राजनीति

पाक पर ईरानी हमला भारत के लिए मौका

विवेक शुक्ला

अपने को इस्लामिक संसार का नेता समझने के मुगालते में रहने वाले पाकिस्तान के आतंकवादियों के ठिकानों पर ईरान ने हमला बोलकर एक बड़ा संदेश दुनिया को दिया कि पाकिस्तान में आतंकी संगठन खुल्लम-खुल्ला काम कर रहे हैं। ईरान ने बीते मंगलवार को पाकिस्तान में आतंकवादी समूह जैश अल-अदल के ठिकानों को निशाना बनाकर हमले किए। हमले में मिसाइलों और ड्रोन का इस्तेमाल किया गया था। हमले से विचलित पाकिस्तान ईरान के एक्शन पर विरोध जताकर चुप हो गया है। ईरान के सरकारी मीडिया ने बताया कि बलूची आतंकी समूह जैश-अल-अदल के दो ठिकानों को मिसाइलों से निशाना बनाया गया। भारत तो दशकों से चीख-चीख कर दुनिया को बता रहा है कि पाकिस्तान आतंकवादियों को खाद-पानी देने वाला मुल्क है।

उल्लेखनीय है कि 28-29 सितंबर, 2016 की रात को भारतीय सेना के कमांडोज ने आजाद कश्मीर में घुसकर 38 आतंकी मार गिराए थे। अजीब इत्तेफाक है कि उसी समय पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर ईरान ने मोर्टार दागे थे। ईरान के बॉर्डर गार्ड्स ने सरहद पार से बलूचिस्तान में तीन मोर्टार दागे थे। इसलिए कहा जा सकता है कि ईरान पहले भी पाकिस्तान को निशाना बना चुका है।

पाकिस्तान और ईरान के बीच 900 किलोमीटर की सीमा है। याद रखिए कि यह वही ईरान है जिसने 1965 में भारत के साथ जंग में पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया था। ईरानी नेवी साथ दे रही थी पाक नेवी का। लेकिन तब से स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। एटमी गुंडे यानी पाकिस्तान से उसके कई पड़ोसी नाराज हैं, क्योंकि वो हर जगह आतंकवाद फैलाता रहा है।

ईरान पाकिस्तान से तब से नाराज है क्योंकि दोनों देशों की सीमा पर तैनात ईरान के दस सुरक्षाकर्मियों को 2017 में पाकिस्तान के आतंकवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था। तब से ही ईरान-पाकिस्तान के संबंध सामान्य नहीं रहे थे। ईरान-पाकिस्तान में इसलिए भी तनातनी रही है, क्योंकि ईरान शिया तो पाकिस्तान सुन्नी मुस्लिम देश है। पाकिस्तान की सऊदी अरब से नजदीकियां कभी भी ईरान को रास नहीं आई हैं। दरअसल, पाकिस्तान को सऊदी अरब से कच्चा तेल आराम से मिल जाता है। उसे कच्चा तेल तो ईरान, नाइजरिया या और किसी और देश से भी मिल सकता है, पर उसके नागरिकों को नौकरी और कोई देश नहीं दे सकता। इसलिए पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ चिपका रहता है। ईरान और पाकिस्तान के बीच संबंधों में बड़ा बदलाव तब आया जब दिसंबर, 2015 में सऊदी अरब ने आतंकवाद से लड़ने के लिए 34 देशों का एक ‘इस्लामी सैन्य गठबंधन’ का फैसला किया। लेकिन इस गठबंधन में शिया बहुल ईरान शामिल नहीं किए गए। इसमें सऊदी अरब ने पाकिस्तान को प्रमुखता के साथ जोड़ा। इस कारण ईरान काफी नाराज हुआ था पाकिस्तान से। इस गठबंधन का चीफ बनाया गया था पाकिस्तान का पूर्व आर्मी चीफ जनरल राहिल शरीफ को। ये गठबंधन कभी कायदे से अपना काम नहीं कर सका। इस गठबंधन को ईरान विरोधी के रूप में भी देखा गया, जो सऊदी अरब का मुख्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी है। खैर, ईरानी एक्शन भारत के लिए अनुपम अवसर है ईरान से अपने संबंधों को मजबूती देने का। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान की दो दिवसीय यात्रा पर जा चुके हैं। ईरान के राष्ट्रपति डॉ. हसन रूहानी के निमंत्रण पर हुई उस यात्रा में मोदी ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अल खुमैनी से भी मिले थे। खुमैनी आमतौर पर किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से मिलते नहीं हैं। लेकिन वे मोदी से मिले थे। साफ है कि ईरान ने मोदी की यात्रा को खासी तरजीह दी थी।

भारत के लिए ईरान एक बहुत महत्वपूर्ण देश है। ईरान न केवल तेल का बड़ा व्यापारिक केन्द्र है, बल्कि मध्य-एशिया, रूस तथा पूर्वी यूरोप जाने का एक अहम मार्ग भी है। भारत ऊर्जा से लबरेज ईरान के साथ अपने संबंधों में नई इबारत लिखने का मन बना चुका है। भारत मुख्य रूप से कच्चे तेल को सऊदी अरब और नाइजीरिया से आयात करता है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से ईरान को ये संदेश मिल गया था कि भारत उसके साथ आर्थिक और सामरिक संबंधों को मजबूती देना चाहता है।

भारत और अमेरिका के बीच 2008 में हुए असैन्य परमाणु करार के बाद ईरान के साथ बहुत सारी परियोजनाओं को या तो रद्द कर दिया गया था या टाल दिया था। इस कारण ईरान भारत से खफा तो था। भारत और ईरान के बीच मतभेद और गलतफमियां रही हैं। ईरान इस वजह से भारत से नाराज था क्योंकि उसने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) में ईरान के परमाणु रिकॉर्ड के खिलाफ नकारात्मक वोट किया था। दरअसल, भारत ने अमेरिका के दबाव में ईरान के खिलाफ वोट किया था।

ईरान भी भारत से संबंधों को मजबूती देना चाहता है। भारत तेल एवं गैस का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और वह ईरान से अधिकतम तेल एवं गैस खरीदना चाहता है। ईरान भी चाहता है कि उसे भारत जैसा बड़ा खरीददार मिल जाए।

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