राष्ट्रीय

भारत-रूस संबंधों की नई इबारत

मंगलवार को ऑस्ट्रिया के लिए उड़ान भरने से पहले भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिस आत्मीय माहौल में बातचीत की मेज पर बैठे, वह इस बात की मुनादी थी कि दोनों देशों के बीच सात दशकों पुराना संबंध अब कितना प्रगाढ़ हो चुका है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने शिखर बैठक में आतंकवाद के साथ-साथ यूक्रेन युद्ध का भी जिक्र छेड़ दिया। उल्लेखनीय है, यूक्रेन संकट के कारण रूस पश्चिमी देशों के निशाने पर है, जिसकी प्रतिक्रिया में मॉस्को भी मुखर है। मगर भारत ने बम-बंदूक के बजाय शांति-वार्ता के जरिये समाधान की बात दोहराई। वहीं, आतंकवाद के बहाने रूस को यह एहसास दिलाने की भी कोशिश की गई कि चीन के साथ उसकी नजदीकी परोक्ष रूप से पाकिस्तान को उत्साहित करती है, जो भारतीय जमीन पर आतंकी गतिविधियों को खाद-पानी मुहैया कराने का काम करता है। अच्छी बात यह भी रही कि ईंधन के मामले में भारत को स्थिरता प्रदान करने में रूसी योगदान की प्रधानमंत्री मोदी ने खुलकर सराहना की, जो उचित भी था, क्योंकि अब हम खाड़ी देशों के बजाय सबसे अधिक तेल रूस से ही आयात करने लगे हैं।
इस बैठक से पहले की गई कई अन्य घोषणाएं भी भारतीय हितों के अनुकूल रहीं। मसलन, रूस में दो नए वाणिज्यिक दूतावास खोलने का एलान किया गया है। यह जरूरी था, क्योंकि क्षेत्रफल के हिसाब से रूस से कहीं छोटे देश अमेरिका में हमारे पांच वाणिज्यिक दूतावास हैं, जबकि रूस में अब तक दो ही हैं। बीते करीब तीन दशकों से ऐसा कोई दूतावास रूस में नहीं खुला है, जबकि द्विपक्षीय रिश्ते काफी आगे बढ़ चुके हैं। नए वाणिज्यिक दूतावास के बाद रूस में हमारी गतिविधियां और बढ़ जाएंगी। कारोबार, पर्यटन आदि से जुड़े कामकाज में इजाफा होगा। वहां के बाजार को समझने में कहीं अधिक आसानी होगी और व्यापार को भी फायदा होगा। इसी तरह, यूक्रेन युद्ध में रूस की तरफ से हिस्सा ले रहे भारतीय सैनिकों की वतन वापसी पर बनी सहमति भी काफी अहम है। भारत लगातार यह मांग करता रहा है, जिस पर जल्द ही अमल करने का आश्वासन रूसी राष्ट्रपति ने दिया है।
नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के इस पहले द्विपक्षीय दौरे पर दुनिया भर की नजरें लगी हुई थीं, जो स्वाभाविक ही था। जब रूस और भारत जैसे बड़े देश मिलते हैं, तो द्विपक्षीय के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भी बात होती है। विशेषकर यूक्रेन युद्ध को लेकर सबकी उत्सुकता बनी हुई थी, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत का रुख फिर से स्पष्ट कर दिया। सुखद है कि भारत-रूस संबंध को लेकर अब पश्चिमी देश किसी मुगालते में नहीं हैं। 2000 के दशक में भी रूस के साथ हमारा काफी अच्छा रिश्ता था, बावजूद इसके अमेरिका ने भारत के साथ ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता किया था। आज भी बेशक पश्चिमी देशों ने रूस पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए, लेकिन साल 2023 में भारत ने 46.5 अरब डॉलर मूल्य के कच्चे तेल रूस से मंगाए, जबकि 2021 में यह आंकड़ा सिर्फ 2.5 अरब डॉलर था।
