संपादकीय

ट्रंप की टैरिफ नीति से सतर्क रहे भारत, समझौते पर आगे बढ़ने से पहले करना होगा गहन मंथन

अमेरिका की गिनती उन देशों में होती है, जो एक सुव्यवस्थित ढांचे से संचालित होता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी अप्रत्याशित नीतियों से इस ढांचे में हलचल मचाए हुए हैं। एक बड़ी हलचल उनकी टैरिफ नीति के कारण मची है और उसका असर दुनिया भर में है। वह अपनी टैरिफ नीति से दूसरे देशों पर नकेल कसने और अमेरिकी खजाने को भरने का सपना पाले हुए हैं।

उन्होंने बड़े जोर-शोर से टैरिफ का एलान करते हुए उसे अमेरिकी इतिहास में ‘लिबरेशन डे’ यानी मुक्ति दिवस की संज्ञा दी थी। हालांकि अमेरिकी तंत्र के जरिये ही उनका यह सपना बिखरता दिख रहा है। उनकी टैरिफ नीति को कानूनी, आर्थिक एवं कूटनीतिक, सभी मोर्चों पर चुनौती मिल रही है। ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय आपातकाल का हवाला देते हुए जिस टैरिफ नीति की पैरवी की थी, उसे अमेरिकी संघीय अदालत ने राष्ट्रपति की प्राधिकारी शक्तियों की सीमा का उल्लंघन करार दिया।

अदालत ने कहा कि कांग्रेस यानी संसद की निगरानी के बिना कार्यपालिका को अंतरराष्ट्रीय आपात आर्थिक शक्ति अधिनियिम के प्रयोग का ऐसा अधिकार नहीं मिल सकता कि वह टैरिफ को लेकर मनमाने फैसले कर सके। वैसे अदालत ने ट्रंप की नीति पर अस्थायी रूप से रोक लगाई है और इसमें आगे सुनवाई जारी रहेगी, लेकिन वैश्विक व्यापार तंत्र पर इसके प्रभाव दिखने लगे हैं।

कानूनी मोर्चे से जुड़ा यह मामला टैरिफ नीति का आधा-अधूरा किस्सा है। व्यापार को लेकर ट्रंप का दृष्टिकोण विसंगितयों से भरा है। वह टैरिफ को किसी अक्षय निधि के रूप में देख रहे हैं कि इसके चलते लोगों को आयकर से मुक्ति दिलाई जा सकती है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था का कायापलट हो सकता है। वास्तविकता के धरातल पर उनका यह भ्रम टूट रहा है।

टैरिफ के जरिये सरकारी खजाने को भरने की ट्रंप की संकल्पना की न केवल अदालतों, बल्कि सामान्य आर्थिक सिद्धांतों के आधार पर भी हवा निकल रही है। दरअसल ट्रंप ने दोबारा सत्ता में वापसी के साथ ही पहले कार्यकाल वाले अपने ढर्रे को आगे बढ़ाना शुरू किया है। टैरिफ को हथियार बनाना, आपात शक्तियों का उपयोग करना एवं संसद को दरकिनार करना उनकी कार्यप्रणाली के मूल में है।

राष्ट्रपति की कमान संभालते ही उनके प्रशासन ने अनाप-शनाप टैरिफ लगाकर कहा कि इसका उद्देश्य घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान करना और सरकारी खजाने की सेहत को सुधारना है, लेकिन अदालत ने उनकी इस राह में अवरोध पैदा कर दिया। अदालत ने कहा कि मनमाने आर्थिक फैसलों के लिए आपात शक्तियों को ढाल नहीं बनाया जा सकता। ट्रंप की टैरिफ नीति की वजह से विधायिका और कार्यपालिका के बीच जो असंतुलन पैदा हुआ, उसे अदालत ने संतुलित करने का काम किया है, लेकिन यह सिर्फ अमेरिका का घरेलू कानूनी मसला नहीं है।

