संपादकीय

…अब क्या है ऑपरेशन सिंदूर के बाद की चुनौती

 मशरूम क्लाउड्स का संबंध सामान्य तौर पर परमाणु विस्फोट से होता है। बीते दिनों ऑपरेशन सिंदूर के दौरान परमाणु प्रतिष्ठान को निशाना बनाने की अटकलें भी लगाई गईं। इन अटकलों के बीच फर्जी सूचनाओं, प्रोपेगंडा और यहां तक कि मीडिया के एक हिस्से द्वारा फैलाई गई अफवाहों का विस्फोट जरूर देखने को मिला।

भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव थमने को आप चाहे जो नाम दें, लेकिन उसके एक पखवाड़े बाद भी तरह-तरह की कहानियां तैर रही हैं। अपनी-अपनी कहानियों को सच बताने की मुहिम जारी है।

लोग भी अपनी रुचि एवं झुकाव के लिहाज से उन्हें मान्यता दे रहे हैं। जब सीमा के दोनों ओर जहां एक के बाद एक वार-पलटवार हो रहे थे, उसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एकाएक पोस्ट प्रकट हुई कि उन्होंने दोनों देशों के बीच जारी टकराव को बंद करा दिया है।

इसे लेकर भी अटकलें-अनुमान चरम पर रहे कि पर्दे के पीछे आखिर क्या हुआ, जो यकायक ऐसी स्थिति बन गई। ऐसे दावों-प्रतिदावों के बीच संभव है कि सच्चाई कभी बाहर न आ पाए। इसके बाजवूद अपना-अपना नैरेटिव बनाने का उन्मादी दौर देखने को मिला। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने स्वाभाविक रूप से अपनी ‘सुविधाजनक’ वैचारिक मंशा दिखाई। इस ‘सुविधाजनक’ को भारत-विरोधी पढ़ा-समझा जाए।

देखा जाए तो संचार के मोर्चे पर पाकिस्तान की चुनौतियां भारत की तुलना में कहीं आसान थीं। चूंकि वहां हर पहलू की तरह विमर्श की रूपरेखा तय करने पर भी सेना का ही नियंत्रण है इसलिए उसके लिए जीत की घोषणा करना ही बाकी थी। फिर चाहे इसके लिए राफेल को मार गिराने की फर्जी कहानी ही क्यों न गढ़नी पड़ी। यह उसने गढ़ी भी और उसे अपनी मतांध जनता और दुनिया भर में फैले ऐसे ही लोगों को परोसा भी गया।

इसी दौरान सेना प्रमुख को फील्ड मार्शल की पदवी देकर अपने कपोल-कल्पित आख्यान को मान्यता देने का प्रयास किया। यहां तक कि इस ‘जीत’ का जश्न मनाने के लिए समारोह और भोज भी आयोजित किए गए, जिसमें प्रयुक्त तस्वीरें भी झूठी ही निकलीं। इस मामले में भारत का काम कहीं ज्यादा जटिल था। पहले तीन दिनों तक सूचनाओं के प्रवाह को अनुकरणीय धैर्य एवं कुशल प्रबंधन के जरिये संभाला गया। फिर अचानक अमेरिका के मनमौजी राष्ट्रपति की संघर्ष विराम की घोषणा और मध्यस्थता में अमेरिकी भूमिका का दावा हैरत में डाल गया।

इसने भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान को हतप्रभ कर दिया, क्योंकि उसे सफाई देनी पड़ी कि इसमें तीसरे पक्ष का कोई हस्तक्षेप नहीं रहा। पाकिस्तान के संदर्भ में दशकों से भारत की यही नीति रही है कि तीसरे पक्ष के दखल के लिए कोई स्थान नहीं। आम भारतीय भी युद्ध की दुंदुभि के शांत पड़ने से अवाक रहे गए, जो यह मान चुके थे कि सीमा पार आतंकवाद को इस बार ऐसा सबक सिखाया जाएगा कि वह फिर सिर उठाने का दुस्साहस न करे। जनता दीर्घकालिक समाधान की आस लगाए थी।

