संपादकीय

आज़ादी का दुरुपयोग

पिछले दिनों एक विवादास्पद मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संबंधित कानूनों के अनुपालन की जरूरत महसूस करते हुए ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के लिये एडवाइजरी जारी की है। निस्संदेह यह वक्त की जरूरत है। दरअसल, हाल ही में एक यूट्यूबर की अभद्र टिप्पणी से पैदा हुए विवाद पर देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई थी। केंद्र सरकार की पहल को शीर्ष अदालत के सख्त रुख के आलोक में देखा जा रहा है। पारिवारिक मूल्यों वाले भारतीय समाज में अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग करते हुए अमर्यादित व संवेदनहीन टिप्पणी के मामले गाहे-बगाहे प्रकाश में आते रहते हैं। यही वजह है कि इलाहाबादिया प्रकरण में कई राज्यों में आपराधिक मामले दर्ज कर किए गए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को गिरफ्तारी से राहत तो दी मगर सख्त टिप्पणी भी की थी कि वे दिमागी गंदगी को थोप रहे हैं, जिससे समाज शर्मसार हुआ है। लेकिन इस प्रकरण ने अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं के नियमन की बहस को नये सिरे से शुरू कर दिया। हालांकि, आपातकाल के सीमित कालखंड को छोड़ दें तो देश में हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान किया गया है। सुप्रीम कोर्ट समेत कई उच्च न्यायालयों ने अभिव्यक्ति की आजादी को अक्षुण्ण बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। लेकिन आजादी के अतिक्रमण के बाद सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने ओटीटी प्लेटफॉर्म हेतु एडवाइजरी जारी करते हुए संबंधित कानून के सभी प्रावधानों के अनुपालन सुनिश्चित करने को कहा है। निस्संदेह, इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाओं के निर्धारण की आवश्यकता है।

हाल के दिनों में डिजिटल मंचों पर अश्लीलता व हिंसक अभिव्यक्ति के चलते इनके नियमन की जरूरत महसूस की जा रही है। खासकर पारिवारिक जीवन मूल्यों का अतिक्रमण करने वाली टिप्पणियों पर रोक जरूरी है। यदि स्थिति में सुधार नहीं होता तो बहुत संभव है कि सरकारी निगरानी बढ़ जाए। दरअसल, सूचना प्रसारण मंत्रालय ने इस बाबत बनी संसदीय समिति से कहा है कि समाज में इस बात को लेकर रोष है कि अभिव्यक्ति की आजादी के संवैधानिक अधिकार का अतिक्रमण करके हिंसक व अश्लील सामग्री का प्रसारण किया जा रहा है। वहीं संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति का कहना है कि इसके नियमन के लिये कुछ कानून तो हैं लेकिन वर्जित सामग्री के नियमन के लिये नया प्रभावी कानून होना चाहिए। ऐसी राय देश के जनप्रतिनिधियों, अदालतों तथा कुछ वैधानिक संस्थाओं ने व्यक्त की है। देश की शीर्ष अदालत का मानना रहा है कि यूट्यूब जैसे मंचों पर सामग्री साझा करने पर नियंत्रण हेतु कानून निष्प्रभावी नजर आते हैं। अब नये मीडिया मंचों पर विवादास्पद सामग्री पर अंकुश लगाने के लिये कानून में संशोधन की भी बात कही जा रही है। इसकी वजह यह भी है कि परंपरागत प्रिंट व इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तो इस बाबत बने कानून के दायरे में आते हैं, लेकिन नए डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिये प्रभावी कानून नहीं है। निश्चित रूप से संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने की जरूरत है।

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