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मूवी रिव्यू: छोरी 2

इसमें कोई दो राय नहीं कि बीते कुछ सालों में फिल्मों में हॉरर का स्पेस री-डिफाइन हुआ है। पचास-साठ के दशक में ‘महल’, ‘वो कौन थी’, ‘कोहरा’ जैसी हॉरर फिल्मों का बोलबाला रहा। फिर आया हॉरेक्स (हॉरर और सेक्स का मिश्रण) का दौर, जो रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्मों से खूब चला। उसके बाद आईं राम गोपाल वर्मा का थ्रिलर हॉरर और विक्रम भट्ट की भूतिया फिल्में। बीते दिनों हॉरर-कॉमिडी जोरों पर रही और अब हमारे फिल्मकार भारतीय दंत कथाओं पर आधारित मुद्दे लेकर आ रहे हैं, उसी कड़ी को आगे बढ़ाने वाली फिल्म है ‘छोरी 2’। यह फिल्म 2021 आई छोरी का सीक्वल है।

सीक्वल की तर्ज पर कहानी 7 साल बाद शुरू होती है, जहां साक्षी (नुसरत भरूचा) अपनी 7 साल की बेटी इशानी (हार्दिका शर्मा) के साथ एक गुमनाम जिंदगी बिता रही है। कहानी को आगे बढ़ाने से पहले हम आपको बता दें कि सात साल पहले इसके पहले भाग में साक्षी अपने पति और ससुराल वालों से खुद की और अपनी बेटी की जान बचा कर भागी थी। साक्षी कुप्रथा और कुरीतियों से भरे एक ऐसे समाज से लड़ी थी, जो बच्चियों को पैदा होते ही मार दिया जाता है। नई जगह पर साक्षी के पुनर्वसन में इंस्पेक्टर समर (गश्मीर महाजन) उसका साथ देता है। उसी ने साक्षी को सात साल पहले भी बचाया था। इशानी एक बहुत ही रेयर बीमारी से पीड़ित है। धूप में जाने पर उसका पूरा शरीर फफोलों से जलने लगता है। यही कारण है कि उसे स्कूल में भी दाखिला नहीं मिलता, मगर साक्षी इस बात से वाकिफ नहीं है कि बेटी इशानी का यह रोग उन्हें काले अतीत में ले जाने का जरिया बनेगा। एक दिन मृत मान लिए गए पति (सौरभ गोयल) द्वारा अचानक इशानी के अपहरण के बाद साक्षी और समर उसे खोजते हुए उसी भयानक गांव और भूतिया गन्ने के खेतों में पहुंच जाते हैं, जिसके चंगुल से वे जान बचाकर भागे थे। इस बार उस गांव में एक दासी मां (सोहा अली खान) भी हैं, जो प्रधान जी की पत्नी है। प्रधान जी को गांव वाले आदि मानव मानते हैं। वह रहस्यमई गुफा में रहता है और सालों से कुंवारी लड़कियों के ‘समर्पण’ पर जिंदा है। समर्पण अर्थात उसे कुंवारी लड़कियों का यौवन सौंपा जाता है। साक्षी और इशानी को गांव के कुंए के अंदर एक भयनाक भूमिगत दुनिया में कैद कर लिया जाता है। दासी मां इशानी को प्रधान जी को समर्पित करने वाली है, जिसके बाद गांव वालों का मानना है कि उनके इलाके में खुशहाली बहाल हो जाएगी। क्या साक्षी अपनी 7 साल की बेटी को इस कुप्रथा का शिकार होने से बचा पाएगी या फिर खुद बलि चढ़ा दी जाएगी? ये जानने के लिए आपको हॉरर की इस दुनिया में दाखिल होना होगा।

कई जगहों पर कहानी सुस्त हो जाती है

निर्देशक विशाल फुरिया की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अपनी स्टोरी टेलिंग में हॉरर कॉमिडी या हॉरेक्स जैसी प्रचलित जॉनर को न चुनकर लोक कथाओं को फिल्म का आधार बनाया। निर्देशक सुरंगों के अंदर एक महिला विरोधी दुनिया रचते हैं, जो औरत की दासता का प्रतीक है। निर्देशक विशाल फुरिया ने लेखक विशाल कपूर के साथ मिलकर हॉरर के साथ जो बच्चियों को पैदा होते ही मार दिया जाना, बाल विवाह, काढ़ा पिलाकर बच्चियों को बड़ा किया जाना, लड़की जात के प्रति घोर घृणा जैसे मुद्दों को बहुत ही शानदार अंदाज में बुना है, मगर उनके सीक्वेंस काफी लंबे हो गए हैं, यही वजह है कि कई जगहों पर कहानी सुस्त हो जाती है और दोहराव महसूस होता है, मगर इसके बावजूद हॉरर अपनी भयावहता को बनाए रखता है। वीएफएक्स और ज्यादा अच्छे हो सकते थे, मगर अंशुल चौबे का कैमरा वर्क और केतन सोढ़िया का संगीत रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा करने के लिए काफी है। टॉप एंगल से लिए गए कुछ दृश्य कमाल के बन पड़े हैं। क्लाइमैक्स दमदार है। हॉरर के शौकीन इसे स्लोबर्न भी कह सकते हैं।

सोहा अली खान दासी मां की भूमिका में

अभिनय के मामले में चाहे वो नुसरत भरूचा हों या सोहा अली खान, दोनों में से कोई भी उन्नीस साबित नहीं हुआ है। नुसरत फिल्म का केंद्र हैं। उन्हें इस फिल्म में भूतिया दुनिया से अपनी बच्ची को वापिस लाने की एक बेहद ही सशक्त भूमिका मिली है, जिसे नुसरत अपनी अदायगी से विशिष्ट बनाती हैं। चुनिंदा भूमिकाओं में नजर आने वाली सोहा अली खान ने दासी मां की भूमिका को हॉरर की आड़ में कहीं भी ओवर द टॉप नहीं होने दिया है। दासता के बेड़ियों में जकड़ा यह किरदार जितना डरावना है, समय आने पर उतना ही हिम्मती भी। बाल कलाकार हार्दिका शर्मा अपने मासूम अभिनय से दिल जीत लेती हैं। खास कर उन्हें दुल्हन बनाया जाने वाला दृश्य बहुत मार्मिक बन पड़ा है। चूंकि यह महिला प्रधान फिल्म है, तो इसमें पुरुष किरदारों को उतना स्क्रीन स्पेस नहीं मिला है, इसके बावजूद समर के रोल में गमशीर महाजन और पति की भूमिका में सौरभ गोयल ने अपने चरित्रों के साथ न्याय किया है। सपोर्टिंग कास्ट ठीक-ठाक है।

कुरीतियों की पड़ताल करने वाली हॉरर फिल्म के शौकीन यह फिल्म हैं।

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