स्पष्ट है सरकार धारणा के मोर्चे पर कुछ मात खा गई। संदेह की प्रकृति भारतीयों के डीएनए में समाई हुई है और उन्हें इसकी कहीं ज्यादा फिक्र होती है कि बाकी दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर भारतीय खासे आग्रही एवं आंतरिक आलोचना के प्रति खुले हैं। इसमें औपनिवेशिक अतीत की भी भूमिका है। जब संदेह विपक्षी दलों और उनके इकोसिस्टम द्वारा बढ़ाए जाते हैं तो जनता के मन पर कहीं न कहीं उसकी गूंज होती है।

इसे भांपते हुए सरकार ने सांसदों-विशेषज्ञों के प्रतिनिधिमंडल दुनिया भर में भेजने का फैसला किया ताकि वे वैश्विक स्तर पर भारत का पक्ष रखें। इसे साफ समझा जा सकता है कि सर्जिकल स्ट्राइक -एयर स्ट्राइक की तुलना में ऑपरेशन सिंदूर कहीं बड़ी सैन्य कार्रवाई रही। इसमें भारत ने न केवल पाकिस्तान के भीतर तक हमले किए, बल्कि बचाव के मामले में भी अद्भुत मिसाल कायम की।

जब तक कथित संघर्ष विराम के पीछे का घटनाक्रम सामने नहीं आएगा, तब तक कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाए जाते रहेंगे। यह भी अटकलों के केंद्र में रहेगा कि क्या भारत ने पाकिस्तान के परमाणु जखीरे को कोई नुकसान पहुंचाया या उसके आसपास कोई हमला किया। जो भी हो, इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत वैश्विक जनमत को अपेक्षित रूप से अपने पक्ष में नहीं मोड़ पाया।

कोई बड़ी महाशक्ति भारत के साथ खुलकर खड़ी नहीं दिखी, जबकि पाकिस्तान के पीछे चीन, तुर्किये के अलावा अजरबैजान का समर्थन साफ दिखा। ट्रंप के इस दावे कि ‘शांति कराने के लिए उन्होंने व्यापार को आधार बनाया’ पर इसलिए यकीन नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारत ने अतीत में भी अमेरिकी प्रतिबंधों की परवाह नहीं की है, जबकि पाकिस्तान के पास ऐसा कुछ नहीं कि वह व्यापार की चिंता करे। पाकिस्तान के लिए आइएमएफ से ऋण मंजूर हो जाना भी यही संकेत करता है कि पश्चिम की हमदर्दी किसके साथ रही।

पाकिस्तान सहित अमेरिका, चीन के अलावा अन्य देश इससे तो अवगत रहे ही होंगे कि भारत ने कैसी सामरिक क्षमताएं हासिल कर ली हैं, लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा होगा कि वह उनके उपयोग में भी कितना सक्षम है। अगर पाकिस्तान के साथ तनातनी कुछ दिन और खिंचती तो भारत की शक्ति एवं श्रेष्ठता और मुखरता से स्थापित हो जाती, जिससे क्षेत्रीय भू-राजनीतिक समीकरण बदल जाते।

स्वाभाविक है कि कुछ महाशक्तियों को यह गवारा नहीं होता। यहां असल मुद्दा एक आर्थिक शक्ति के रूप में भारत के उभार से जुड़ा है। इसके साथ ही यदि वह सैन्य रूप से सशक्त होकर उभर आता है तो उसे रोकना संभव नहीं होगा। विकसित देश अभी इस सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं हैं। देखना है कि मोदी इस सबसे बड़ी चुनौती से कैसे निपटते हैं। संभव है कि विकसित भारत के दूरगामी लक्ष्य की पूर्ति के लिए ही उन्होंने तात्कालिक रूप से संघर्ष विराम का विकल्प चुना हो। उन्होंने वीरता पर विवेक को वरीयता दी। आखिर बड़ा युद्ध जीतने के लिए कुछ छोटी लड़ाइयों को अनदेखा जो करना होता है।

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