राजनीति

मोदी के दुलारे बने रहेंगे नीतीश, BJP ने जातीय समीकरणों को किया और मजबूत किया

प्रियरंजन भारती, नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भागलपुर रैली से किसान निधि की छठी किस्त भेजी गई। इसे किसानों के बड़े वोट बैंक को मजबूती देने की मंशा भर नहीं कहा जाना चाहिए। इस रैली के जरिए BJP ने बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य के विधानसभा चुनाव का अजेंडा सेट कर दिया है।

शानदार समीकरण: किसान, महिला और नौजवान बिहार चुनाव के आधार वोट हैं। पीएम मोदी राज्य की जनता की नब्ज को बखूबी टटोलते रहे हैं। इसी वजह से बिहार के जनमानस में उनके प्रति अजीब आसक्ति का भाव भी समय के साथ विकसित होता रहा है। भागलपुर में उमड़े जनसैलाब ने यह दिखाया भी। पीएम के साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मौजूदगी एक ऐसी केमिस्ट्री के सूत्र स्थापित कर गई है, जो NDA को न सिर्फ बड़ा उफान देती है बल्कि सत्ता में हनक के साथ वापसी के आसार प्रबल बना देती है।

विकास की झांकी: पीएम मोदी ने सीएम नीतीश कुमार को ‘लाडला मुख्यमंत्री’ बताकर बिहार को यह संदेश दे दिया कि दोनों विकास पुरुष साथ-साथ हैं और इससे राज्य के विकास का सफर तेज रफ्तार में तय होता जाएगा। यह संदेश उस पिछड़े हुए राज्य के लिए सकारात्मक सियासत को नया आयाम देता है, जो नकारात्मक राजनीति के निचले पायदान पर लंबे समय तक त्रस्त रहा। यही कारण है कि जंगल राज के डर से निकाल बेहतर और विकसित बिहार की झांकी बार-बार दिखाई जाती है।

कामयाब जोड़ी: पीएम मोदी और सीएम नीतीश कुमार की जुगलबंदी का असर कामयाबी को परिणाम तक पहुंचा जाता है। नीतीश कुमार की 300 करोड़ की सरकारी योजनाओं को जनता के बीच समर्पित करने वाली दो माह तक चली प्रगति यात्रा और केंद्रीय बजट को बिहारमय बनाकर पेश करने वाली मोदी सरकार ने भागलपुर रैली से एक साथ 400 करोड़ से अधिक की योजनाएं राज्य को सौंपी गईं। इसने चुनाव के पहले आम मतदाताओं के मन में हिलोरें पैदा कर दी हैं।

बना रहेगा साथ: नीतीश कुमार को लाडला सीएम कहकर मोदी ने यह अहसास भी करा दिया कि BJP उन्हें अब छोड़ेगी नहीं और उन्हीं का नेतृत्व बना रहेगा। बदले में सीएम नीतीश फिर यह भरोसा दिला गए कि वह मजबूती से मोदी के साथ ही बने रहेंगे।

दावे पर दावे: नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की साख का चुनावी असर अप्रत्याशित नतीजे ला सकता है। दिल्ली में जीत के बाद BJP पूरे फॉर्म में है और विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की रणनीति अपना रही है। इसी के चलते महागठबंधन के नेता लालू यादव बार-बार शिगूफा छोड़ रहे कि उनके रहते कोई और सरकार कैसे बना सकता है। राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता भी समय-समय पर यह दावा कर सियासी माहौल गरमाते हैं कि नीतीश कुमार फिर से पाला बदल सकते हैं और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सरकार बनेगी।

तेजस्वी की मुश्किल: इस राजनीतिक बयानबाजी को इस रूप में देखा जा सकता है कि तेजस्वी यादव सिर्फ वादों और जातीय समीकरणों के सहारे सत्ता तक पहुंचने की राह को आसान मान रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि BJP ने नीतीश कुमार को अपने पाले में मजबूती से बनाए रखते हुए वोटों का गणित पहले ही तय कर लिया है।

फायदे में जेडीयू: नीतीश कुमार के विकास कार्यों और जाति गणना पूरी होने के बाद बढ़े हुए रिजर्वेशन व महिला आरक्षण से लाभान्वित वर्गों का एक मजबूत वोट बैंक JDU के साथ जुड़ा हुआ है। इसका आंकड़ा बिहार के कुल वोटों का लगभग 16% माना जाता है। दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी का प्रभाव बिहार के मतदाताओं पर व्यापक रूप से देखा जाता है, खासकर युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता हर चुनाव में साफ झलकती है। लोकसभा चुनावों के नतीजे भी इसके गवाह हैं।

कांग्रेस की रणनीति: मोदी-नीतीश के समीकरण और दिल्ली में जीत से मिले आत्मविश्वास को बिहार चुनाव में भी सधे हुए अंदाज में भुनाया जाएगा। इस बीच, दिल्ली की तरह बिहार में भी कांग्रेस अलग चुनाव लड़ने के संकेत दे रही है। यह लालू यादव पर दबाव की रणनीति बनाने का हिस्सा भी हो सकता है ताकि उनसे अधिक सीटें ली जा सकें। अगर दिल्ली की तरह कांग्रेस बिहार में भी I.N.D.I.A. से अलग होकर चुनाव में उतर गई, तो तेजस्वी का मुख्यमंत्री बनने का सपना भी मुश्किल हो जाएगा। इस बीच, रेलवे के ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाले में अदालत की सख्ती अगर लालू परिवार की मुश्किलें और बढ़ाती है, तो इससे NDA की राह और भी आसान हो सकती है।

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