अभिव्यक्ति की आजादी की सीमाएं

पश्चिम बंगाल की विधानसभा में संविधान, लोकतंत्र, गरिमा, मर्यादा को तार-तार किया गया। क्षोभ और शर्मिंदगी के कोई और शब्द हैं, तो उनका उल्लेख भी किया जा सकता है। यह न तो संघीय ढांचा है और न ही अभिव्यक्ति की आजादी है। हम जानते हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समविचारक नहीं होंगी। जब वह लोकसभा सांसद थीं, तब ऐसा हुड़दंग मचाया था कि स्पीकर सोमनाथ चटर्जी पर बिल के टुकड़े-टुकड़े कर उछाल दिए थे। तब उन्होंने बंगाल में घुसपैठियों के मुद्दे पर अपना नकारात्मक आक्रोश, रोष व्यक्त किया था। आज भी वही मुद्दा है, लेकिन आज वह खुद मुख्यमंत्री हैं। आज राजनीति के कारण उनके सुर और रवैये बदल चुके हैं। आज ममता बनर्जी बांग्लादेशी घुसपैठियों की अवधारणा मानती ही नहीं। उन्होंने ‘बांग्लाभाषी’ और ‘प्रवासी बंगाली’ सरीखे नए शब्द गढ़ लिए हैं और केंद्र सरकार पर ‘बंगालियों पर अत्याचार’ के आरोप मढ़ रही हैं। ममता बनर्जी ऐसी पहली मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने विधानसभा में चीख-चीख कर नारे लगाए हैं-‘मोदी चोर, वोट चोर, अमित शाह चोर…भाजपा डकैतों, आतंकियों, अत्याचारियों की पार्टी है।’ यह दुखद ही नहीं, बेशर्मी और नालायकी है, दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक मुख्यमंत्री ने सदन में ही देश के प्रधानमंत्री को ‘चोर, डकैत, अत्याचारी’ करार दिया है। अफसोस और विडंबना यह है कि ऐसे गालीबाज मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई संवैधानिक कार्रवाई नहीं की गई है और न ही हमें ऐसी कोई संभावना लगती है। क्या देश का प्रधानमंत्री ऐसा किरदार बना दिया गया है, जिसके खिलाफ तमाम मर्यादाओं और संवैधानिक आचरणों की हदें लांघी जा सकती हैं? क्या संविधान में ऐसे भी अनुच्छेद हैं, जिनके तहत प्रधानमंत्री को, कोई भी, किसी भी मौके पर, गालियां देकर अपमानित कर सकता है? यह निरंकुशता लोकतांत्रिक और संघीय भी नहीं है। ‘वोट चोर’ कुछ हद तक राजनीतिक और चुनावी मुद्दा हो सकता है, लेकिन ये शब्द भी आपत्तिजनक और अश्लील हैं। अब चुनाव आयोग 10 सितंबर को सभी क्षेत्रीय मुख्य चुनाव अधिकारियों के साथ देश भर में मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण को लेकर विमर्श करेगा।
जाहिर है कि बिहार वाली प्रक्रिया बंगाल में भी हो सकती है, क्योंकि अप्रैल, 2026 के आसपास वहां विधानसभा चुनाव होने हैं। असम, तमिलनाडु, पांडिचेरी, केरल आदि राज्यों में भी 2026 में चुनाव हैं। कौन-कौन, मतदाता संशोधन की इस कवायद के मद्देनजर प्रधानमंत्री को ‘चोर’ कहेगा? क्या इस संवैधानिक प्रक्रिया पर प्रधानमंत्री और चुनाव आयोग को, ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस, ‘चोर’ करार देते हुए विरोध प्रकट करेगी? बंगाल में हिंसक प्रदर्शन भी किए जाएंगे? एक राज्य में अराजकता फैलाने की बौनी राजनीति खेली जाएगी? बेशक सदनों की गरिमा और उनके चरित्र को इतना खंडित न किया जाए कि पक्ष और विपक्ष के निर्वाचित सदस्य हाथापाई करें, मारपीट तक की नौबत आ जाए और सदस्यों को जमीन पर ही चित पटकनी दे दी जाए। बंगाल की विधानसभा में यह सब कुछ हुआ। भाजपा के मुख्य सचेतक शंकर घोष को अस्पताल तक ले जाना पड़ा। नेता प्रतिपक्ष सुवेन्दु अधिकारी को भी मार्शलों के जरिए सदन से बाहर कर दिया गया। दुर्भाग्य है कि अब सभी स्तरों के सदनों में ऐसा ही माहौल देखने को मिलता है। अब सांसदों/विधायकों के निलंबन भी स्पीकर के नीर-क्षीर विवेक के उदाहरण नहीं रहे। सभापति अपने राजनीतिक दल से प्रभावित रहते हैं, लिहाजा फैसले तटस्थ नहीं माने जा सकते। यकीनन ये दृश्य लोकतंत्र और संविधान के सबसे कलंकित अपमान हैं। यदि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सदन में बिंदुवार बंगालियों के अत्याचार की घटनाएं पेश करतीं, सदन संयत होकर कार्यवाही करता, तो वह एक राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता था। ‘मोदी चोर’ कहकर तो ममता ने अपनी छीछालेदर कराई है। अब यह मुद्दा हंगामा मचाएगा कि ममता घुसपैठियों, बांग्लादेशियों, अवैध प्रवासियों के वोट बैंक की राजनीति करती हैं। देश में करीब 2.5 करोड़ घुसपैठिए हैं, यह आंकड़ा बहुत पुराना है, लिहाजा मोदी सरकार भी सवालिया रही है कि अभी तक घुसपैठियों को देशनिकाला देकर उनके मूल देश क्यों नहीं भेजा जा सका? यह गति अत्यंत धीमी क्यों है? बहरहाल कहा जा सकता है कि घुसपैठ के मुद्दे पर सभी राजनीतिक दल ईमानदार नहीं हैं। भारत ऐसा अकेला देश है, जहां घुसपैठियों का मनोबल बढ़ाने वाली पार्टियां भी हैं। आपस में गालियां देने के बजाय आत्ममंथन करें कि यदि देश की एकता, अखंडता को बचाना है, तो घुसपैठियों पर सर्वसम्मत फैसला लें।



