संपादकीय

पीएम का ट्रंप को संदेश

प्रधानमंत्री मोदी ने अमरीका और राष्ट्रपति टं्रप का नाम नहीं लिया, लेकिन संरक्षणवाद, एकाधिकारवाद और वर्चस्ववाद के खिलाफ आवाज बुलंद की। उन्होंने इनके खात्मे की बात कही, क्योंकि वैश्विक, लोकतांत्रिक, कूटनीतिक व्यवस्था में ये उचित नहीं हैं। यकीनन प्रधानमंत्री मोदी का संदेश ‘व्हाइट हाउस’ तक पहुंच गया होगा, क्योंकि प्रधानमंत्री ने अमरीका की नीतियों पर कड़े प्रहार किए थे। इसके अलावा, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि अमरीका को शीत युद्ध वाली मानसिकता छोड़ देनी चाहिए। अमरीका दूसरे देशों को धमकाना भी छोड़ दे। विश्व के परिदृश्य और समीकरण बदल रहे हैं। सोमवार, 1 सितंबर, 2025 का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक चित्र मोदी, पुतिन, जिनपिंग की अंतरंग मुलाकात का रहा, जिसे क्रेमलिन और बीजिंग ने भी जारी किया। भारत के टीवी चैनलों पर सुबह के प्रसारण में यह वीडियो छाया रहा। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की द्विपक्षीय वार्ता भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि मोदी, पुतिन, जिनपिंग की मुलाकात संक्षिप्त थी, लेकिन ‘व्हाइट हाउस’ को चौंका दिया गया। बेशक भारत और रूस कई दशक पुराने ‘मित्र देश’ हैं, लेकिन भारत-चीन के संबंधों में कई विरोधाभास और विश्वासघात हैं। उनके बावजूद ‘शंघाई सहयोग संगठन’ (एससीओ) के मंच पर तीन शीर्ष नेताओं की दोस्ती के नए अध्याय ने बहुत कुछ कह दिया है।

हालांकि 50-52 साल के राजनय का अनुभव रखने वाले कूटनीतिज्ञों का मानना है कि एससीओ कभी भी नाटो का विकल्प नहीं हो सकता। नाटो में कई बड़े देश शामिल हैं और उसे अमरीका जैसी महाशक्ति का समर्थन भी हासिल है। नाटो का संकल्प है कि यदि एक सदस्य-देश पर हमला हुआ, तो उसका प्रतिकार सभी नाटो देश लेंगे। सभी सदस्य-देश युद्ध में कूद पड़ेंगे। नाटो के देश आपस में कई सूचनाएं (खुफिया भी) साझा करते हैं। आर्थिक और सामाजिक रूप से भी जुड़े रहते हैं, लेकिन एससीओ में भारत, रूस, चीन के अलावा अधिकांश देश छोटे और विकासशील हैं। कुछ देश गरीब भी हैं, जिनकी जिंदगी कर्ज के भरोसे है। एससीओ में ऐसा कोई साझा संकल्प पारित नहीं किया गया है, जैसा नाटो के देशों ने पारित किया है। राजनयिकों का मानना है कि यदि भारत, रूस, चीन का एक ‘ईमानदार त्रिकोण’ बनता है, तो वह अमरीका के लिए वाकई गंभीर चुनौती होगा, लेकिन इन देशों को हकीकत में संबंधों को बदलते और प्रगाढ़ होते दिखाना होगा। फिलहाल कोई बड़ी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। बहरहाल यह सबसे अधिक आश्चर्यजनक रहा, जब चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद का विरोध किया। उन्होंने आतंकवाद का तीन बार उल्लेख किया और 5000 जवानों का ‘आतंकवाद निरोधी दस्ता’ तैयार करने की पेशकश की। प्रधानमंत्री मोदी ने 7 बार आतंकवाद का जिक्र किया।

इसी मुद्दे पर एससीओ के रक्षा मंत्रियों की बैठक में ‘साझा बयान’ तैयार नहीं किया जा सका था, क्योंकि आतंकवाद का मुद्दा गायब था और हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था। अब जिनपिंग ने आतंकवाद का मुद्दा खास तौर पर रखा है, बल्कि आतंकवाद पर भारत का सहयोग करने का आश्वासन भी दिया है। दुनिया जानती है कि चीन और पाकिस्तान के संबंध कैसे हैं? ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद हमारे उप सेना प्रमुख जनरल राहुल आर. सिंह ने एक सार्वजनिक मंच से कहा था कि पाकिस्तान के साथ लड़ाई दिखावटी थी। हालांकि हमें चीन से संघर्ष करना पड़ा था और हमने चीन को भी पराजित करके दिखाया। पाकिस्तान पर चीन का अरबों डॉलर का कर्ज है। इकॉनोमिक कॉरिडोर भी बनाया जा रहा है। एससीओ में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी शामिल थे। यह दीगर है कि प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने उन्हें पूरी तरह अनदेखा किया। जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की लंबी बातचीत से स्पष्ट हुआ है कि भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के पक्ष में है। चीन ने अपना रवैया बदल कर सहयोगात्मक करने का वायदा किया है।

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