संपादकीय

यूनुस की प्रायॉरिटी में भारत…

हसीना सरकार के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन को आखिरी पलों में जिस प्रकार भारत विरोधी और सांप्रदायिक रूप देने की कोशिश की गई, उससे साफ है कि वहां भारत विरोधी और कट्टरपंथी ताकतें मौके की ताक में बैठी हैं। हालांकि यूनुस भी इन बातों को समझते हैं। उन्होंने नई जिम्मेदारी की पेशकश स्वीकारने के बाद यह साफ कर दिया कि भारत से रिश्ते सुधारने के कई मौके मिलेंगे और यह उनकी प्राथमिकता में है। भारत भी हर मौके पर यह साफ करता रहा है कि बांग्लादेश के आंतरिक मामलों से सम्मानजनक दूरी बनाए रखते हुए भी वह न केवल उसके साथ विशिष्ट और करीबी रिश्ता कायम रखना चाहता है बल्कि विकास की उसकी यात्रा में योगदान भी जारी रखना चाहता है।

बांग्लादेश के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस ने गुरुवार को अंतरिम सरकार के मुखिया के तौर पर शपथ ग्रहण किया। इसके साथ ही शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद छोड़ने को मजबूर होने और देश छोड़ने के बाद नेतृत्वहीनता जैसी स्थिति से गुजर रहे बांग्लादेश में एक ऐसी सरकार बन गई, जिस पर देश को उथलपुथल के इस दौर से निकाल कर वहां शांति व्यवस्था और सामान्य स्थिति कायम करने की जिम्मेदारी है।

मोहम्मद यूनुस दुनिया के 32वें नोबेल पुरस्कार विजेता हैं, जिन पर किसी देश को नेतृत्व देने की जिम्मेदारी आन पड़ी। यह बांग्लादेश के लोगों के बीच उनकी विश्वसनीयता का सबूत है कि जो लोग छात्र आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, उनकी ओर से उनका नाम इस जिम्मेदारी के लिए सुझाया गया। इसके पीछे कुछ भूमिका इस तथ्य की भी होगी कि वह अर्से से हसीना सरकार के निशाने पर रहे हैं। इसके बावजूद कि गरीबों को छोटे-छोटे लोन देकर उन्हें गरीबी से निकालने का उनका आइडिया न केवल बांग्लादेश में सफल रहा बल्कि उसकी तर्ज पर ग्रामीण बैंक का प्रयोग करीब 100 अन्य देशों में चलाया जा रहा है।

इसमें दो राय नहीं कि व्यक्तिगत तौर पर मोहम्मद यूनुस उदार और आधुनिक विचारों वाले शख्स हैं जिनकी प्राथमिकता विकास की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की होगी। लेकिन असल सवाल यह है कि अंतरिम सरकार के मुखिया के तौर पर उनके हाथों में कितनी ताकत रहती है। आखिर उन्हें सेना, राष्ट्रपति और जमात और BNP जैसी राजनीतिक ताकतों की ओर से डाले जा रहे दबावों के बीच काम करना होगा।

बहरहाल, अंतरिम सरकार एक तात्कालिक व्यवस्था ही है जिसका उद्देश्य देश में सामान्य स्थिति कायम करके जल्द से जल्द एक एक निर्वाचित सरकार के हाथों में सत्ता सौंपना है। ऐसे में देखना होगा कि अगले कुछ दिनों और महीनों में वहां किस तरह का माहौल बनता है और लोकतांत्रिक शक्तियां मौजूदा चुनौतियों का सामना कितनी मजबूती से करती हैं।

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