मोदी, योगी, भागवत… मालेगांव ब्लास्ट केस में बरी साध्वी प्रज्ञा का छलका दर्द, बोलीं मुझे ये नाम लेने के लिए टॉर्चर किया गया

नई दिल्ली: हाल ही में मालेगांव ब्लास्ट केस में सभी आरोपों से बरी हुईं साध्वी प्रज्ञा ने एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि उन्हें टॉर्चर किया गया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, RSS चीफ मोहन भागवत और कई अन्य लोगों का नाम लेने के लिए मजबूर किया गया। मुंबई की एक स्पेशल NIA कोर्ट ने 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में प्रज्ञा समेत सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया था। इस ब्लास्ट में 6 लोगों की जान चली गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कोर्ट ने मृतकों के परिवारों को 2 लाख रुपये और घायलों को 50,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
साध्वी प्रज्ञा ने शनिवार को कहा कि उन्हें झूठ बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा था। इसलिए उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया। उन्होंने कहा, ‘उन्होंने मुझसे राम माधव समेत कई लोगों का नाम लेने को कहा। ऐसा करने के लिए उन्होंने मुझे टॉर्चर किया, मेरे फेफड़े खराब हो गए… मुझे गैरकानूनी तरीके से एक अस्पताल में रखा गया। यह सब मैं अपनी कहानी में बताऊंगी, लेकिन सच्चाई को दबाया नहीं जा सकता। मैं गुजरात में रहती थी, इसलिए उन्होंने मुझसे प्रधानमंत्री मोदी (जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे) का नाम भी लेने को कहा। मैंने किसी का नाम नहीं लिया क्योंकि वे मुझसे झूठ बुलवाना चाहते थे।’
उन्होंने आगे कहा कि उन पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मोहन भागवत और संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी इंद्रेश कुमार का नाम लेने का भी दबाव डाला गया। उन्होंने आरोप लगाया, ‘उन्होंने कहा कि इन लोगों का नाम लो और हम तुम्हें नहीं मारेंगे।’ लगभग 17 साल बाद, मुंबई की एक स्पेशल NIA कोर्ट ने 31 जुलाई को 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में पूर्व बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया। सभी पहले से ही जमानत पर बाहर थे।
यह ब्लास्ट 29 सितंबर, 2008 को नासिक जिले के मालेगांव शहर में हुआ था। इसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। कोर्ट ने मृतकों के परिवारों को 2 लाख रुपये और प्रत्येक घायल पीड़ित को 50,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ब्लास्ट में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल का चेसिस नंबर मिटा दिया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि ठाकुर उस वाहन की मालिक थीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्होंने घटना से दो साल पहले संन्यास ले लिया था और भौतिक सुखों का त्याग कर दिया था।



