पीएम के निशाने पर ‘इंडिया’

बेशक नीतीश कुमार के भाजपा से जुडऩे का व्यापक असर राष्ट्रीय राजनीति पर न पड़े, क्योंकि उनकी सियासत बिहार तक ही सीमित रही है, लेकिन वह राजनीति की अवधारणा बदल सकते हैं। विपक्षी गठबंधन के तौर पर जो अवधारणा देश भर में बन सकती थी, वह अब बिखर सकती है। यूं कहें कि बिखराव के मुहाने पर है। नीतीश ने ही प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाते हुए विपक्ष का आह्वान किया था कि एकजुट होकर चुनाव लड़ोगे, तो भाजपा को 100 सीटों तक रोका जा सकता है। हालांकि यह आह्वान भी अतिशयोक्ति था, लेकिन नीतीश ने ही सूत्रधार बनकर अपील की थी कि कांग्रेस को धुरी बनाए बिना कोई विपक्षी गठबंधन कारगर साबित नहीं हो सकता, क्योंकि वह विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है और उसकी व्यापकता भी असंदिग्ध है। उन्होंने सोनिया-राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खडग़े से लेकर ममता बनर्जी, केजरीवाल, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव, अखिलेश यादव और वामपंथी नेताओं तक सभी से मुलाकात कर एक साझा मंच बनाने की कोशिशें जारी रखीं। दरअसल विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ नीतीश के राजनीतिक प्रयासों का ही प्रतिफल है। यह दीगर है कि वह इस नामकरण से सहमत नहीं थे। सवाल है कि कल तक जो शख्स विपक्ष का सूत्रधार था, उसे गठबंधन का संयोजक तक क्यों नहीं बनाया गया? क्या जातीय गणना के मुद्दे पर असहमति और आरक्षण के विरोधाभासों के कारण नीतीश को हाशिए पर रखा गया? न तो उनमें प्रधानमंत्री बनने की इच्छा थी और न ही उनकी पार्टी इतनी बड़ी है कि प्रधानमंत्री पद का दावा कर सके। दरअसल जो अंतर्विरोध कांग्रेस और समाजवादी दलों के बीच 1970 के दशक में गहराए थे, वे आज भी मौजूद हैं, बेशक पिछले कुछ दशकों से कांग्रेस इन्हीं दलों की सरकारों को समर्थन देती रही है। आज उन्हीं के समर्थन और सहयोग से विपक्षी गठबंधन बनाने को विवश है।
‘इंडिया’ में भी कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के कंधों पर सवार होकर खुद को मजबूत करने की राजनीति कर रही है। नतीजतन ममता बनर्जी, केजरीवाल ने गठबंधन न करने के बयान दिए हैं और नीतीश कुमार तो पाला बदल कर भाजपा के साथ चले गए हैं। उप्र में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस को 11 सीटें देने की घोषणा की थी, लेकिन कांग्रेस अब भी 16 सीटें लेने पर अड़ी है और सपा अध्यक्ष की घोषणा को ‘अपरिपक्व’ करार दे रही है। बहरहाल गठबंधन की जो धारणा देश भर में बन रही थी, नीतीश कुमार के पाला बदलने के बाद वह जरूर खंडित हुई है। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की चुनावी रणनीति भिन्न है। दरअसल ‘इंडिया’ प्रधानमंत्री मोदी के निशाने पर रहा है, ताकि ‘मोदी बनाम विपक्ष का साझा चेहरा’ वाला चुनाव न हो सके। भीतरी सूत्रों का दावा है कि सितंबर से जनवरी के बीच प्रधानमंत्री और नीतीश के बीच 9 बार बातचीत हुई है। तीन बार तो प्रधानमंत्री ने औपचारिक तौर पर नीतीश से बात की थी। जाहिर है कि पाला बदलने के अलावा विपक्षी गठबंधन को छिन्न-भिन्न करने पर बात हुई होगी! ‘इंडिया’ गठबंधन के तौर पर अभी तक पुख्ता नहीं हो पाया है, लेकिन प्रधानमंत्री की रणनीति के मुताबिक भाजपा छोटी से छोटी पार्टी को भी साथ में जोड़ रही है, ताकि जातीय और क्षेत्र के स्तर पर जो छिद्र और फासले शेष रहेंगे, उन्हें भरा जा सके और लगातार तीसरी बार एनडीए का प्रधानमंत्री चुना जा सके। नीतीश कुमार ‘लोअर-ओबीसी’ समुदाय के कद्दावर नेता रहे हैं। उन्हें दलितों के एक तबके का भी समर्थन हासिल है। इस वर्ग को भाजपा साधना चाहती है।



