संपादकीय

पलायन-रोजगार का चुनाव

बिहार का चुनाव समतली जमीन पर आ चुका है। विपक्ष के महागठबंधन में जो भीतरी द्वन्द्व और विरोधाभास थे, वे तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री और वीआईपी अध्यक्ष मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के बाद लगभग समाप्त हो चुके हैं। कुछ सीटों पर कांग्रेस, राजद, सीपीआई (माले) और वीआईपी के उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं। इसे ‘दोस्ताना मुकाबला’ करार दिया जा रहा है। महागठबंधन के नेताओं ने इस विरोधाभास के समाधान की भी बात कही है। जिस प्रेस वार्ता में तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने, घोषित किया, उसके पोस्टर पर सिर्फ तेजस्वी का ही चित्र था। न लालू यादव-राबड़ी देवी का और न ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) राहुल गांधी का चित्र लगाया गया। लालू तो अब भी राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और राहुल-तेजस्वी ने साझा तौर पर ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। अब वह ‘साथ’ कहां गायब हो गया? बहरहाल आज ‘वोट चोरी’ का मुद्दा भी गायब है, क्योंकि पलायन और रोजगार सबसे संवेदनशील चुनावी मुद्दे के तौर पर उभरे हैं। तेजस्वी ने ‘हर घर, एक सरकारी नौकरी’ का जो मुद्दा जनता के सामने पेश किया है, उसका असर बिहार में स्पष्ट रूप से देखा-महसूसा जा सकता है। हालांकि बिहार के 2.76 करोड़ घर-परिवारों में से 2.5 करोड़ घरों को भी सरकारी नौकरी मुहैया कराने पर करीब 9 लाख करोड़ रुपए सालाना चाहिए। बिहार का बजट ही 3.17 लाख करोड़ रुपए का है और उस पर 4 लाख करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज है।

पूंजी कहां से आएगी, यह बहस सत्तारूढ़ और विपक्ष के राजनीतिक दलों के दरमियान तो जारी है, टीवी चैनलों पर भी यह बहस सुनी जाती रही है, लेकिन यह जनता का विश्लेषण और उसकी चिंता नहीं है। जनता मान रही है कि जिसकी सरकार बनेगी, पूंजी का बंदोबस्त भी वही करेगी। कांग्रेस ने भी ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ का नारा देकर तेजस्वी के कार्यक्रम का समर्थन किया है। रोजगार से ही पलायन का मुद्दा जुड़ा है। चुनाव आयोग के मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के अतिरिक्त विशेषज्ञों के आकलन हैं कि करीब 50 लाख बिहारी देश के विभिन्न हिस्सों में नौकरी या मजदूरी अथवा रिक्शा चालन का काम करते हैं और बिहार में मौजूद परिवार का पेट पालते हैं। अधिकांश ये प्रवासी बिहारी असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्रों में कार्यरत हैं, लिहाजा यह तय नहीं है कि कितने लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए ही बिहार लौटेंगे? मतदान और छठ में कई दिनों का फासला है। निजी दुकानदारियों पर काम करने वाले इतने दिन तक बिहार में कैसे रह सकते हैं? उनके मालिक ही अनुमति नहीं देंगे। कइयों को मतदाता सूचियों से ही बाहर कर दिया गया है। कोई भी दल इन प्रवासी मतदाताओं को बिहार तक लिवाने में व्यापक तौर पर उत्सुक, इच्छुक नहीं है। बेशक मताधिकार देश के औसत वयस्क नागरिक का संवैधानिक मौलिक अधिकार है, लेकिन इसे संस्थानात्मक रूप नहीं दिया गया है। पलायन और प्रवासी बिहारियों को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा-जनता दल-यू और राजद, कांग्रेस, वामपंथी आदि चिंतित जरूर हैं, क्योंकि वे किसे वोट देंगे, यह निश्चित नहीं है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने, प्रधानमंत्री मोदी की भरपूर मदद से, रोजगार-नौकरी की एक परियोजना घोषित की है कि यदि सरकार बनी, तो वे अगले 5 साल के दौरान 1 करोड़ रोजगार/नौकरी मुहैया कराएंगे। यही नहीं, मुख्यमंत्री ने ऐसा कोई विभाग, कर्मचारी, समुदाय, आंगनबाड़ी आदि नहीं छोड़ा है, जिसके आर्थिक संसाधनों की बढ़ोतरी न की हो। लेकिन सत्तारूढ़ पक्ष के लिए फिलहाल यह निश्चित नहीं है कि चुनाव के बाद नीतीश ही मुख्यमंत्री बनेंगे!

गृहमंत्री अमित शाह ने भी घोषणा की है कि चुनाव के बाद विजयी विधायक तय करेंगे कि मुख्यमंत्री कौन होगा? हालांकि प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा के सभी शीर्ष नेता बार-बार दोहरा रहे हैं कि चुनाव नीतीश के नेतृत्व में लड़ा जा रहा है। महाराष्ट्र में भी चुनाव तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में लड़ा गया था, लेकिन चुनाव के बाद देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया। केंद्रीय मंत्री एवं एनडीए में ‘हम’ पार्टी के अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने कहा है कि चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री का चेहरा तय किया जाना चाहिए। नतीजतन एनडीए में मुख्यमंत्री को लेकर गहरा सस्पेंस है। उस लिहाज से बिहार चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। अब मुख्य मुकाबला एनडीए और इंडिया गठबंधन के मध्य होगा। लालू के दूसरे बेटे तेज प्रताप यादव की चुनौती भी चुनावों में रहेगी।

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