इसके चलते ब्रिटेन से लेकर भारत जैसे उन तमाम देशों के लिए अनिश्चितता बढ़ गई है, जो अमेरिका के साथ व्यापार समझौता वार्ता में लगे हैं। अगर राष्ट्रपति ट्रंप की मर्जी से टैरिफ नीति बने और अदालत उसे खारिज कर दे तो फिर कैसे स्थिर एवं दीर्घकालिक व्यापार समझौतों पर बात बन सकती है? वैसे ट्रंप के लिए यह कानूनी झटका आर्थिक मोर्चे पर भी उतना ही तगड़ा दिख रहा है। ट्रंप दोहरा रहे हैं कि दो लाख डालर से कम की आय वाले अमेरिकियों को आयकर नहीं देना होगा। इसके लिए वह विदेशियों की कमाई पर नजर गड़ाए हुए हैं।

2024 में अमेरिकी सरकार ने 4.9 ट्रिलियन (लाख करोड़) डालर राजस्व अर्जित किया। इसमें से केवल 100 अरब डालर की प्राप्ति आयात शुल्क से हुई। अगर इस साल मई तक इस संग्रह में 47 अरब डालर की बढ़ोतरी और मान ली जाए तो यह भी मामूली ही होगी। ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो का सुझाव है कि सभी आयात पर 20 प्रतिशत टैरिफ लगाने से सालाना 600 अरब डालर का राजस्व मिल सकता है। यह आकलन भी बुनियादी गणित पर खरा नहीं उतरता। आखिर ऊंचे टैरिफ को टिकने के लिए आधार भी तो चाहिए।

जब टैरिफ बढ़ते हैं तो सामान्य रूप से आयात की मांग घट जाती है और इसके प्रतिक्रियास्वरूप जितना लाभ मिलता है, उससे अधिक नुकसान होने की आशंका रहती है। पेन व्हार्टन बजट माडल ने इस हानि को लेकर एक बहुत व्यावहारिक आंकड़ा 290 अरब डालर सालाना का दिया है। द टैक्स फाउंडेशन ने करीब 140 अरब डालर का अनुमान व्यक्त किया है। ये सभी आकलन ट्रंप के आयकर से राहत दिलाने वाले उस सपने से बहुत दूर रह जाते हैं, जिसकी पूर्ति के लिए 2025 में ही 740 अरब डालर की लागत आएगी।

सच तो यह है कि ट्रंप की टैरिफ नीति अमेरिका का अहित करते हुए उसके मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन को बढ़त दिलाने का आधार तैयार करेगी। अपने नागरिकों को आयकर से राहत दिलाने के फेर में ट्रंप उन्हें सस्ते चीनी सामानों की लत लगाने का जोखिम उठा रहे हैं। उनकी टैरिफ नीति अमेरिका के व्यापार साझेदारों के लिए किसी कड़े संदेश से कम नहीं। स्टील-एल्युमीनियम को लेकर ब्रिटेन के साथ बात बनते-बनते बिगड़ गई। जापान, कनाडा और यूरोपीय संघ भी यह आकलन करने में लगे हैं कि टैरिफ को लेकर ट्रंप के पैंतरे में आखिर कितना दम है। भारत के लिए भी यह नाजुक समय है।

नई दिल्ली वाशिंगटन के साथ आर्थिक एवं तकनीकी संबंधों को लेकर सतर्कता के साथ कदम बढ़ा रही है। यह समय की मांग है कि यदि ट्रंप की टैरिफ नीति को ध्यान में रखकर ही अमेरिका से कोई समझौता किया जा रहा है तो उस पर गहराई से विचार किया जाए, क्योंकि ऐसा समझौता जोखिम भरा हो सकता है। भारत को केवल आर्थिक रियायतों की ही नहीं, बल्कि कानूनी सुनिश्चितता की भी गारंटी लेनी होगी।

ध्यान रहे कि रणनीतिक धैर्य कोई सहूलियत नहीं, बल्कि आवश्यक पहलू है। ऐसा लगता है कि अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता में लगे देशों को अदालती हस्तक्षेप के चलते कुछ राहत मिलेगी। अदालत के रुख से स्पष्ट है कि अमेरिका की व्यापार नीति न्यायिक निगरानी के दायरे से बाहर नहीं। आर्थिक आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि टैरिफ के दम पर किसी आधुनिक कल्याणकारी राज्य का संचालन संभव नहीं।

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