दैवीय भी है महाकुंभ

बहुत लंबे 144 सालों के बाद प्रयागराज में महाकुंभ का आरंभ हुआ है। पहले ही दिन, 13 जनवरी को लोहड़ी पर्व पर, करीब 1.65 करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई। यह विश्व कीर्तिमान है। पावन ‘मकर संक्रान्ति’ के दिन अमृत, शाही स्नान साधु-संतों और नागा संन्यासियों ने किया। यह आदि शंकराचार्य की देन है, जिन्होंने सनातन धर्म के लिए साधु-संतों को एकीकृत कर अखाड़े बनाए। आज हमारे यहां 13 अखाड़े सक्रिय हैं। उनका अपना आध्यात्मिक, वैचारिक दर्शन और कर्मकांड हैं, लेकिन उनकी आत्मा में सनातन बसा है। वे सभी सनातनी आस्था के पैरोकार और प्रवक्ता हैं। वे शैव, वैष्णव, उदासीन, महानिर्वाणी, निर्मल नामधारी अखाड़े हो सकते हैं, लेकिन उनकी जुबां से ‘हर-हर गंगे’, ‘हर-हर महादेव’, ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष ही गूंजते हैं। नागा संन्यासियों के भस्म-शृंगार को देखकर तो महादेव के शिवगण याद आने लगते हैं। महाकुंभ मौजूदा ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और व्यापक, व्यवस्थित आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, बहुराष्ट्रीय, बहुनस्लीय, बहुभाषीय, दैवीय जन-समागम है। अनुमान है कि 26 फरवरी तक चलने वाले महाकुंभ में 45 करोड़ से अधिक श्रद्धालु ‘आस्था के स्नान’ में शामिल हो सकते हैं। यह आंकड़ा अमरीका की कुल आबादी से भी बहुत ज्यादा है, लिहाजा श्रद्धालुओं के लिए चौतरफा व्यवस्थाएं की गई हैं। केंद्र और उप्र सरकार का 15,000 करोड़ रुपए का बजट खर्च हो सकता है, लेकिन कंपनियां अभी तक 3000 करोड़ रुपए अपने ब्रांड की उपस्थिति पर खर्च करने की घोषणाएं कर चुकी हैं। यह आयोजन हमारी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में भी सहायक साबित होगा। यदि दुनिया को किसी समारोह के आयोजन का सफल प्रबंधन, करोड़ों की भीड़ का मानवीय प्रबंधन और चाक-चौबंद सुरक्षा-व्यवस्था का पाठ पढऩा हो, तो प्रयागराज महाकुंभ का अध्ययन करना चाहिए। कुछ श्रद्धालुओं को दिल का दौरा पड़ गया था।
वे सभी स्वस्थ हैं और अस्पताल में उनका तुरंत इलाज किया गया है। इसी तरह कुछ श्रद्धालु अपने परिजनों से बिछुड़ गए थे, अंतत: उन्हें मिला दिया गया। ये आयोजन की सफलताएं ही हैं। सरकार ने चप्पे-चप्पे पर 45,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किए हैं। शीर्ष अधिकारी भी ड्यूटी पर हैं। सतत निगरानी और चौकसी के लिए करीब 3000 सीसीटीवी कैमरों का नेटवर्क, नियंत्रण-कक्ष तैयार किया गया है। कल्पना करें कि करोड़ों श्रद्धालु दुनिया भर से आ रहे हैं, लेकिन किसी भी भगदड़ की गुंजाइश नहीं है। हम 1954 की त्रासद घटना से सबक सीख कर बहुत आगे बढ़ चुके हैं। इस बार 450 किलोमीटर की लंबाई जैसी सडक़ें बनाई गई हैं। स्नान के अलग-अलग रूट तय किए गए हैं। शौचालयों की संख्या भी 1.5 लाख बताई गई है। तैरने वाले पुल भी बनाए गए हैं। दरअसल यह अभूतपूर्व, अकल्पनीय, अतुलनीय जन-सैलाब का आध्यात्मिक, सांस्कृतिक आयोजन है, जिसका इतिहास और अतीत दैवीय भी है। महाकुंभ से देवराज इंद्र के पुत्र जयंत की अमृत-कलश सुरक्षित ले जाने और अमृत की कुछ बूंदें प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक में छलक जाने की कहानी सर्वविदित है। कुंभ के आयोजन इन्हीं चार स्थलों पर होते रहे हैं, लेकिन महादेव द्वारा पुणे के पास सह्याद्रि पर्वत पर ‘भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग’ की स्थापना का प्रकरण भी महाकुंभ से जुड़ा है। भीमा एक असुर था। माता पार्वती को मुक्त कराने के संदर्भ में महादेव को भीमासुर के साथ युद्ध करना पड़ा। युद्ध के कारण वह सुंदरवन आग की लपटों में घिर गया। पशु-पक्षी और जानवर जान बचाने के लिए बेतहाशा भागने लगे। तब एक वृद्धा देवी ने कुपित होकर वहां उपस्थित ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, गणेश, नंदी और शिवगणों को श्राप दिया था। उन सभी के शरीर पर फफोले उभर आए थे। तब महादेव ने प्रयागराज में महाकुंभ के संगम स्नान का सुझाव दिया था।



