संपादकीय

मोदी-ट्रंप वार्ता

यह ध्रुव सत्य है कि अमेरिका की तमाम रीतियां व नीतियां अमेरिका से शुरू होकर अमेरिका पर ही खत्म हो जाती हैं। जहां उसे अपने आर्थिक व सामरिक हित नजर आते हैं, वहीं उसकी सभी रीति-नीतियां ठहर जाती हैं। दशकों से आतंक की पाठशाला चला रहे पाकिस्तान को आंतकवाद के खिलाफ कथित साझेदारी के लिये उपकृत करने वाले अमेरिका के मंसूबों को समझा जा सकता है। विडंबना यह है कि पिछले एक महीने से भी ज्यादा समय से अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ऑप्रेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान को कथित रूप से युद्ध विराम के लिये सहमत कराने के लिये खुद की ही पीठ थपथपा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि उन्होंने दस मई को अमेरिका की मध्यस्थता में देर रात तक बातचीत के दावे के बाद कथित रूप से पूर्ण और तत्काल युद्ध विराम की घोषणा करके दुनिया को चौंका दिया था। पल-पल अपना रुख बदलने के लिये कुख्यात ट्रंप इस विवादास्पद मामले पर अपनी बात मनवाने पर अड़े हुए हैं। मगर बार-बार उनके द्वारा दोहराए जाने वाले दावे भारत की परेशानी का सबब बन रहे हैं। भारत ने ऐतिहासिक रूप से द्विपक्षीय विवादों को तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से दूर रखा है। अब, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रिकॉर्ड को सही करने का प्रयास किया है, और वह भी खुद अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ टेलीफोन पर बातचीत के दौरान। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत ने इस्लामाबाद के अनुरोध पर ऑप्रेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के खिलाफ हमलों को रोक दिया था, न कि मध्यस्थता या अमेरिका द्वारा किसी व्यापार सौदे की किसी पेशकश के कारण। यह दावा डोनाल्ड ट्रंप के उस प्रचार को सिरे से खारिज करता है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान को समझाने के लिये व्यापार कार्ड का इस्तेमाल किया था। लेकिन इसके बावजूद बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री की सीधी बात ट्रंप को समझ आएगी? क्या ये बातचीत ट्रंप को भारत व पाक मामलों में हस्तक्षेप करने से रोके पाएगी?

लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया कारगुजारियों से तो ऐसा होता नजर नहीं आता। पहले बात अमेरिका को स्पष्ट समझा दी जानी चाहिए कि वह भारत व पाक को एक तराजू में तोलने की भूल न करे। हाल की अमेरिका यात्रा के दौरान जिस तरह ट्रंप प्रशासन ने विवादास्पद पाकिस्तान सेना प्रमुख असीम मुनीर को तरजीह दी, उसका कोई तार्किक आधार नजर नहीं आता। बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने व्हाइट हाउस में पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की लंच पर मेजबानी करके नवीनतम भड़काऊ कदम ही उठाया है। उसे देखते हुए यह संभावना असंभव ही लगती है कि ट्रंप दोनों देशों के मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आएंगे। यह वही मुनीर आलम है जिन्होंने पहलगाम आतंकी हमले से बमुश्किल एक सप्ताह पूर्व कश्मीर को पाकिस्तान के गले की नस बताया था। इसके अलावा उन्होंने संकीर्ण सांप्रदायिक टिप्पणियां भी की थी। यह बात अतार्किक ही लगती है कि अमेरिका पाक को अपने साथ आतंकवाद विरोधी साझेदारी को मजबूत करने में उनकी भूमिका के लिये पुरस्कृत कर रहा है। दोनों देशों के बीच पक रही यह खिचड़ी भारतीय कूटनीति के लिये एक बड़ी चुनौती कही जा सकती है। मोदी सरकार को पाकिस्तान को खुले समर्थन को लेकर अमेरिका का सामना करने के पक्ष और विपक्ष के हमलों का मुकाबला करना होगा। निश्चित रूप से दशकों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से पीड़ित भारत इस स्थिति को हल्के में नहीं ले सकता। भारत को पाकिस्तान द्वारा कश्मीर मुद्दे के अंतर्राष्ट्रीयकरण के प्रयासों को विफल करने के लिये हर संभव प्रयास करने होंगे। अब चाहे अमेरिका को ये पसंद आए, चाहे न आये। भारत के लिये यह कूटनीतिक चुनौती है और देशकाल परिस्थितियों के अनुरूप भारत को अपनी रीतियों-नीतियों को नए सिरे से निर्धारित करना चाहिए। यह जानते हुए कि हमारा दशकों से विश्वसनीय साथी व महाशक्ति रहा रूस आज उतनी मजबूत स्थिति में नहीं है। लंबे खिंच रहे यूक्रेन संघर्ष ने रूस की अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में कभी मजबूत रही स्थिति को कमजोर ही किया है। ऐसे में भारत को बदलते परिदृश्य में कूटनीति को नये सिरे से परिभाषित करना होगा।

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