पर्व का बाजारीकरण

उल्लास, आह्लाद, जगमगाहट का दौर दीपावली तक ही सीमित नहीं है। उसके बाद भी दीपक जलते रहते हैं। घर, दुकान, बाजार, मुहल्ले और परिवेश ‘प्रकाशमय’ रहते हैं। अमीर हो या गरीब हो, समाज के सभी वर्ग प्रसन्न दिखते हैं और आपस में मंगल कामनाएं पेश करते हैं। दीप-पर्व के पांचों त्योहार सिर्फ हिंदुओं या सनातन तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रभु राम सभी के ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ हैं, सभी के ‘आदरणीय’ हैं, अधिकांश के ‘आराध्य’ भी हैं। चूंकि आज के दिन प्रभु श्रीराम, धर्मपत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ, 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, लिहाजा वहां के लोगों ने हर्षोल्लास में दीये प्रज्वलित किए थे। अयोध्या को दुल्हन की तरह सजाया था। आज उन्हीं भावनाओं को जीवंत रहने दें। प्रभु का आत्मा और भाव के साथ स्वागत करने दें। इतिहास और संदर्भों का ‘व्यापारीकरण’ न करें। ‘धनतेरस’ इस दौर का बेहद महत्वपूर्ण पर्व था। उसी का उदाहरण लेते हैं। जब सुर-असुरों के बीच सागर-मंथन किया गया था, तब भगवान धन्वंतरि भी प्रकट हुए थे। उनके चारों हाथों में-आयुर्वेद की पुस्तक, शंख, जड़ी-बूटी, अमृत कलश-धारण किए हुए थे। धन्वंतरि को ‘स्वास्थ्य का देवता’ और ‘आयुर्वेद का जनक’ माना गया। उन्हें ‘देवताओं का डॉक्टर’ भी कहा गया। ‘धनतेरस’ उन्हीं स्वास्थ्य-देव की स्मृति में मनाया जाता है। इसे ‘आयुर्वेद दिवस’ भी कहते हैं और 150 से ज्यादा देशों में इसी रूप में यह मनाया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने यह जानकारी देश के साथ साझा की है।
दरअसल धन्वंतरि का अर्थ है-‘कष्टों का विनाश करने वाला।’ चूंकि धन्वंतरि और धनतेरस में ‘धन’ शब्द जुड़ा है, लिहाजा कर्मकांडी पंडितों और बाजार ने इस अर्थ का ही अनर्थ कर दिया है। ‘स्वास्थ्य पर्व’, ‘धन्वंतरि पर्व’ होने के बजाय धनतेरस को खरीददारी का दिन बना दिया गया। इस साल धनतेरस के दिन 60,000 करोड़ रुपए से अधिक की खरीददारी की गई। करीब 20,000 करोड़ रुपए का सोना और 2500 करोड़ रुपए की चांदी खरीदी गई। इनके सिक्के भी खरीदे गए। करीब 100 करोड़ रुपए के नए बर्तन खरीदे गए। पंडितों और बाजार के एक वर्ग ने ‘धनतेरस’ वाले दिन नई चीज की खरीद को ‘सौभाग्यशाली’ प्रचारित किया, बड़े-बड़े गूढ़ मंत्र पढक़र आम आदमी को भ्रमित किया। जेवरात के अलावा, कार, बाइक, जमीन के टुकड़े की भी खरीददारी की गई। बेचारा गरीब या सामान्य वर्ग क्या करे, क्योंकि उसके पास तो धन नहीं है? क्या उसका ‘धनतेरस’ बेमानी रहेगा या दैवीय शक्तियां स्वीकार नहीं करेंगी? बहरहाल भगवान धन्वंतरि और स्वास्थ्य महज प्रतीक बन कर रह गए। जिस देश में टाइप-2 मधुमेह के 10 करोड़ मरीज हों, करीब 22 करोड़ लोग हाइपर टेंशन, उच्च रक्तचाप के शिकार हों, साल में औसतन 35 लाख लोग हृदय रोग से मर जाते हों, उस देश में धनतेरस को धन, वैभव, खरीददारी, सम्पन्नता के भ्रम का पर्व मान लिया गया और उसी भावना से मनाया गया। यही नहीं, लाखों लोगों ने ऑनलाइन भोजन के ऑर्डर दिए और घर की रसोई की छुट्टी कर दी। क्या पर्व के दिन ऐसा भी होता है? हम धन-धान्य, पैसा कमाने, सोने-चांदी के जेवरात या अन्य उपकरण खरीदने, कार-बाइक खरीदने के खिलाफ नहीं हैं। धनवान बनना कोई अपराध या पाप नहीं है, लेकिन जरा यह तो सोचिए कि उस धन, वैभव का उपभोग आप कैसे करेंगे? आप तो बीमार हैं। आपको प्रभु धन्वंतरि के ज्ञान की जरा-सी भी चिंता नहीं है। इसी तरह दीपावली का ‘बाजारीकरण’ हो रहा है। बेशक यह देश की भौतिक प्रगति का भी स्पष्ट संकेत है कि हमारे बाजार और उपभोक्ता बेहद सक्रिय हैं। औसत मांग बढ़ रही है, तो उत्पादन भी बढ़ रहे हैं, अर्थव्यवस्था विस्तार पा रही है, लेकिन पर्वों के पीछे जो आस्थामयी कहानियां हैं, कमोबेश उनको खारिज नहीं किया जा सकता। धर्म हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक हिस्सा हैं और प्रभु राम इसके विराट चेहरा हैं। यदि दीपावली का मनोरथ प्रभु राम में ही निहित है, तो बनावटी बाजार के कोई मायने नहीं हैं। यह भूलना नहीं चाहिए कि विश्व की 5वीं अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत आज भी औसतन गरीब देश है। आज संदर्भ हमारे पवित्र पर्वों का है। कृपया उनके अर्थ और मनोरथ को विकृत मत कीजिए। दिवाली का पर्व इस तरह मनाया जाना चाहिए कि प्रदूषण न फैले। दिल्ली पहले ही प्रदूषण के कारण काफी बदनाम है। अन्य शहरों में भी दिवाली के दिनों में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। अगर हम पटाखे नहीं चलाएंगे, दिवाली तो फिर भी मनाई जा सकती है। पटाखों पर खर्च किए जाने वाले पैसे किसी गरीब की मदद कर सकते हैं।


