संपादकीय

‘पैलेट गन’ की सियासत

उम्मीद है कि संसद की कार्यवाही चलेगी और पेपर लीक के नए, बेहद कठोर ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन पर रोकथाम) संशोधन विधेयक’ पर सार्थक बहस होगी। यह संपादकीय हमने पहले लिखा था और संसदीय कार्यवाही बाद में शुरू होनी थी, लिहाजा ‘उम्मीद’ शब्द का प्रयोग किया है। संसद सत्र के बेशकीमती छह, महत्वपूर्ण दिन बर्बाद किए जा चुके हैं। सोमवार को भी विपक्ष ने संसद परिसर में विरोध-प्रदर्शन किया और एक नया नारा सामने आया-‘धर्मेन्द्र प्रधान झांकी है, अमित शाह अभी बाकी है।’ यानी अब विपक्ष गृहमंत्री अमित शाह की ‘बलि’ पर आमादा है। स्पीकर ओम बिरला ने जिस तरह पक्ष और विपक्ष में चर्चा की सहमति बनवाई, उसमें भी जोड़ा गया कि बहस के दौरान गृहमंत्री और पैलेट गन, एके-47 राइफल सरीखे मुद्दे भी उठाए जाएंगे। विपक्ष गृहमंत्री के इस्तीफे अथवा माफी की मांग उठा सकता है। गृहमंत्री भी चर्चा के दौरान या बाद में विपक्ष के आरोपों का बिंदुवार जवाब दे सकते हैं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार प्रधानमंत्री मोदी की माफी की मांग कर रहे हैं। क्या पेपर लीक और कुछ छात्रों की आत्महत्या के लिए प्रधानमंत्री जवाबदेह और जिम्मेदार हैं? ऐसा कब हुआ है? पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के 10-साला कालखंड में करीब 100 पेपर लीक हुए, उनसे कब माफी के आग्रह किए गए? अथवा इस्तीफे की मांग की गई या उन्होंने खुद को जवाबदेह मानते हुए शिक्षा और परीक्षा सुधारों की पहल की? सिर्फ 6-14 आयु-वर्ग के बच्चों के लिए अनिवार्य, मुफ्त शिक्षा का कानून बना देने से शिक्षा का मौलिक अधिकार हासिल नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने पेपरलीक और शिक्षा-व्यवस्था में सुधार के कितने प्रयास किए हैं और कर रहे हैं, यह देश के समक्ष है। उनकी सफलता को वक्त की कसौटी पर परखा जाएगा। दरअसल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी युवा-छात्र आंदोलन के पैरोकार तो बनना चाहते हैं, लेकिन उनकी राजनीति प्रधानमंत्री मोदी को कमजोर और अस्थिर करने की है। यह राजनीति प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बखूबी जानते होंगे। वे घिसे, खांटी और अनुभवी नेता हैं।

चूंकि विरोध-प्रदर्शन और संसद का घेराव करने वाले आंदोलन के दौरान, बेशक, पुलिस ने लाठियां चलाईं, आंसू गैस के गोले दागे, पानी की तेज बौछार मारी और युवाओं पर बर्बर, अश्लील हमले भी किए गए, लिहाजा इसे राजनीतिक मुद्दा बनाना स्वाभाविक है कि पैलेट गन चलाने का आदेश किसने दिया? राहुल गांधी गृहमंत्री शाह पर निशाना साधे हुए हैं, लिहाजा उनके इस्तीफे के नारों की गूंज भी सुनाई देती रही है। दरअसल खुद राहुल गांधी पैलेट गन का इतिहास और यूपीए सरकार के निर्णय को नहीं जानते और पैलेट गन का राग अलाप रहे हैं। 2010 में यूपीए सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सबसे पहले पैलेट गन का इस्तेमाल किया था, जिसमें 17 हत्याएं (मौत नहीं कहेंगे) की गई थीं। जबरदस्त हंगामा हुआ, विरोध किए गए थे, लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने पैलेट गन को ‘गैर-घातक’ करार दिया था। यदि पूर्व गृहमंत्री के आकलन पर भरोसा करें, तो अब के युवा, छात्र आंदोलन के दौरान पैलेट गन ‘घातक’ और ‘जानलेवा’ कैसे हो गई? बेशक राहुल गांधी एक युवा को वीडियो में दिखाते रहे हैं कि पैलेट गन से उसका शरीर किस कदर छलनी हुआ है। नौजवान की एक आंख की रोशनी भी छिन सकती है, क्योंकि डॉक्टरों ने उसके ठीक होने की मात्र एक फीसदी संभावना जताई है। 2016 में तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पैलेट गन का इस्तेमाल ‘दुर्लभतम’ करार दिया था। उसकी व्यवस्था में संशोधन किए गए और यह गन सीआरपीएफ के पास ही होने की व्यवस्था तय की गई। फिर मौजूदा आंदोलन के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों ने पैलेट गन कैसे चलाई? यकीनन यह बेहद गंभीर और संवेदनशील सवाल है। सवाल तो यह भी खतरनाक और डरावना है कि बिहार के सीवान इलाके के एक सिपाही के पास एके-47 स्वचालित राइफल कैसे और कहां से आई? बेशक उस सिपाही को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया गया, लेकिन 4 गोलियां चलाई गईं। क्यों…क्या युवा, छात्र ‘आतंकवादी’ मान लिए गए? पैलेट गन का इस्तेमाल करने की एक वैधानिक, मानक संचालन प्रक्रिया भी है। क्या उसका भी उल्लंघन किया गया? जितना महत्वपूर्ण मुद्दा पेपर लीक का है, उससे भी अधिक संवेदनशील मुद्दा पैलेट गन, एके-47 का है, लिहाजा संसद में व्यापक बहस होनी चाहिए।

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