क्या बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता के अंत की शुरुआत है नीतीश का ‘प्रयोग’?

Nitish Kumar News: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब पटना से दिल्ली जाने की तैयारी कर चुके हैं. नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं. उनका नामांकन हो चुका है. 16 मार्च को राज्यसभा चुनाव है. उन्हें राज्यसभा भेजने का नया प्रयोग लग रहा है. उनके हटने से जनता दल (यू) का भविष्य संकट में हो सकता है. चलिए समझते हैं नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के सियासी मायने.
बिहार ऐतिहासिक रूप से भारतीय राजनीति की वह प्रयोगशाला रहा है, जिसके नतीजों ने दूरगामी असर डाले हैं. फिर चाहे वह जेपी की संपूर्ण क्रांति हो या मंडल आयोग के बाद उपजी सामाजिक न्याय की लहर. लेकिन वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री को ‘जबरिया रिटायर’ कर राज्यसभा में भेजने का जो ‘नया प्रयोग’ हो रहा है, वह किसी के गले नहीं उतर रहा. नीतीश कुमार का यह तर्क भी हजम नहीं हो पा रहा है कि वे सारे सदनों में रह चुके हैं और अब बस राज्यसभा की कमी को पूरा करना चाहते हैं.
प्रथम दृष्टया यह मामला इसलिए भी असाधारण है, क्योंकि भारतीय राजनीति के प्रोटोकॉल में एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री की हैसियत किसी भी केंद्रीय मंत्री से कहीं अधिक प्रभावी मानी जाती है. फिर राष्ट्रीय फलक पर बिहार के मुख्यमंत्री का पद तो रुतबे के लिहाज से शीर्ष दस पदों में शुमार होता है. ऐसे में, महज एक सदन की सदस्यता का अनुभव लेने के लिए मुख्यमंत्री का पद त्यागना न केवल आश्चर्यजनक है, बल्कि सत्ता के गलियारों में कई गंभीर आशंकाओं को भी जन्म देता है.
दांव पर जदयू का भविष्य?
नीतीश कुमार का राज्य के शीर्ष सियासी पद से हटने पर राजी हो जाना सीधे तौर पर उनकी अपनी ही पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के भविष्य को दांव पर लगा देता है. यदि इतिहास पर नजर डालें तो जनता पार्टी की कोख से ही जनता दल और फिर जनता दल से कई दलों का निर्माण हुआ, जिनमें जनता दल (यू) भी शामिल है. इनमें से कुछ दलों का तो आज भी अपने-अपने राज्यों में अच्छा प्रभाव हैं, जैसे उप्र में समाजवादी पार्टी, बिहार में राजद और कर्नाटक में जनता दल (एस). लेकिन जनता पार्टी या जनता दल से ही निकलीं कई अन्य पार्टियां इतिहास के पन्नों में खो गईं, जैसे चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी. सुब्रमण्यम स्वामी भी अपनी एक पार्टी (जनता पार्टी) चलाते थे, लेकिन उनके भाजपा में शामिल होते ही वह भी विलुप्त हो गई. तो क्या नीतीश कुमार के इस कदम, जिसे उनके कई विरोधी भाजपा के समक्ष उनका ‘सरेंडर’ बता रहे हैं, से जनता दल (यू) का अस्तित्व संकट में नहीं आ जाएगा?
राष्ट्रीय दलों की छाया में बौने होते क्षेत्रीय दल!
यह सवाल आज इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय दलों के साथ गठबंधन करने वाले क्षेत्रीय दल अक्सर अपनी पहचान खो देते हैं. पहले कांग्रेस इस भूमिका में थी और आज वही भूमिका भाजपा निभा रही है. असम से लेकर महाराष्ट्र तक के उदाहरण गवाह हैं कि भाजपा के साथ जुड़ने से जहां राष्ट्रीय दल को विस्तार मिला, वहीं क्षेत्रीय साझेदार बौने होते चले गए. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे का मुख्यमंत्री से उपमुख्यमंत्री के स्तर पर आना या पंजाब में अकाली दल का हाशिए पर चले जाना इसी कड़वी हकीकत पर मोहर लगाता है. पूर्वोत्तर में तो स्थिति यह है कि क्षेत्रीय दल सत्ता में होने के बावजूद केंद्र या हिमंत बिस्वा सरमा जैसे क्षत्रपों के दिशा-निर्देशों के बिना एक कदम भी नहीं बढ़ा पाते.
नीतीश कुमार के बाद कौन?
तो क्या बिहार में जनता दल (यू) की नियति में भी यही लिखा है? तमाम क्षेत्रीय दलों के साथ एक समस्या यह होती है कि वहां दूसरी पंक्ति के नेताओं को तैयार करने की परिपाटी नहीं है. अधिकांश क्षेत्रीय दलों में उत्तराधिकार की डोर परिवार के हाथ में होती है. ऐसे में नीतीश कुमार के बाद कौन, यह सवाल और भी शिद्दत से इसलिए भी पूछा जा रहा है, क्योंकि उनकी पार्टी में ऐसा एक भी कद्दावर नेता नजर नहीं आ रहा, जो उनकी जगह ले सके और भाजपा जैसे अपने सीनियर सहयोगी के साथ पटरी बैठा सके. नीतीश कुमार ने राजनीति में अपने पुत्र निशांत कुमार को लाने में भी बहुत देर कर दी है.
‘मार्गदर्शक मंडल’ में नीतीश कुमार?
संयोग देखिए कि भाजपा ने सक्रिय राजनीति से संन्यास के लिए 75 वर्ष की आयु का एक अलिखित पैमाना तय कर रखा है। हालांकि कुछ अपवाद भी रहे हैं. इसी महीने की 1 तारीख को नीतीश कुमार ने भी अपने जीवन के 75 वर्ष पूरे कर लिए हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वे स्वयं को अपने ही दल के ‘मार्गदर्शक मंडल’ में शामिल करने की तैयारी कर चुके हैं? और इसके पीछे मजबूरी क्या है? क्या यह ‘प्रयोग’ बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता के अंत की शुरुआत है या किसी नए समीकरण का आगाज? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब शायद भविष्य में गर्भ में छिपे हों.



