राजनीति

ट्रंप दोस्त पर भारत देखे अपना हित

भारत का एक लोकतांत्रिक देश के रूप में सम्मान है। उसे चीन के खिलाफ सहयोगी माना जाता है। यह सोच भी है कि भारत से अमेरिका में टैलेंटेड लोग आते हैं। लेकिन भारत को यह याद रखना होगा कि ट्रंप ऐसे दौर में अमेरिका का नेतृत्व करने जा रहे हैं, जब दुनिया का हरेक देश अपने हित में कदम उठाएगा। आज कोई भी देश दूसरे पर पूरी तरह आश्रित नहीं है और ट्रंप के अमेरिका से तो यह आशा भी नहीं करनी चाहिए।

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव से पहले कई सर्वे हुए। इनमें जिस सर्वे के एक सवाल के जवाब ने मुझे चौंकाया, उसमें हर 10 में से 7 ने कहा, ‘इस देश को बड़े बदलाव की जरूरत है नहीं तो इसके टुकड़े हो जाने चाहिए।’ अब अमेरिकियों ने डॉनल्ड ट्रंप को अपना राष्ट्रपति चुन लिया है, जिन्हें वाइट हाउस में अब तक सबसे ज्यादा उथलपुथल मचाने वाला माना जाता है।

वादा पूरा होगा?
ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान वादा किया था कि वह शपथ लेने वाले दिन ही 2 करोड़ अवैध प्रवासियों को देश से बाहर का रास्ता दिखाएंगे। दुनिया की नजरें इस पर होंगी कि इस वादे को लेकर वह क्या करते हैं। पहले ही दिन उन्होंने अपने ट्रेडिंग पार्टनर्स और सहयोगी देशों से आने वाले सामान पर 20% शुल्क लगाने का भी वादा किया था।

मोलभाव का पैंतरा
ट्रंप ने यह भी कहा था कि वह अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ मुकदमा चलवाएंगे और संघीय नौकरशाहों के बदले राजनीतिक व्यक्तियों को नियुक्त करेंगे। वैसे, उनकी टीम ने इन मुद्दों के बारे में यही कहा कि ये सिर्फ बातें हैं, इन पर अमल नहीं किया जाएगा या इनमें से कुछ के आधार पर दूसरे देशों के साथ मोलभाव किया जाएगा।

लोग हैं बेहाल
इसके बावजूद आम अमेरिकियों ने बड़े बदलाव का वादा करने वाले प्रत्याशी को चुना। उनका मानना है कि अभी जो व्यवस्था है, उसमें आम लोगों की नहीं सुनी जा रही। दुनिया भले ही अमेरिकी कंस्यूमर्स की ताकत को मजबूत मानती हो, लेकिन यहां बेघरों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे लोग भी बढ़ रहे हैं, जो क्रेडिट कार्ड का बकाया नहीं चुका पा रहे। अमेरिका में आय के लिहाज से निचले स्तर पर जो 40% लोग हैं, उनका देश में कुल खर्च में योगदान 20% है। दूसरी ओर, जो सबसे अमीर 20% हैं, उनका खर्च में 40% योगदान है। यह बहुत बड़ा अंतर है।

हैरिस की गलती
कोविड महामारी के दौर में ग्राहकों का भरोसा टूट गया था। उसके बाद इसमें रिकवरी तो आई है, लेकिन यह अमीर लोगों में जितनी ज्यादा दिख रही है, उतनी मध्यमवर्गीय और कम आय वर्ग में नहीं। डेमोक्रेट्स को पता था कि लोगों में आर्थिक हालात को लेकर बेचैनी है। इसलिए कमला हैरिस ने चुनाव प्रचार के दौरान बदलाव का वादा किया। शायद यह शब्द उतना प्रभावशाली नहीं था, जिसकी वोटरों की उम्मीद थी।

