राजनीति

कबीर का मार्ग एक विशेष खोज है

कबीर जी एक ऐसे आदर्श संत इस देश में हुए हैं जो स्पष्टवादी निर्भीक त्यागी थे। ‘संतो देखत जग बौराना सांच कहै तो मारन धावे झूठे जग पतियाना’ कबीर जी समाज की सच्चाइयों से मुंह मोड़ने वाले संत नहीं हुए, वे समाज की बुराइयों पर करारी चोट करते थे। कबीर जी को पाखंडवाद से चिढ़ थी। कबीर जी एक ऐसे कवि थे जिन्होंने समाज की पीड़ा को समझा और सुना ही नहीं अपितु उन्होंने अन्याय, अत्याचार का मुकाबला भी किया। 

‘कबीर खड़ा बाजार में लिए लुखाठी हाथ, जो घर अपना फूंक सके चले हमारे साथ’ कबीर ने जाति-पाति, ऊंच-नीच, धनी-गरीब, मुल्ला-पंडित आदि के भेद पर निर्भय होकर प्रहार किया। कई बार कबीर को समर्थ लोगों की प्रताड़ना सहनी पड़ी परन्तु कबीर सत्य के लिए अखंड एवं अडिग रहे और संघर्ष करते रहे। कबीर के संदेश को अगर छुपाया नहीं गया होता, उसको बंद कोठरी में न डाला गया होता, कबीर की वाणी शोषक सामन्तों की षड्यंत्र का शिकार नहीं हुई होती तो आज भारत की संस्कृति, इसकी सामाजिक स्थिति और आर्थिक गतिविधियां आज से एकदम भिन्न होतीं। हिंदुस्तान एक बेहद खूबसूरत तस्वीर होता। कबीर की एक प्रमुख रचना बीजक सद्ग्रन्थ है। ‘बीजक बित्त बतावै जो बित्त गुप्त होय शब्द बतावै जीव को बुझे बिरला कोय’। 

मानव दस इन्द्रियों ग्यारहवें मन का दमन करके परमशक्ति को प्राप्त करने के लिए 11 प्रकरणों से विन्यस्त, अध्यात्मक ज्ञान का महान अद्भुत आध्यत्मिक ग्रंथ बीजक सद्गुरु ने बनाया है। बीजक में रमैनी, शब्द, ज्ञान, चौंतीसा, विप्रमतीसी, कहरा, बसंत, चाचर, बेली, बिरहुली, हिंडोला और साखी-ये ग्यारह प्रकरण हैं। मनुष्य शरीर कर्मों की भूमिका होने के कारण जीव जन्म-मृत्यु के प्रवाह में बहता रहता है। जीवों को इस 84 के अपार दुखों से छुड़ाने के लिए कबीर ने बीजक में चौरासी रमैनी कही है। वहीं ज्ञान चौंतीसा में वाणी जाल से मनुष्य को स्वतंत्र विचार करके यथार्थ पाप-पुण्य तथा सत्यासत्य समझेगा। 

‘चौंतीसा अक्षर से निकले जोई, पाप पुण्य जानेगो सोई’ बीजक के ग्यारहवें प्रकरण में साखी कही है ‘साखी आंखी ज्ञान की समुझी देखी मन माहीं, बिन साखी संसार का झगड़ा छूटत नाहीं’ साखी साक्षी (गवाह) का सच है, निष्पक्ष है, ये ज्ञान रूपी आंख है इनके द्वारा सत्य का निष्पक्ष दर्शन कराया जाता है। बीजक का दूसरा प्रकरण प्रसिद्ध प्रकरण शब्द है जिसको आज देश-विदेश में संगीत के साथ गाया जाता है। एक शब्द में कबीर ने साफ-साफ चेतावनी दी है कि एक जीव को अपने सभी कर्मों का फल भुगतना होगा चाहे वह कोई भी हो। ‘झूठे बी जन पतियाऊ हो सुन संत सुजाना, तेरे घट ही में ठगपुर बसे मति खोहू अपाना’ जीव अपने आप को न भूले जो कुछ है जीव में है।-सत्यप्रकाश जरावता 

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