राष्ट्रीय

हार की समीक्षा

हरियाणा में हार की जो समीक्षा कांग्रेस कर रही है, इसे करने का बड़ा दायित्व भी हुड्डा ने अपने कंधों पर ले लिया है। कुमारी शैलजा और रणदीप सुर्जेवाला अगर उसमें अपनी समीक्षा जोड़ेंगे तो और बवाल होगा। पार्टी की और किरकिरी होगी। इसलिए लीपपोत कर यह फैसला करना ज्यादा सुरक्षित था कि शिकायत लेकर चुनाव आयोग के पास जाया जाए। मगर ऐसा करते समय कांग्रेस विद्वान शायर की उस नसीहत को भूल गई कि ‘अपना गम लेकर कहीं और न जाया जाए’ इससे और फजीहत होती है। चुनाव आयोग के पास उसका कोई समाधान नहीं है। वह भी चुटकी लेगा और जनता भी। कुल मिलाकर राहुल गांधी हरियाणा में हार से बेहद नाराज बताए गए हैं। उन्होंने फटकार भी लगाई कि प्रदेश स्तर के  नेताओं ने अपने हितों को पार्टी से ऊपर रखा। हार की समीक्षा के लिए एक कमेटी बना डाली है। क्या राहुल की बनाई कमेटी यह समीक्षा कर पाएगी कि जहां राहुल ने रोड शो किए, वहां पार्टी का प्रदर्शन कमजोर कैसे रहा? 

राजनीति में सबक लिए नहीं जाते। (.. और क्षेत्रों में भी ऐसा ही होता है।) सबक दिए जाते हैं या सिखाए जाते हैं। यही वजह है कि पार्टियां और नेता कभी हार से सबक नहीं सीखते। आपने हजारों बार, हर हार के बाद यह जरूर सुना होगा कि हार की समीक्षा की जाएगी। इसके लिए, (वह भी कभी-कभार) पार्टी पर पकड़ रखने वाले कुछ लोग, वह पदाधिकारी हों या न हों, मिलकर बैठते हैं और हार के हजार बहाने जुटा लेते हैं। वर्ष 2004 के चुनाव में भाजपा का फीलगुड फैक्टर ‘शाइनिंग इंडिया’ फेल हुआ और लाल कृष्ण अडवानी की ‘भारत उदय यात्रा’ 33 दिन में 15 राज्यों की 128 लोकसभाओं और 8500 किलोमीटर का चक्कर काट कर भी कोई नतीजा नहीं दे पाई थी, तब भाजपा ने इस बात पर जोर दिया था कि वह अपनी हार की समीक्षा करेगी।  

सबसे आसान तरीका तो यह होता है कि पार्टी प्रमुख चाहे वह प्रदेश स्तर का हो या राष्ट्रीय स्तर का, बदल दिया जाए। लेकिन यहां तो यह भी नहीं हुआ। संविधान पर अटरम-पटरम कहानी कहने वाले 4 सांसदों को पार्टी निलंबित तक नहीं कर सकी। आगे की कार्रवाई की बात तो और है। भीतरघात का आरोप झेल रहे कई मंत्री आज भी पूरे जलवे से पद पर हैं। कांग्रेस की कहानी अलग नहीं है। कांग्रेस कोई पहली बार नहीं हार रही है। 2014 के बाद से कांग्रेस को  62 में से 47 चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। उनकी हार की समीक्षा  ई.वी.एम. पर आकर अटक जाती है। जीतते हैं तो ई.वी.एम. ठीक, नेतृत्व प्रभावशाली होता है और हारते हैं, तो बात समीक्षा पर टिक जाती है। 2014-2019 में सिर्फ 10 फीसदी के आसपास सीटें आईं तो मूल कारणों पर कोई बात नहीं हुई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में जब आंकड़ा 543 सीटों वाले सदन में 99 हो गया तो राहुल गांधी की मेहनत को पूरा श्रेय दिया गया। 

राष्ट्रीय पार्टियों के साथ-साथ अगर क्षेत्रीय दलों की बात करें तो वहां हार की समीक्षा करने जैसी कोई परंपरा ही नहीं दिखती। ज्यादातर क्षेत्रीय पाॢटयां एक परिवार या व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती हैं। चुनाव की सारी नीतियां वही तय करते हैं। ऐसे में पार्टी हारती है तो बिल्ली के गले में घंटी भला कौन बांधे वाली बात होती है। जो ऐसी हिमाकत दिखाता है, उसे बाहर कर दिया जाता है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल ने भी हार के बाद समीक्षा करने की बात कही थी, मगर ऐसा कुछ होता नहीं दिखा। वहां सुखबीर बादल स्वयं पार्टी हैं, जो उनसे सहमत नहीं है, वह अन्य पार्टियों में जा सकता है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की पार्टी सपा में कई तरह के सुर उनके परिवार से ही निकलते हैं। इसलिए वहां थोड़ी बहुत समीक्षा की गुंजाइश बन जाती है। हारना-जीतना चलता रहता है पर पार्टी में सुधार कितना हुआ,यह जरूर देखा जाना चाहिए। अधिकांशत: एक या दो नेता पूरी पार्टी को चलाते हैं। हर जीत का सेहरा वे अपने सिर बांधते हैं मगर हार की जिम्मेदारी लेने का नैतिक साहस हर नेता नहीं ले पाता। इसलिए बलि का बकरा तलाशने के लिए कमेटियां बनाई जाती हैं। यह खेल ऐसे ही चलता रहेगा।-अकु श्रीवास्तव

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