीय

मंसूबों की सियासत

हम यह विश्लेषण कर चुके हैं कि भारत कभी भी नेपाल नहीं हो सकता, लेकिन विपक्ष का एक तबका भारत को नेपाल में परिणत करने को युवाओं को उकसा, भडक़ा रहा है। यहां तक कहा गया है कि देश के युवा संविधान को बचाएंगे। देश के छात्र लोकतंत्र को बचाएंगे और ‘जेनरेशन जी’ वोट-चोरी के खिलाफ लड़ेगी। लोकतंत्र, संविधान और देश बचाने का दायित्व प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष से लेकर आम नागरिक तक सभी का है। यह युवाओं के आंदोलन के जरिए ही नहीं हो सकता, क्योंकि भारतीय युवाओं को अपना लोकतंत्र प्रिय है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 18-35 वर्ष की उम्र के 57 फीसदी से अधिक देशवासी भारत के लोकतंत्र से खुश और संतुष्ट हैं। 56 साल की उम्र और उससे कुछ अधिक उम्रदराज लोग करीब 71 फीसदी भारत के लोकतंत्र से खुश और संतुष्ट हैं। सर्वेक्षण में लोकतंत्र से नाखुश कोई नहीं है, अलबत्ता किन्हीं कारणों से अद्र्ध-संतुष्ट दिखाई दिए हैं। इस लोकतंत्र में आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन भी निहित हैं। कमोबेश भारत में ऐसी ‘जेन जी’ युवा पीढ़ी की संकल्पना ही नहीं है, जिसके हिंसक आंदोलन भारत को ‘शून्य देश’ बना दें। नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को बेहद पीड़ा के साथ कहना पड़ा है कि नेपाल ‘शून्य स्टेट’ की स्थिति में है। हिंसक विद्रोह ने अंधाधुंध आगजनी कर संसद भवन, सर्वोच्च अदालत, प्रधानमंत्री दफ्तर और आवास, विभिन्न मंत्रालयों के संवेदनशील दस्तावेजों को ‘राख’ कर दिया है। उनमें सन्धियों और प्रस्तावों के मूल दस्तावेज भी थे। क्या विपक्ष ऐसा भारत बना देना चाहता है? यदि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का दायित्व लोकतंत्र, संविधान बचाने का नहीं है, तो वह 21 साल से सांसद और अब विपक्ष के नेता क्यों हैं? 2024 के लोकसभा चुनाव से हाथ में एक पुस्तिका-सी लेकर उन्होंने क्या नेरेटिव छेड़ा हुआ है? भारत में लोकतंत्र और जनादेश चुनाव के जरिए ही अस्तित्व में हैं। सभी संविधान के दायरे में हैं। जिसे जनादेश हासिल होता है, उसी की सरकार बनती है। वह पक्ष ही संवैधानिक तौर पर देश में शासन चलाता है। इस स्थिति को सभी पक्ष और राजनीतिक दल मान्यता देते रहे हैं। यदि 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों के जनादेश देखे जाएं, तो 25-35 साल के आयु-वर्ग के युवाओं ने भाजपा के पक्ष में 38-40 फीसदी और कांग्रेस के पक्ष में 19-20 फीसदी वोट दिए। यह जनादेश कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी निरंतर देखा गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में भाजपा-संघ के सहयोगी संगठन ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्’ ने चार में से तीन पदाधिकारियों के चुनाव जीते हैं।

इससे युवा पीढ़ी की मानसिकता और उसके रुझान स्पष्ट दिखते हैं कि वह विद्रोही है अथवा लोकतंत्रवादी है! बेशक हमारे देश में भी समस्याएं हैं। यदि भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर ही कोई विद्रोह फूटना है, जैसा नेपाल में हुआ था, तो देशवासी सहज ही जानते हैं कि इन दोनों बुराइयों के पर्याय कौन हैं? देश में 15-29 साल आयु-वर्ग के युवा 37.14 करोड़ हैं। यह संख्या जनगणना के साथ बढ़ती रहती है। हमारी 65 फीसदी जनसंख्या की औसत उम्र 35 साल और उससे कम है। यकीनन बेरोजगारी हमारे युवाओं की सबसे बड़ी और तनावग्रस्त समस्या है, जो युवाओं को आक्रोशित, उत्तेजित और उन्मादी तक बनाती है। भारत के 15-29 साल की उम्र के युवाओं में बेरोजगारी दर 16 फीसदी से अधिक है। यह सार्वजनिक संस्थाओं का आंकड़ा है, जबकि सरकार बेरोजगारी की राष्ट्रीय दर 5.2 फीसदी के आसपास मानती है। दोनों आकलन के अपने-अपने आधार हैं, लेकिन इतना फासला है, तो उसे क्या कहेंगे? दरअसल ‘जेन जी’ की आड़ ली जा रही है। बिहार में विधानसभा चुनाव होने में करीब 2 माह हैं। वहां की करीब 58 फीसदी आबादी की औसत उम्र 25 साल या कम है। वहां चुनावी मौसम में युवाओं के 13-15 विरोध-प्रदर्शन हो चुके हैं, लेकिन एक भी विद्रोह के स्तर तक नहीं पहुंचा। दरअसल यह प्रधानमंत्री मोदी का किसी भी तरह तख्तापलट करने के मंसूबों की सियासत है। भारत में ऐसी बगावतें कामयाब नहीं होतीं, अलबत्ता देश में अराजकता और अस्थिरता का माहौल जरूर बनता है। बहरहाल अब देखना होगा कि राहुल गांधी का ऐसा प्रचार कितना सही साबित होता है या फिर ‘जेन-जी’ वाला सिद्धांत संविधान को बचाने में और लोकतंत्र की रक्षा करने में कितना सक्षम सिद्ध होता है।

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