सही मुद्दे उठाए
ट्रंप ने प्रचार के दौरान कमरतोड़ महंगाई, हिंसक अपराध, अवैध प्रवासियों की घुसपैठ और अमेरिका को तबाह करने की कोशिश में जुटे ‘डीप स्टेट’ जैसे मुद्दे उठाए। लोगों में बाइडन राज के दौरान लालफीताशाही को लेकर गुस्सा था। ऐसे में उन्हें ट्रंप सही प्रत्याशी लगे। चुनाव से पहले के सर्वे में जब यह सवाल वोटरों से पूछा गया कि इकॉनमी को बेहतर ढंग से कौन मैनेज कर सकता है तो लोगों ने उन्हें कमला हैरिस पर तरजीह दी।

खराब रेकॉर्ड
वैसे, कई मामलों में पहले कार्यकाल में ट्रंप पारंपरिक रिपब्लिकन राष्ट्रपति जैसे ही थे। उन्हें हर मर्ज का एक ही इलाज दिखा- टैक्स कटौती। 2017 में उन्होंने टैक्स में जो कटौती की, वह बगैर किसी संकट के दिया गया सबसे बड़ा राहत पैकेज था। आखिर में उनकी आर्थिक नीतियां वैसी ही निकलीं, जैसी कि पिछली आधी सदी से दोनों पार्टियों की रही हैं। यानी बढ़ते सरकारी घाटे से बेपरवाह रहना।

सरकारी घाटा बढ़ेगा
बाइडन के आने के बाद इसमें और इजाफा हुआ। अब ट्रंप कह रहे हैं कि वह टैक्स में कटौती और बढ़ाएंगे। अभी घाटा GDP के 6% से अधिक है। इस लिहाज से अमेरिका यूरोपीय देशों से भी आगे है। कुछ अनुमान के मुताबिक, अगर टैक्स में कटौती का वादा ट्रंप पूरा करते हैं तो घाटा बढ़कर कुछ वर्षों में GDP के 7-8% तक चला जाएगा। इसके साथ पब्लिक डेट में भी बढ़ोतरी होगी, जो पहले ही GDP के 100% से अधिक है और यह एक रेकॉर्ड है।

नीति-निर्माताओं की सोच
अमेरिकी नीति-निर्माता अपने यहां की अर्थव्यवस्था पर फख्र करते हैं। उन्हें लगता है कि टेक्नॉलजी में बादशाहत की बदौलत उनका देश जापान, यूरोप और यहां तक कि चीन को भी धूल चटा चुका है। लेकिन वे भूल जाते हैं कि अमेरिकी इकॉनमी के इस कमाल की वजह बढ़ता सरकारी घाटा है। उन्हें लगता है कि यह घाटा इसलिए मायने नहीं रखता क्योंकि दुनिया अमेरिकी बॉन्ड और दूसरे एसेट्स खरीदती रहेगी।

संकट की आहट
जब इस घाटे की वजह से बॉन्ड मार्केट विद्रोह कर देगा और दूसरे देश अमेरिकी असेट्स खरीदना बंद या कम कर देंगे तो यह कॉन्फिडेंस भी खत्म हो जाएगा। फिलहाल तो यही लग रहा है कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका में फिस्कल क्राइसिस हो सकता है।

बाजार के संकेत
लेकिन चुनावी नतीजे आने के बाद अमेरिका के शेयर बाजार और डॉलर में तेजी आई क्योंकि मार्केट को लग रहा है कि ट्रंप जो आयात शुल्क लगाएंगे, उससे दूसरे देशों को नुकसान होगा। लेकिन अगर बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी होती रही तो यह खयाल जल्द ही बदल सकता है। बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर सरकारी घाटे की लागत और बढ़ेगी।

भारत को फायदा
लेकिन इन हालात में भारत को फायदा हो सकता है। जब भी डॉलर कमजोर होता है, भारत जैसे उभरते हुए देशों को लाभ होता है। उभरते हुए देशों में भारत सबसे मजबूत और विविधतापूर्ण है। यह भी सच है कि आज अमेरिका के अजेंडा में भारत बहुत ऊपर नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान शायद ही भारत का जिक्र हुआ हो। लेकिन यह अच्छी बात ही है। असल में, जिन देशों का चुनाव प्रचार के दौरान जिक्र हुआ, उन्हें अमेरिका में आशंका की नजर से ही देखा जाता है। इनमें मेक्सिको, चीन, रूस और यूक्रेन शामिल हैं।

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