संपादकीय

बस, ‘बहुत हो गया’…

’ एक राष्ट्र के तौर पर यह शर्मनाक और कलंकित स्थिति है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखना पड़ा-‘किंडरगार्टन की बच्चियों के साथ भी दरिंदगी की जा रही है। आज देश गुस्से में है और मैं भी…।’ अब एक समाज के रूप में हम अपने आप से कुछ कठिन सवाल पूछें। राष्ट्रपति मुर्मू ने सवाल किया है कि 2012 में निर्भया कांड के बाद पूरा देश आंदोलित हो उठा था, लेकिन फिर लोगों ने यौन अपराधों को भुला दिया। क्या हमने यही सबक सीखा था? क्या हम ‘सामूहिक स्मृतिलोप’ के शिकार हैं? यह दुखद है और घिनौना भी है। राष्ट्रपति  द्रौपदी मुर्मू ने बेटियों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर एक मार्मिक और अभूतपूर्व प्रतिक्रिया दी है। ‘अभूतपूर्व’ इसलिए है, क्योंकि देश के महामहिम अक्सर कोई सार्वजनिक बयान नहीं देते। राष्ट्रपति केंद्रीय कैबिनेट की सलाह पर ही काम करते हैं। संभवत: तीन पन्नों की यह प्रतिक्रिया सार्वजनिक करने से पूर्व राष्ट्रपति कार्यालय ने इसे प्रधानमंत्री दफ्तर भेजा हो और फिर कैबिनेट की संस्तुति के बाद यह पत्र देश के सामने आया हो! राष्ट्रपति ने अपनी मन:स्थिति बयां करते हुए अपनी निराशा, हताशा और भय का इजहार भी किया है। कल्पना की जा सकती है कि महिलाओं के खिलाफ बर्बर, पाशविक अपराधों ने राष्ट्रपति को कितना झकझोर दिया होगा कि उन्हें कहना पड़ा-‘बस, अब बहुत हो गया।’ एक राष्ट्र के तौर पर यह शर्मनाक और कलंकित स्थिति है कि राष्ट्रपति को लिखना पड़ा-‘किंडरगार्टन की बच्चियों के साथ भी दरिंदगी की जा रही है। आज देश गुस्से में है और मैं भी…।’ अब एक समाज के रूप में हम अपने आप से कुछ कठिन सवाल पूछें। राष्ट्रपति मुर्मू ने सवाल किया है कि 2012 में निर्भया कांड के बाद पूरा देश आंदोलित हो उठा था, लेकिन फिर लोगों ने यौन अपराधों को भुला दिया। क्या हमने यही सबक सीखा था? क्या हम ‘सामूहिक स्मृतिलोप’ के शिकार हैं? यह दुखद है और घिनौना भी है।’ दरअसल राष्ट्रपति ने समाचार एजेंसी ‘पीटीआई’ के संपादकों से बातचीत की थी। बाद में उन्होंने तीन पन्नों का पत्र उन्हें लिखा। राष्ट्रपति ने उसमें उल्लेख किया है कि ‘रक्षा बंधन’ मनाने कुछ बच्चे ‘राष्ट्रपति भवन’ आए थे। उन्होंने ‘निर्भया कांड’ जैसी घटनाओं के मद्देनजर मुझसे सवाल पूछे। मैंने उन्हें ‘मार्शल आट्र्स’ की टे्रनिंग के बारे में बताया। हालांकि मैं जानती थी कि यह सुरक्षा की गारंटी नहीं है, लेकिन अब उन बच्चों के सवालों के जवाब समाज ही दे सकता है। किसी भी सभ्य समाज में बेटियों, महिलाओं के खिलाफ ऐसे जघन्य अपराध स्वीकार्य नहीं हैं, बर्दाश्त नहीं किए जा सकते। हमें ईमानदार, निष्पक्ष आत्म-निरीक्षण की जरूरत है। अब हम न केवल इतिहास का सामना करें, बल्कि अपनी आत्मा के भीतर भी झांकें और इन अपराधों के कारणों की जांच करें। कोलकाता में एक तरफ प्रदर्शन हो रहे थे, दूसरी तरफ अपराधी भी घूम रहे थे। महिलाओं को कमतर आंकना भी घृणित मानसिकता है। कोलकाता कांड ने राष्ट्रपति मुर्मू के मानस को झकझोरा होगा, लेकिन उन्होंने देश भर में बढ़ते बलात्कारों और हत्याओं के प्रति अपनी चिंता और सरोकार जताया है।

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विपक्ष के अन्य राजनीतिक दलों को इस पत्र से चिढऩा नहीं चाहिए अथवा ‘राजनीतिक पत्र’ नहीं आंकना चाहिए। हम अब एक परिपक्व गणतंत्र हैं, लिहाजा राष्ट्रपति के ऐसे सार्वजनिक कथन पर विचार करना चाहिए। चूंकि भारत के राष्ट्रपति ने पत्र लिख कर देश के हालात पर निराशा और पीड़ा जताई है, जाहिर है कि शेष विश्व भी यह पत्र पढ़ेगा और एकबारगी सोचेगा कि क्या भारत बलात्कारियों का देश है? भारत का अपमान होगा, उसकी छवि पर कालिख पुतेगी, क्योंकि राष्ट्रपति ने ही क्षोभ जताया है। हालात इस पराकाष्ठा तक पहुंच चुके हैं कि राष्ट्रपति को कहना पड़ा है-‘बस, अब बहुत हो गया।’ राष्ट्रपति के इस कथन की अलग-अलग व्याख्याएं की जा सकती हैं। इसे बंगाल में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की पृष्ठभूमि माना जा सकता है, लेकिन किसी भी राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 356 चस्पां करने के संकेत तक भी सार्वजनिक नहीं किए हैं। ऐसा पत्र लिखना तो बहुत बड़ी बात है। यदि बंगाल में कोई कार्रवाई करनी है, तो उससे पहले मणिपुर पर भी सोचना पड़ेगा। उप्र, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र को भी नहीं छोड़ सकते, हालांकि इन राज्यों में ऐसी अराजकता नहीं फैली और न ही संवैधानिक नाकामी जैसी टिप्पणियां अदालत को करनी पड़ीं। मणिपुर की स्थिति वाकई विस्फोटक और नंगी रही है। वहां तो महिलाओं को वस्त्रहीन कर घुमाया गया है, बलात्कार की स्थितियां बाद में आती हैं। वहां तो शोषण और अत्याचार में महिलाएं ही महिलाओं के खिलाफ थीं। राष्ट्रपति को उस पर भी कुछ कहना चाहिए था। बहरहाल राष्ट्रपति ने अपने पत्र के जरिए कई बातें कही हैं। यदि हम वाकई सभ्य और शिक्षित, शालीन समाज हैं और हमारी आंखों में अब भी पानी शेष है, तो कमोबेश राष्ट्रपति के पत्र का कुछ पालन करना चाहिए।

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