संपादकीय

एआई का महाकुंभ…

अब यह समय और दौर ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (एआई) का है। आगामी तीन सालों में एआई का विस्तार हजार गुना होगा और जिंदगी बिल्कुल बदल जाएगी। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, परिवहन, प्रशासन और नीति-निर्माण, इतिहास, संस्कृति, विज्ञान से लेकर आम आदमी और कर्मचारी तक एआई का दखल होगा और ये क्षेत्र एआई से ही संचालित होंगे। भारत एआई के बड़े और स्थापित देशों की रेस में शामिल नहीं है, लेकिन एआई की प्रतिभाएं देश में 33 फीसदी की दर से बढ़ रही हैं। करीब 69 फीसदी कंपनियां इस साल एआई में निवेश बढ़ाएंगी और 80 फीसदी कंपनियां इस नए हुनर को प्राथमिकता दे रही हैं। करीब 92 फीसदी कर्मचारी एआई का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। भारत में एआई के तीन आधिकारिक सूत्र घोषित किए गए हैं-लोग (पीपल), ग्रह (प्लैनेट), प्रगति (प्रोग्रेस)। यकीनन इनमें नैतिकता और मानवता का भाव अधिक है। लिहाजा राजधानी दिल्ली में एआई का जो पांच दिवसीय शिखर सम्मेलन सजा है, उसका महत्व ‘महाकुंभ’ सरीखा है। इस महाकुंभ में 100 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीईओ, 20 से अधिक राष्ट्राध्यक्ष, 135 देशों के प्रतिनिधि शिरकत करेंगे। 20 फरवरी तक 3250 से अधिक वक्ता बोलेंगे और करीब 500 सत्र आयोजित किए जाएंगे। किसी नई प्रौद्योगिकी पर विमर्श और चिंतन-मनन के लिए यह सर्वोच्च मंच है, लिहाजा ‘महाकुंभ’ जैसा महत्व है। सभी हिस्सेदार, भागीदार व्यक्ति या देश एआई के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे और एक पथ तय करेंगे कि एआई किस तरह मानवोपयोगी साबित हो सकती है। इतनी व्यापक चर्चा तब भी नहीं हुई, जब कम्प्यूटर हमारे बीच आया था और देश भय, खौफ में थे कि यह मानव का विकल्प साबित हो सकता है। ऐसा नहीं हुआ और आज कम्प्यूटर हमारे कामकाज का बुनियादी हथियार है। बहरहाल ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया (सोल), फ्रांस (पेरिस) के बाद एआई का यह शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी दिल्ली में जारी है। करीब 3 लाख लोगों ने पंजीकरण कराया है। दरअसल बुनियादी चिंता एआई चिप्स, रोजगार और परिवर्तन के बाद की दुनिया को लेकर है। भारत में एआई को ‘आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन’ से जोड़ा जा रहा है, क्योंकि इससे मुंह के कैंसर की 86 फीसदी तक सटीक पहचान हो रही है। शिक्षा के क्षेत्र में आईआईटी, मद्रास 100 से अधिक भारतीय बोलियों (अवधी, ब्रज, हरियाणवी) पर काम कर रहा है। मकसद है कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को उनकी स्थानीय बोली-भाषा में ही शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके। आईआईटी, रोपड़ ने एआई आधारित ऑटोमैटिक ‘मौसम स्टेशन’ तैयार किया है। इन्हें हजारों खेतों-गांवों में लगाया जा सकता है। करीब 15,000 रुपए की कीमत वाला यह उपकरण सिंचाई, फसल योजना और कीट-नियंत्रण आदि की सटीक सलाह देगा। बिहार और उप्र में इसका पायलट प्रोजेक्ट सफल रहा है। एआई के क्षेत्र में हमने 5 बड़े कदम उठाए हैं, जो निर्णायक साबित हो रहे हैं। सर्वम एआई, परम-2, ज्ञानी, सॉकेट और गान-ये पांच बड़े प्रयास किए गए हैं। इनके जरिए हमारी सभ्यता, संस्कृति, इतिहास के प्राचीन अतीत को भी खंगाला जा सकता है और हम देख भी सकते हैं। फिर भी अमरीका और चीन की तुलना में भारत में एआई अभी ‘शिशु अवस्था’ में है। इसकी उन्नत और विकसित चिप, जिसे जीपीयू कहते हैं, बेहद महंगी है। एक चिप की कीमत 30,000 डॉलर से अधिक बताई जाती है। बीती अक्तूबर तक भारत ने 38,000 से अधिक चिप्स तैनात की हैं। पिछले साल जिन डाटा केंद्रों में ये चिप्स लगाई गई हैं, उन्होंने ग्रिड से 1.4 गीगावाट बिजली चूस ली है। यह पीक मांग के दौरान राजधानी दिल्ली की एक चौथाई बिजली के बराबर है। 2030 तक ये केंद्र 8 गीगावाट बिजली खर्च कर सकते हैं, जो राजधानी के लोड से अधिक हो सकती है। क्या हमारे पास इतनी सरप्लस बिजली है। एक गीगावाट 1000 मेगावाट बिजली के बराबर होता है। अमरीका चिप्स के बाजार का बादशाह है। उसने चीन की गति को धीमा करके रखा है, लेकिन चीन थमा नहीं है। उसने 150 अरब डॉलर का निवेश चिप-निर्माण में कर रखा है। भारत अभी 2.80 करोड़ चिप्स ही बना पा रहा है।

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