संपादकीय

लोकतंत्र के अनुभवों से निराश नेपाल

नेपाल इस समय राजनीतिक एवं आर्थिक अस्थिरता से घिरा है। एक लंबे राजनीतिक आंदोलन के बाद अप्रैल 2008 में नेपाल में राजशाही समाप्त हुई संविधान सभा के चुनाव हुए थे। इससे पूर्व लोकतंत्र की महक का पहला अहसास 1951 में हुआ था, जब 104 वर्ष की राणाशाही का अंत हुआ था।

नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं बीपी कोइराला, गणेश मान सिंह, जीपी कोइराला आदि के संघर्षों का नतीजा था कि 1959 में पहली जनतांत्रिक सरकार अस्तित्व में आई, लेकिन राजवंश को ऐसी कोई व्यवस्था स्वीकार नहीं थी, लिहाजा सभी दलों पर प्रतिबंध लगाकर संविधान एवं संसद को भंग कर दिया गया।

नई सदी में पुनः लोकतंत्र बहाली आंदोलन में वामपंथी संगठनों की व्यापक हिस्सेदारी रही, जिसमें प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) और पुष्पकमल दहल प्रचंड के नेतृत्व वाली माओवादी पार्टी भी शामिल रही। कोइराला बंधुओं के घटते प्रभाव और आंतरिक कलह का नतीजा यह रहा कि प्रजातंत्र बहाली के अगुआ माओवादी और एमाले हो गए।

पिछले 16-17 वर्षों में लोकतंत्र समर्थक दलों के प्रति जनता के अविश्वास का ही नतीजा है कि राजशाही के समर्थन में जनता सड़कों पर उतर आई। नेपाल में इस समय कई विकल्पों पर चर्चा गर्म है। इस चर्चा के बीच ऐसे सवाल भी तैर रहे हैं कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था विफलता की ओर अग्रसर है? क्या पुनः राजशाही ही एकमात्र विकल्प है? क्या नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र बनना चाहिए?

प्रचंड से लेकर नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा तक यह मानने लगे हैं कि जनतंत्र समर्थक सरकारें जनता का विश्वास जीतने में विफल रही हैं। सभी दलों के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है, लेकिन राजशाही के समर्थन में किसी व्यापक जनउभार से ये नेता इन्कार कर रहे हैं।

पिछले दिनों सभी दलों की बैठक में सर्वसम्मति से कहा गया कि राजशाही के समर्थन में निकले जुलूस के पीछे पूर्व राजा ज्ञानेंद्र की शह थी। हाल में नेपाली नव वर्ष (14 अप्रैल) को ज्ञानेंद्र ने जनता के नाम संदेश में कहा कि देश की पूरी व्यवस्था को नए सिरे से सोचना चाहिए। इसी दिन प्रचंड ने दावा किया कि देश को जल्द नई सरकार और नया गठबंधन देखने को मिलेगा।

इस पर प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि सरकार बदलने की बात दिवास्वप्न जैसी है। प्रचंड ने सत्तारूढ़ दल नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर को ओली का साथ छोड़कर खुद के नेतृत्व में सरकार बनाने का प्रस्ताव भी दिया। आगे जो भी हो, सभी दलों के नेता इस पर सहमत दिखते हैं कि पिछले वर्षों में नेपाल में बहुत कम विकास हुआ है।

नेपाल में आर्थिक कठिनाई और राजनीतिक अस्थिरता के बीच भ्रष्टाचार चरम पर है। भ्रष्टाचार ने सरकार, व्यवसाय और समाज के सभी स्तरों पर घुसपैठ कर ली है, जिससे नागरिकों में रोष फैल रहा है। नौकरी पाने, सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच में राजनीतिक रसूख और रिश्वत को आवश्यक माना जाता है।

ऐसे कई घोटाले हुए हैं, जिन्होंने सत्ता के कदाचार को उजागर किया है। सबसे ज्यादा निराशा वामपंथी नेताओं के आचरण को लेकर है, जिन्होंने शुचिता और सादगी को आवश्यक माना था। विलासितापूर्ण जीवनयापन में उन्होंने राजशाही की बराबरी कर ली है। जिन बातों को लेकर ‘महल’ की आलोचना की जाती थी, वे सभी अवगुण इन नेताओं की दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं।

आर्थिक रूप से भी नेपाल अभी खस्ताहाल है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक, 2024 के अनुसार 20 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। नेपाल में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण लोग विदेश पलायन को मजबूर हैं। आर्थिक चुनौतियों के बीच नेपाल का राजनीतिक परिवेश इतना खराब हो चला है कि प्रधानमंत्री ओली जहां भी सभा करने जा रहे हैं वहां, ‘नेता चोर हैं, नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाओ’ जैसे नारे गूंज रहे हैं।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र और राजशाही की बहाली के लिए कई समूह आंदोलन चला रहे हैं। दुर्गा प्रसाई राजशाही के समर्थन में चल रहे आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। इससे पूर्व वह नेपाली कांग्रेस, माओवादी पार्टी और एमाले में रह चुके हैं। नेपाल में 1996 से 2006 तक चले गृहयुद्ध में भी उनकी भूमिका खासी महत्वपूर्ण थी। इस गृहयुद्ध में 17 हजार से अधिक लोग मारे गए थे। राजशाही समर्थक अब संसद पर कब्जे के नारे लगाते दिखते हैं। ‘हिंदू राष्ट्र’ समर्थक कई नेताओं की वार्ता से लगता है कि वे राजशाही की वापसी के प्रति नरमी नहीं रखते, पर देश को फिर हिंदू राष्ट्र बनता हुआ देखना चाहते हैं।

नेपाली जनमत का एक बड़ा वर्ग भारतीय रुख के प्रति सकारात्मक राय रखता है। प्रचंड और ओली की भारत यात्रा निकट भविष्य में संभावित है। दोनों देश की सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत एक-दूसरे को मजबूत धागे में बांधे हुए है। पशुपतिनाथ मंदिर के मुख्य महंत रावल गणेश भट्ट भारतीय हैं और स्वयं को आदि शंकराचार्य का वंशज मानते हैं।

भगवान बुद्ध और माता सीता भी दोनों देशों के संबंधों की कड़ी हैं। लोकतंत्र के कटु अनुभवों ने नेपाली जनमानस को झकझोर कर रख दिया है और भारत विरोधी रुख अपनाने वाले नेता भी अब भारत की भूमिका की प्रशंसा में लगे हैं। हाल में विदेश मंत्री जयशंकर भारत-नेपाल संबंधों पर काफी सक्रिय दिखे, पर ओली के वक्तव्य गलत संदेश दे रहे हैं। वह राजशाही बहाली आंदोलन के पीछे भारत का हाथ देखते हैं।

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