‘मां’ बनेगा चुनावी मुद्दा?

2007 में गुजरात विधानसभा चुनाव होने थे। 2002 के गोधरा कांड और सांप्रदायिक दंगों के लहूलुहान वाला दौर सतही तौर पर शांत हो चुका था। नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे। उन पर दंगों और हत्याकांड के परोक्ष आरोप थे और विभिन्न आयोग जांच कर रहे थे। योगेंद्र यादव सरीखे प्रख्यात चुनाव पंडित ने भाजपा की पराजय के विश्लेषण किए थे। उस दौर में मोदी को ‘मौत का सौदागर’ बोल दिया गया। उनके लिए ‘जहर की खेती’ सरीखे शब्द भी कहे गए। उन पर ‘खून की दलाली’ जैसे शब्द भी चस्पां किए गए। मुख्यमंत्री मोदी ने उन अपशब्दों को 5-6 करोड़ गुजरातियों के अपमान से जोड़ दिया। शेष मुद्दे नेपथ्य में चले गए। गुजरातियों का मान-सम्मान चुनावी मुद्दा बन गया। भाजपा को शानदार जनादेश हासिल हुआ। उसी तरह बिहार में भी चुनावी हवा बदल न जाए, हमें आशंका होती है। बिहार में राजद-कांग्रेस-वामदल की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ समाप्त हुई और प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपनी दिवंगत मां को दी गई गाली का मुद्दा उठा दिया। बेशक विपक्ष के मंच से प्रधानमंत्री की मां को गाली दी गई थी। वाकई गाली, अपशब्द नहीं, भद्दी गाली दी गई थी, जिसे नैतिकता और मर्यादा के मद्देनजर हम लिख भी नहीं सकते। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा-मेरी 100 वर्षीय मां अब इस दुनिया में नहीं है। वह मुझे छोड़ कर जा चुकी है। मां का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था। मां ने गरीबी के बीच ही हमें पाला-पोसा और मां भारती की सेवा के संस्कार दिए। उस मां को भद्दी-भद्दी गालियां दी गईं। यह बिहार ही नहीं, देश की करोड़ों माताओं, बहनों, बेटियों का अपमान है। भले ही मैं व्यक्तिगत रूप से गाली देने वालों को माफ कर दूं, लेकिन छठ मैया को पूजने वाले बिहार के लोग उन्हें क्षमा नहीं करेंगे।’’ यकीनन प्रधानमंत्री के कथन के भाव यही थे, कुछ शब्दों का अंतर हो सकता है। किसी की भी मां को गाली देना पाप है, अक्षम्य अपराध है और उसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री का मानना सही है कि मां का स्थान देवी-देवताओं से भी ऊपर है। वह जननी है। हमने ईश्वर को तो नहीं देखा, लेकिन ईश्वर के प्राणियों की जननी को देखा है, लिहाजा मां में ईश्वर का प्रतिरूप अनुभव किया जा सकता है। विडंबना यह है कि विपक्ष के प्रवक्ता और कुछ छुटभैया नेता गाली को भी न्यायोचित करार देने में जुटे हैं। यह राजनीतिक कुंठा और हताशा है। कुछ हद तक नफरत भी है।
हालांकि लोकतंत्र में ऐसे भाव की राजनीति की कोई गुंजाइश नहीं है। कमोबेश ऐसी सोच पर निर्णायक जनादेश नहीं मिला करते। हम स्वीकार करते हैं कि प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी ने भी 2014 के चुनाव में ‘जर्सी गाय’, ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’, ‘कांग्रेस की विधवा’ आदि अपशब्दों का प्रयोग किया था। हालांकि ये प्रतीकात्मक शब्द थे। प्रत्यक्ष रूप से ‘गलीनुमा’ गाली नहीं दी गई थी। मोदी इन अपशब्दों से भी बचे और बाद के चुनावों में इन्हें नहीं दोहराया। विशेषण, रूपक और भद्दी गाली में आकाश-पाताल का अंतर होता है। अब प्रधानमंत्री की मां को गाली देने की, मर्यादा के पतन की पराकाष्ठा छू लेने की भद्दी कोशिश की गई है। यही नहीं, देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री को भी 100 से अधिक गालियां दी जा चुकी हैं। हम कई बार वे विश्लेषण कर चुके हैं। सवाल है कि क्या इसे भी लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी माना जाए? प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव अभियानों में इन गालियों को भी मुद्दा बनाया और लोगों ने निर्णायक जनादेश दिए। बिहार में प्रधानमंत्री मोदी को ‘वोट चोर’ करार देकर भी नारे लगवाए गए हैं। हम मतदाता सूचियों में विसंगतियों से इंकार नहीं कर रहे। शायद इसीलिए संविधान में अनुच्छेद 324 और 326 के तहत चुनाव आयोग को शक्तियां दी गई हैं कि वह सूचियों का पुनरीक्षण कर सके। यह मामला सर्वोच्च अदालत में भी सुना जा रहा है। अदालत ने चुनाव आयोग के एकदम खिलाफ कोई फैसला नहीं सुनाया। बेशक इस मुद्दे पर विपक्ष ने खूब शोर मचाया है, लेकिन जनादेश की कोई गारंटी नहीं है। यदि प्रधानमंत्री की मां को गाली देना चुनावी मुद्दा बन गया, तो चुनाव की हवाएं बदल भी सकती हैं। इस तरह के मुद्दे उछलने के कारण महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार जैसे कई जरूरी मुद्दों पर सार्थक चर्चा नहीं हो पाती है।



