राजनीति

मोहन भागवत ने सरकार को दी नसीहत तो… पीएम मोदी ने संघ प्रमुख के भाषण पर किया रिएक्ट?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बृहस्पतिवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के वार्षिक विजयादशमी संबोधन की सराहना की है। उन्होंने संघ प्रमुख के भाषण को प्रेरणादायक बताया। साथ ही कहा कि उन्होंने भारत की नयी ऊंचाइयों को छूने की अंतर्निहित क्षमता को उजागर किया।

नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के संबोधन की तारीफ की है। पीएम मोदी ने कहा कि भागवत के भाषण ने राष्ट्र निर्माण में आरएसएस के समृद्ध योगदान पर प्रकाश डाला और पूरे विश्व को लाभान्वित करते हुए गौरव की नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने की भारत की अंतर्निहित क्षमता पर जोर दिया।

एक्स पर एक पोस्ट में, पीएम मोदी ने कहा कि परम पूज्य सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का एक प्रेरणादायक संबोधन, जिसमें राष्ट्र निर्माण में आरएसएस के समृद्ध योगदान पर प्रकाश डाला गया है और हमारे देश की जन्मजात क्षमता पर जोर दिया गया है ताकि वह गौरव की नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर सके, जिससे हमारे पूरे ग्रह को लाभ हो। मोदी 1980 के दशक में बीजेपी में शामिल होने से पहले आरएसएस के प्रचारक थे।

संघ प्रमुख ने क्या कहा था?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को व्यक्तिगत चरित्र निर्माण के महत्व और अनुशासन एवं मूल्य-संचालित नागरिकों के पोषण में शाखा प्रणाली की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने देश के लिए समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण पर आधारित एक सफल विकास मॉडल की आवश्यकता पर बल दिया ताकि आगामी चुनौतियों से बचा जा सके।

उन्होंने कहा कि हम अभी भी उन राजनीति और ढांचों के भीतर काम कर रहे हैं, जिनकी अपर्याप्तताएं हमारे सामने उजागर हो चुकी हैं… लंबे समय में, हमें धीरे-धीरे बदलाव करना होगा। हालांकि, हमारे और दुनिया के सामने आने वाली चुनौतियों से खुद को बचाने का कोई और तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि हमें अपने समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण के आधार पर एक सफल विकास मॉडल बनाने और इसे दुनिया के सामने पेश करने की आवश्यकता है।

भागवत की सरकार को नसीहत

संघ प्रमुख ने बढ़ती असमानता, आर्थिक शक्ति का केंद्रीकरण और शोषकों द्वारा शोषण को आसान बनाने वाले नए तंत्रों को मजबूत करने, पर्यावरण क्षरण तथा वास्तविक पारस्परिक संबंधों के बजाय लेन-देनवाद एवं अमानवीयता के उदय जैसी कमियों का हवाला दिया। भागवत ने कहा कि प्रचलित अर्थ प्रणाली के अनुसार, देश आर्थिक विकास कर रहा है। लेकिन प्रचलित अर्थ प्रणाली के कुछ दोष भी सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था में शोषण करने के लिए नया तंत्र खड़ा हो सकता है और इससे पर्यावरण की हानि हो सकती है।

जब सरकार जनता से दूर रहती है और उनकी समस्याओं से अनभिज्ञ रहती है और उनके हित में नीतियां नहीं बनतीं, तो लोग सरकार के खिलाफ हो जाते हैं। लेकिन अपनी नाखुशी जाहिर करने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल करने से किसी को कोई फायदा नहीं होता। हिंसक विरोध प्रदर्शनों से कोई मकसद हासिल नहीं होता, बल्कि देश के बाहर बैठी शक्तियों को अपना खेल खेलने का एक मंच मिल जाता है।

मोहन भागवत, सरसंघचालक
उन्होंने कहा कि हाल ही में अमेरिका ने जो टैरिफ नीति अपनाई, उसकी मार सभी पर पड़ रही है। ऐसे में हमें मौजूदा अर्थ प्रणाली पर पूरी तरह से निर्भर नहीं होना चाहिए। निर्भरता मजबूरी में न बदलनी चाहिए। इसलिए निर्भरता को मानते हुए इसको मजबूरी न बनाते हुए जीना है तो स्वदेशी और स्वावलंबी जीवन जीना पड़ेगा। साथ ही राजनयिक, आर्थिक संबंध भी दुनिया के साथ रखने पड़ेंगे, लेकिन उन पर पूरी तरह से निर्भरता नहीं रहेगी।

1925 में दशहरा के दिन हुई थी स्थापना

आरएसएस की स्थापना 1925 में दशहरा के दिन नागपुर में महाराष्ट्र के चिकित्सक केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। इस विजयादशमी उत्सव के साथ आरएसएस अपना शताब्दी वर्ष भी मना रहा है। कुछ लोगों से शुरू हुआ यह संगठन आज देश का सबसे व्यापक गैर-सरकारी संगठन बन गया है। बीजेपी वैचारिक रूप से इस हिंदुत्ववादी संगठन से प्रेरित है।

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