Pakistan Train Hijack LIVE Updates: 155 बंधकों को PAK आर्मी ने छुड़ाया, 100 अभी भी BLA के कब्जे में, ट्रेन हाईजैक पर बड़ा Update

पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मंगलवार को चार सौ से ज़्यादा यात्रियों से भरी एक ट्रेन पर हथियारबंद चरमपंथियों ने कब्ज़ा कर लिया है. पाकिस्तान सरकार का कहना है कि करीब 104 यात्रियों को बचा लिया गया है. पर अभी भी बहुत से यात्री बलूच चरमपंथियों के कब्जे में हैं. बलूचिस्तान में ये चरमपंथी एक अलग देश की मांग कर रहे हैं. भारत के लिए यह महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है क्योंकि बलूचिस्तान की जनता के साथ हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों के प्रति मोदी सरकार पहले चिंता जता चुकी है. 2016 में गणतंत्र दिवस पर पीएम नरेंद्र मोदी के लाल किले से दिए गए भाषण में बलूचिस्तान और गिलगित के लोगों के प्रति अपनी संवेदना दिखाते रहे हैं. इसके साथ ही बलूचिस्तान के लोग लगातार भारत से समर्थन की उम्मीद भी जताते रहे हैं. ऐसा माना जाता है कि देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के समय जब रियासतों का बंटवारा हो रहा था, उस समय बलूचिस्तान ने भारत के साथ आने की इच्छा दिखाई थी. पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के अन्य नेताओं की गलतियों के चलते पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर सैन्य कार्रवाई करके उसे जबरन मिला लिया. भारत के पास बलोच लोगों के साथ हुए उस अन्याय का और कश्मीर में बेवजह दखल करने वाली पाकिस्तानी सेना को सबक सिखाने का एक बढ़िया मौका है.
1- बलोचिस्तान भारत में शामिल होना चाहता था लेकिन नेहरू सरकार ने प्रस्ताव नजरअंदाज कर दिया
जम्मू कश्मीर की तरह ही बलूचिस्तान के शासक भी अपनी रियासत की ऑटोनॉमी बनाए रखना चाहते थे, लेकिन पाकिस्तानी शासन ने इसके स्वतंत्रता के सात महीने बाद ही मार्च 1948 को अपनी सेना भेज दी. पाकिस्तान को डर था कि भारत कहीं बलूचिस्तान को अपने साथ न मिला ले. बलूचिस्तान के लोगों का पाकिस्तान की सरकार और सेना किस तरह से दमन कर रही है यह पूरी दुनिया जानती है. बलोच लोग पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में पाकिस्तानी अत्याचारों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं. UNHRC में भी कई बार बलूच समर्थकों ने पाकिस्तान के खिलाफ जमकर नारेबाजी की है. कैबिनेट सचिवालय में विशेष सचिव रहे तिलक देवेशर ‘The Balochistan Conundrum’ नाम से एक किताब लिखी है. देवेशर लिखते हैं कि…
चूंकि 1948 में सैन्य कार्रवाई के बल पर पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को अपने साथ मिलाया था इसलिए ज्यादातर बलोचों के मन में यह बात बैठी हुई है कि पाकिस्तान कभी उनका नहीं रहा है और न ही उनका हो सकता है. अंग्रेजों की विदाई के साथ ही बलोचों ने अपनी आजादी की घोषणा कर दी थी. पाकिस्तान ने ये बात मान ली थी लेकिन वो बाद में इससे मुकर गए. बलोचों के सबसे बड़े नेता खुदादाद खान (खान ऑफ कलात) से 1876 में अंग्रेजों ने जो संधि की थी उसके मुताबिक बलूचिस्तान एक आजाद देश था. उनकी आजाद देश की पहचान को 1946 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नकार दिया था. खान पहले से ही पाकिस्तान की आंखों में चढ़े हुए थे. बलोचों के विरोध की वजह से वह और निशाने पर आ गए थे. 1948 में खान को को पाकिस्तान की सेना ने गिरफ्तार कर लिया और उनसे जबरन बलूचिस्तान के पाकिस्तान में विलय के समझौते पर साइन करवा लिए.
1947 में भी कांग्रेस के नेताओं ने यह मान लिया होता कि बलूचिस्तान एक आजाद देश है तो भारत को कोई फायदा होता या न होता, कम से कम पाकिस्तान और छोटा हो गया होता. देवेशर लिखते हैं कि कांग्रेस के कई नेता ये भी मानते थे कि भारत की आजादी के बाद बलूचिस्तान शायद ही आजाद राष्ट्र बनकर रह सके. इसके लिए उन्हें अंग्रेजों का साथ चाहिए होगा जो कांग्रेस को स्वीकार्य नहीं था. मार्च 1948 में ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित एक प्रेस कांफ्रेंस का जिक्र अकसर मीडिया में होता रहा है. इस किताब में भी उस पीसी का जिक्र है. जिसमें कहा गया कि खुदादाद खान इस बात को लेकर तैयार थे कि बलूचिस्तान का भारत में विलय कर दिया जाए. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और अन्य कांग्रेस नेताओं ने इसको नकार दिया. भारत सरकार के इस रवैये से खान को गहरा धक्का लगा और आखिर में उन्होंने पाकिस्तान के साथ संधि करने के लिए बातचीत की पेशकश कर दी. हालांकि बाद में पंडित नेहरू ने इस प्रेस कांफ्रेस में कही गई सभी बातों से पल्ला झाड़ लिया. उन्होंने इस पूरी खबर को ही मनगढ़ंत और झूठा बताया था.



