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दीपावली: परंपरा से बाजारवाद तक का सफर

आधुनिक तकनीक और बदलती जीवनशैली ने दीपावली को अधिक भव्य बना दिया है। बिजली की रंगीन लाइटों ने घरों को और अधिक जगमग कर दिया है, ऑनलाइन प्लेटफॉम्र्स ने खरीददारी को आसान बना दिया है और दूर दराज बैठे रिश्तेदारों से वर्चुअल जुड़ाव ने भौगोलिक दूरी को घटाया है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इस बदलाव में हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। दीपावली की रोशनी तभी पूर्ण होगी जब उसमें परंपरा और आधुनिकता का संतुलन हो…

भारत में दीपावली केवल एक पर्व नही, बल्कि आस्था, संस्कृति और उत्सव का ऐसा संगम है जो सदियों से लोगों को एक सूत्र में पिरोता आया है। इस पर्व की मूल भावना में प्रकाश से अंधकार का अंत, अच्छाई की बुराई पर विजय और नए उत्साह के साथ जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत निहित है। लेकिन समय के साथ इस पारंपरिक उत्सव के मायने भी बदलने लगे हैं। आज दीपावली सिर्फ पूजा, दीप और परिवार का त्योहार नहीं रही, बल्कि बड़े पैमाने पर उपभोक्तावादी बाजार का प्रतीक बन गई है। बदलते दौर में दीपावली एक ‘फेस्टिव सीजन’ के रूप में देखी जाने लगी है, जहां धार्मिक भावनाओं से ज्यादा चर्चा खरीददारी, सजावट और विदेशी ब्रांड्स की होती है। दीपावली का शुभारंभ धनतेरस से होता है, जिसे समृद्धि और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। भारतीय परंपरा में इस दिन भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्त्व है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि समुद्र मंथन के समय धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन कलश, बरतन, सोना-चांदी या कोई नई वस्तु खरीदना शुभ माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इस दिन की गई खरीददारी से घर में लक्ष्मी का आगमन होता है और सुख-समृद्धि बनी रहती है। पुराने समय में लोग अपनी क्षमता के अनुसार मिट्टी के दीये, पीतल के बरतन या छोटी-छोटी उपयोगी वस्तुएं खरीदकर पारिवारिक परंपरा निभाते थे। धनतेरस का अर्थ केवल वस्तुएं खरीदना नहीं, बल्कि नए आरंभ का प्रतीक था, जीवन में नई ऊर्जा, समृद्धि और आशा के स्वागत का दिन। लेकिन अब यह पारंपरिक स्वरूप भी बाजारवाद की चकाचौंध में ढल गया है। धनतेरस पर आज सोने-चांदी से लेकर महंगे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, गाडिय़ों और प्रॉपर्टी तक की खरीददारी की जाती है। शॉपिंग मॉल्स, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और बड़ी-बड़ी कंपनियां इस मौके को ‘गोल्डन सेल’ में बदल देती हैं।

2024 के आंकड़ों के अनुसार, केवल धनतेरस के दिन भारत में 30,000 करोड़ रुपए से अधिक की खरीददारी हुई। यह परंपरा के आधुनिक और व्यावसायिक रूप का स्पष्ट संकेत है। पिछले कुछ दशकों में दीपावली के स्वरूप में जो परिवर्तन आया है, वह हमारे समाज की बदलती जीवनशैली को भी दर्शाता है। एक समय था जब दीपावली की तैयारी हफ्तों पहले शुरू होती थी, घर की सफाई, दीयों को तैयार करना, रंगोली बनाना, अपने हाथों से मिठाइयां बनाना और पड़ोसियों से बांटना इस उत्सव का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करता था। गांवों और कस्बों में सामूहिक उत्सव का माहौल होता था। आज वही दीपावली बड़े शहरों में ब्रांडेड सजावट, चमकदार लाइटों और मिठाइयों के रेडीमेड पैकेटों में सिमटती जा रही है। लोग पहले जहां अपने हाथों से घर सजाते थे, अब डेकोरेशन एजेंसियों को बुलाकर काम करवाते हैं। दीयों की जगह रंग-बिरंगी चाइनीज लाइटों ने ले ली है। देशी मिट्टी के दीयों की जगह सस्ते विदेशी लाइटिंग प्रोडक्ट्स बाजार में छा गए हैं। इससे न केवल पारंपरिक कारीगरों की आजीविका पर असर पड़ा है, बल्कि सांस्कृतिक पहचान भी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार, दीपावली के दौरान भारत में 6,000 करोड़ रुपए से अधिक का चीनी सजावटी सामान बिकता है। इसी तरह मिठाइयों के स्थान पर ब्रांडेड चॉकलेट और गिफ्ट बॉक्स का चलन तेजी से बढ़ा है। बाजार में दीपावली अब ‘कंज्यूमर फेस्टिवल’ की तरह प्रस्तुत की जाती है। जहां एक ओर इस त्योहार की आर्थिक ताकत से व्यापार और उद्योग को गति मिलती है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक मूल्यों पर इसका असर भी नजर आता है। पहले दीपावली का अर्थ रिश्तों में मिठास और सामाजिक जुड़ाव होता था।

लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते थे, मिठाइयां और प्रेम बांटते थे। अब वही शुभकामनाएं मोबाइल संदेशों और सोशल मीडिया पोस्टों में सिमट गई हैं। रिश्तों में वह आत्मीयता और व्यक्तिगत स्पर्श धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। धनतेरस और दीपावली अब छोटे व्यापारियों के लिए चुनौती भी बनते जा रहे हैं। विदेशी और बड़े ब्रांडों के दबदबे में स्थानीय मिट्टी के दीये बेचने वाले कुम्हार और घरेलू उत्पाद तैयार करने वाले कारीगर बाजार में पिछड़ जाते हैं। ऑनलाइन प्लेटफॉम्र्स की छूट और चमकदार पैकेजिंग पारंपरिक बाजार को पीछे छोड़ देती है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचता है, जबकि विदेशी उत्पादों को बढ़ावा मिलता है। यह भी सच है कि समय के साथ परिवर्तन स्वाभाविक होता है। आधुनिक तकनीक और बदलती जीवनशैली ने दीपावली को अधिक भव्य बना दिया है। बिजली की रंगीन लाइटों ने घरों को और अधिक जगमग कर दिया है, ऑनलाइन प्लेटफॉम्र्स ने खरीददारी को आसान बना दिया है और दूर दराज बैठे रिश्तेदारों से वर्चुअल जुड़ाव ने भौगोलिक दूरी को घटाया है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इस बदलाव में हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। दीपावली की रोशनी तभी पूर्ण होगी जब उसमें परंपरा और आधुनिकता का संतुलन हो। विदेशी सजावटी सामानों के बजाय देशी दीयों और उत्पादों को प्राथमिकता दी जाए तो यह न केवल संस्कृति को संजोए रखने का कार्य होगा, बल्कि लाखों कारीगरों की आजीविका को भी सहारा मिलेगा। धनतेरस पर महंगी वस्तुएं खरीदने की होड़ लगाने के बजाय परंपरा का सम्मान करते हुए सादगी से उत्सव मनाया जा सकता है। अंतत: दीपावली केवल बाजार नहीं, एक भावना है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटा सा दीपक भी उसे मिटा सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखें। इस पर्व को केवल खरीददारी और दिखावे का उत्सव न बनने दें, बल्कि इसे रिश्तों, परंपरा और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ें। तभी दीपावली वास्तव में अपने उद्देश्य को पूरा कर पाएगी, अंधकार पर प्रकाश की विजय।-सिकंदर बंसल

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