रूस के साथ ऊर्जा सुरक्षा ही नहीं, रक्षा के क्षेत्र में भी हमारी काफी नजदीकी है। रक्षा संबंध करीब 40 साल पुराना है। हम आज भी जितने रक्षा उत्पाद आयात करते हैं, उसका करीब 60-70 फीसदी हिस्सा रूस से ही आता है। ऐसे में, स्वाभाविक है कि इन उपकरणों के रख-रखाव, उन्नतिकरण आदि के लिए भी मॉस्को के साथ लगातार संबंधों को मजबूती दी जाए। फिर, जब कभी हमें जरूरत पड़ी है, रूस हमारी मदद के लिए आगे आया है।
इसी तरह, आपसी कारोबार भी दोनों देशों को काफी करीब ला चुका है। हां, भुगतान एक बड़ा मसला जरूर है, जिस पर इस बार अहम बातचीत हुई है। दरअसल, यूक्रेन युद्ध से पहले दोनों देशों के बीच डॉलर में ही लेन-देन होता था, लेकिन बाद में रूस पर प्रतिबंध और बदली वैश्विक परिस्थितियों के कारण कभी रूबल, तो कभी रुपये, तो कभी संयुक्त अरब अमीरात की मुद्रा दिहरम में व्यापार होने लगा। चूंकि मॉस्को पर लगा प्रतिबंध हाल-फिलहाल में खत्म होता नहीं दिख रहा, इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि भुगतान की कोई स्थायी व्यवस्था बने।
ठीक इसी तरह की चुनौती रूसी संसाधनों को लेकर भी है। रूस चूंकि एक विशाल देश है, इसलिए उसके पास प्राकृतिक ऊर्जा, मिनरल आदि के अपार भंडार उपलब्ध हैं। ऐसे में, हमारे लिए यह जरूरी है कि अपने राजनय संबंधों का बेहतर इस्तेमाल करते हुए हम अपने हितों की पूर्ति करें। अभी वह बेशक पश्चिमी देशों के साथ उलझा हुआ है, लेकिन यह हमारे लिए एक मौका भी है। हमने पश्चिमी प्रतिबंधों को नजरअंदाज कर रूस के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाकर अपनी मंशा स्पष्ट भी कर दी है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा में परोक्ष रूप से चीन पर भी बात हुई। यह स्पष्ट किया गया कि भारत और रूस के रिश्ते पर किसी तीसरे देश, खासतौर से चीन की तरफ से कोई आंच नहीं आनी चाहिए। चीन से हमें सामरिक तौर पर लगातार चुनौती मिलती रही है और वह पाकिस्तान को भी हरसंभव मदद करता रहता है। ऐसे में, मॉस्को से दशकों पुरानी दोस्ती के नाते यह जरूरी था कि हम उसे यह एहसास दिलाएं कि चीन के साथ भारत के रिश्ते तनावपूर्ण हैं, ताकि बतौर मित्र वह हमारी दिक्कतों को समझे और हमारी मदद करे।
वास्तव में, भारतीय प्रधानमंत्री की इस यात्रा के तीन पहलू थे। पहला, रूस के साथ रिश्ते बनाए रखना, साथ ही पश्चिमी देशों को स्पष्ट कर देना कि यह कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तहत नहीं की जा रही। भारतीय हितों की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्व मानवता की बात करना इसी रणनीति का हिस्सा था। दूसरा पहलू है, इस द्विपक्षीय रिश्ते में कौन-कौन से नए क्षेत्र शामिल किए जा सकते हैं, ताकि यह संबंध एक नई ऊंचाई पर पहुंच सके। विज्ञान-प्रौद्योगिकी और ‘पीपुल-टु-पीपुल कॉन्टैक्ट’ यानी आम लोगों के स्तर पर आपसी संबंध को आगे बढ़ाने पर रजामंदी को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए। और तीसरा पहलू है, पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से आने वाली दिक्कतों को दूर करना। भुगतान की टिकाऊ व्यवस्था पर जोर इसकी एक बानगी है।-पंकज सरन, रूस में रहे भारतीय राजदूत

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