संपादकीय

चुनाव की भाषा

चुनाव की भाषा में अमर्यादित होती परिपाटी और सियासी उच्चारण में तार-तार होता हिमाचली चरित्र। मंडी की गलियों से शुरू हुआ उम्मीदवारों का भाषायी उन्माद अंत आते-आते पूरे प्रदेश में सिरफिरा हो गया। भाषा और भाषण में अंतत: राजनीतिक कंगाली का आलम यह है कि कोई विपक्ष की खिल्ली उड़ा रहा है, तो कहीं सत्ता को कोसने की शब्दावली में जहर भरा है। जो भी हो, भाषा ने हमारी चारित्रिक पहचान डुबो दी है। बावजूद इसके पहली बार हर उम्मीदवार जनता से अपने संवाद की नजदीकी के लिए, स्थानीय बोली में विमर्श पैदा करने की कोशिश में जुटा है। शुरुआती दौर में कंगना ने मंडी की बेटी बनने के लिए स्थानीय बोली में शब्द, स्थानीय पहरावे में रंग और खानपान में विविधता चुनी, तो विक्रमादित्य सिंह ने संभ्रांत उच्चारण से नीचे उतर कर स्थानीय संवाद की कशिश पैदा की। इसे आश्चर्य की दृष्टि से देखें या कांगड़ा-चंबा में कांग्रेसी उम्मीदवार आनंद शर्मा के पहाड़ी प्रयास की तारीफ करें कि इस कद्दावर नेता ने स्थानीय शब्दों को चुनाव में बिलोल दिया। पहली बार हिमाचल अपनी स्थानीयता और पहाड़ीपन की पोशाक पहने चल रहा है, तो हर उम्मीदवार से भाषायी उम्मीदें बढ़ गई हैं। चाहे केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर हों या कोई और, भाषायी सेतु पर चुनाव ने जुबान खोली है। ऐसे में चुनाव की महफिल में हिमाचल के भाषायी सरोकार सामने आ रहे हैं।

भले ही अभी बोलियों में हस्ताक्षर हो रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे पक रहा संवाद एक दिन हिमाचल के परिचय में संपूर्ण भाषा का महत्त्व जानेगा। ऐसे में हिमाचली भाषा के तमाम स्रोतों से लांघते लोकसभा चुनाव से यह अपेक्षा की जा सकती है कि आइंदा नेताओं की सर्वमान्यता में प्रदेश को एक प्रतिष्ठित व स्वीकार्य भाषा की जरूरत है। भले ही आज की तारीख में बघाटी, सिरमौरी, कहलूरी, कांगड़ी, चंबयाली, मंडयाली, कुल्लवी व कुछ अन्य बोलियां अपनी-अपनी सतह पर संवाद पैदा कर रही हैं, लेकिन एक दिन बोलियों से आगे निकल कर हिमाचल का स्वाभिमान अपने लिए और अपनी पहचान के लिए राज्य स्तरीय भाषा के खाके को मजबूत करेगा। कम से कम लोकसभा का वर्तमान चुनाव यह शर्त सामने रख रहा है। यह दीगर है कि बोलियों के बीच बोल बिगड़ रहे हैं। सांस्कृतिक तौर पर भी हिमाचल को अपनी चुनावी ताकत का इजहार करते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि पहाड़ की अस्मिता के लिए केंद्र की सत्ता से हमारे अधिकारों की अपेक्षा क्या है। जल, जंगल और जमीन के अलावा पहाड़ की जवानी के प्रति केंद्र के सरोकार लोकसभा चुनाव में परिलक्षित होने चाहिएं। विस्थापन के कई अधूरे पन्ने और पंजाब पुनर्गठन से जुड़े हिमाचली अधिकार पुन: चुनाव में उतरे नेताओं की भाषा में आत्मसम्मान खोज रहे हैं। हिमाचल की भाषा में पंजाब पुनर्गठन से जुड़े अधिकारों का अनुवाद आज तक नहीं हुआ।

हम दिल्ली से गुजारिश करते-करते लखनवी अंदाज से बाहर नहीं निकलते, जबकि सरहद पर हमारे नौजवानों की भाषा में पहाड़ी बलिदान का पूरा-पूरा शब्दकोष न जाने कब से देश स्वीकार कर चुका है। जिंदगी के हर मोड़ पर तथा राष्ट्रीय भावना के हर संयोग पर हिमाचल ने हमेशा वही अर्थ समझा जो देश की सार्वभौमिकता व अस्तित्व के लिए लाजिमी है, लेकिन प्रदेश की अपनी जरूरतों की खातिर ऐसी भाषा अस्तित्व में नहीं आई जो प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर सके। इसीलिए आनंद शर्मा को कांगड़ी व चंबियाली का शब्दकोष खोलना पड़ रहा है, तो कंगना रनौत को अपनी बुद्धिमता के प्रदर्शन के लिए मंडयाली बोली के स्कूल में प्रवेश लेना पड़ रहा है। क्या आनंद शर्मा और कंगना रनौत क्षेत्रीय बोलियों के दम पर राजधानी शिमला और दिल्ली तक अपना संदेश सुना पाएंगे। क्या हम बोलियों से निकलकर कभी हिमाचली भाषा बना पाएंगे। क्या किसी नेता में इतना दम है कि हिमाचली भाषा का प्रचार और प्रतिनिधित्व कर सके।

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