ईरान, कट्टरवाद के बजाय सुधारवादी राष्ट्रपति

ईरान की जनता देश में कट्टरवाद को नकार दिया है उदारवादी एवं सुधारवादी नेता को अपना राष्ट्रपति चुना है। कट्टरपंथ की सत्ता से जनता तंग आ चुकी थी।
सुधारवादी मसूद पेजेशकियान का ईरान के राष्ट्रपति पद के लिए जीतना किसी आश्चर्य से कम नहीं है। ईरान में दोबारा चुनाव कराना पड़ा, क्योंकि प्रथम चरण में किसी भी प्रत्याशी को 50 फीसदी वोट नहीं मिले थे। दूसरे चरण में मसूद ईरान का नया और नरम चेहरा थे, जो समग्र तौर पर सुधारों के पक्षधर थे। उनके प्रतिपक्ष में ईरान का कट्टरवाद था। अब मसूद की जीत हुई है, तो माना जा रहा है कि अभी तक बंद, कट्टरपंथी और रूढि़वादी ईरान के नए आयाम खुलेंगे। ईरान सांस्कृतिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों और टकरावों से घिरा देश रहा है। अधिकतर पड़ोसी अरब देशों और पश्चिम से ईरान के टकरावपूर्ण और लंबे तनाव के समीकरण आज भी हैं। ईरान की जनता ने उदारवादी, सुधारवादी, नरम राष्ट्रपति का चुनाव किया है। साफ मायने हैं कि ईरान अब शेष दुनिया के साथ अमन-चैन के रिश्ते चाहता है, इंटरनेट को स्वतंत्र और मुक्त करने का पक्षधर है और खासकर औरतों पर से सामाजिक पाबंदियों और बंदिशों को उठाना चाहता है। दिवंगत राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी सईद जलीली की ईरान के भीतर और विदेशों के संदर्भ में नीतियां ‘कट्टरवादी’ थीं। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद के प्रतिपक्ष की सोच भी कट्टरपंथी थी। प्रतिपक्षी नेता जेल में भी रहे थे, लेकिन मसूद ने अपने प्रचार के लिए जो गीत रचा था, उसका सारांश यह था कि गलियों में नाचो, चुंबन लेते वक्त मत डरो और मेरी बहन, तुम्हारी बहन और हमारी बहन…! उसके उलट प्रतिपक्षी ने ईरान की औसत औरत पर कड़े नियंत्रणों की पैरवी की, ताकि परिवार नामक संस्थान की पवित्रता बरकरार रह सके। राष्ट्रपति मसूद ने संकेत दिए हैं कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान में बदलावों के अध्याय जोड़े जाएंगे। उन्होंने लोगों की सेवा करने की अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया और ईरान के लोगों की चिंताओं को ध्यान से सुनने का वायदा दोहराया।
सामाजिक स्तर पर सुधार किए जाएंगे। ईरानी औरत की उम्मीदें जगी हैं, लेकिन ईरान का इजरायल-विरोध जारी रहेगा। ईरान गाजा पट्टी, लेबनान, यमन का साथ देता रहेगा। ईरान पाकिस्तान और अफगानिस्तान की तनावपूर्ण सरहदों को नए आकार देने की भूमिका निभाते हुए काबुल और रावलपिंडी के बीच संतुलन स्थापित करना चाहता है। यह भूमिका ईरान का राष्ट्रीय सिद्धांत भी है। बहरहाल वहां की आर्थिक जरूरतों के मद्देनजर राष्ट्रपति मसूद चाहते हैं कि अमरीका अपनी पाबंदियां उठाए। उस संदर्भ में ईरान के रहस्यमयी ‘परमाणु कार्यक्रम’ का जो गतिरोध अमरीका के साथ रहा है, उसका समाधान शीघ्र ही निकालना होगा। ईरान की रूस और चीन के साथ जो सामरिक साझेदारी है, उस पर भी अमरीका को आश्वस्त करना होगा। अमरीका समेत पश्चिमी देशों के साथ ईरान के तनावपूर्ण संबंध राष्ट्रपति मसूद की सबसे गंभीर चुनौती है। जहां तक भारत-ईरान संबंधों का सवाल है, उसकी बुनियाद कच्चा तेल है। भारत के लिए ईरान कभी सबसे बड़ा तीसरा, तो कभी दूसरा देश रहा है, जो कच्चा तेल सप्लाई करता रहा है। बुनियादी तौर पर ईरान तेल के मामले में भारत का बहुत बड़ा स्रोत रहा है। चूंकि अमरीका ने ईरानी तेल के आयात पर पाबंदी चस्पा कर दी थी, लिहाजा उसके प्रभाव में भारत ने भी वित्त वर्ष 2019 में ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दिया था। अब ईरान 90 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल चीन को भेज रहा है। भारत ने रूस से इतनी मात्रा में कच्चे तेल का आयात किया है कि रूस की ढहती अर्थव्यवस्था फिर से खिलने लगी है। अमरीका और यूरोपीय देशों की आर्थिक पाबंदियों से रूस को भारत ने धराशायी नहीं होने दिया। ईरान के साथ भी भारत के पुराने सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। ईरान और अमरीका के बीच अमन-चैन के संबंध बनते हैं, तो वे भारत के लिए बेहद सुखद साबित हो सकते हैं। यदि टं्रप दोबारा अमरीका के राष्ट्रपति चुने जाते हैं, तो ईरान के संदर्भ में कोई महत्वपूर्ण फैसला ले सकते हैं। बहरहाल भारत को मसूद-युग में नई संभावनाओं को लपकना चाहिए।



