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सजा बढ़ाने से नहीं रुकेंगी रेप की घटनाएं और भी बहुत कुछ बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता

क्या सजा बढ़ाने से रुकेंगी रेप की घटनाएं? इसमें संदेह है। क्या इस देश में डांस बार में महिलाओं को नचाना जरूरी है? अगर डांस ही देखना है तो क्या शराब पिलाना जरूरी है? विवाह-शादियों में शराब जैसा जहर पिलाना ही है तो क्या उसे पिलाने के लिए लड़कियां ही चाहिए और लड़कियां भी वे जिन्हें आधे-अधूरे वस्त्रों में वहां लाया जाता है… इस तरह के आयोजन पर रोक लगाने की आवश्यकता है। तभी हम इस तरह की घटनाओं पर कुछ हद तक सफल हो सकते हैं।

मैं अपने भारत देश की बात कर रही हूं। हमारा मंत्र है : ‘मातृवत परदारेषु’। हम मां को प्रथम आचार्य मानते हैं और प्रथम गुरु भी। वर्ष में दो बार कन्या पूजन करते हैं और रक्षाबंधन भी सांस्कृतिक त्योहार है। कोई भी शुभ कार्य करना हो तो पहले कन्या पूजन करते हैं। वैष्णो देवी के दरबार में सुबह-शाम की आरती के बाद किस प्रकार कंजकों अर्थात बच्चियों का पूजन होता है और देखने वाले कितनी श्रद्धा से देखते हैं, यह भी पूरा देश जानता है। फिर भी उसी भारत देश के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यह आंकड़े दे रहा है कि भारत में एक दिन में औसतन 87 बलात्कार की घटनाएं होती हैं। अंग्रेजी में रेप कह देते हैंए शायद वास्तविकता को छिपाने के लिए। इसके साथ ही भारत की राजधानी दिल्ली में दिल्ली पुलिस द्वारा दी जानकारी के अनुसार एक दिन में पांच और छह के लगभग महिलाएं, बालिकाएं दरिंदगी का शिकार होती हैं। एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले वर्षों के मुकाबले रेप के मामलों में 13.23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह स्वयं में ही लज्जाजनक समाचार है। व्यक्ति की नहीं, राष्ट्र के लिए भी शर्म की बात है। ताजा आंकड़ों के अनुसार राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश के बाद दिल्ली में ऐसी घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं।

केवल अगस्त के महीने में दक्षिण, पश्चिम, उत्तर-पश्चिम भारत के सभी भागों में भारत की बेटियां बलात्कार का शिकार हुईं। बंगाल के कलकत्ता में डाक्टर के साथ अस्पताल परिसर में ही जो दरिंदगी हुई, उसके लिए पूरे देश का डाक्टर आंदोलन कर रहा है, सुरक्षा की मांग कर रहा है। पीडि़ता के लिए न्याय की बात कही जा रही है और इस हड़ताल के कारण देश के गरीब ही दुखी हुए। बेटी को न्याय मिले, सब चाहते हैं, पर गरीब के बच्चे अस्पताल की दहलीज से बिना इलाज करवाकर तड़पते वापस आ जाएं, यह कोई नहीं चाहता। मेरा एक प्रश्न है कि जो गुस्सा, जो विरोध प्रदर्शन, जो राजनीतिक दूषणबाजी बंगाल की डाक्टर के लिए हो रही है, उसके शोर में हमारे नेता, पक्ष और विपक्ष के सत्तापति उन दुर्घटनाओं को क्यों नहीं देख-सुन रहे जहां एक दर्जन से ज्यादा बेटियां इस कामवासना के अंधे पुरुषों की पशुवृत्ति का शिकार हुईं। कहीं यह कोई राजनीतिक हित की पूर्ति तो नहीं हो रही? यह तो एकदम ताजी घटना है कि ठाणा जिला महाराष्ट्र के एक स्कूल में स्कूल के ही कर्मचारियों ने दो बच्चियों के साथ यौन शोषण का अपराध किया। जैसे ही माता-पिता को पता चला, पुलिस भी हरकत में आई। अपराधी गिरफ्तार भी हो गया, लेकिन दो दिन पहले वहां ऐसा प्रदर्शन हुआ जिसमें स्कूल भवन भी तोड़ दिया गया, रेल ट्रैक जाम कर दिया, हजारों व्यक्ति क्रोध से उबलते हुए सडक़ों पर आए। पुलिस से टकराव भी हो गया। गुस्सा होना ही चाहिए। बेटियों के साथ इस पशुवृत्ति को रोकना ही होगा, पर आखिर कब तक यह सब होता रहेगा? इसी सप्ताह पंजाब की एक लडक़ी क्यों और कैसे उत्तराखंड के देहरादून में एक बस में शायद रात के समय पहुंची और बस के ड्राइवर, कंडक्टर आदि पांच पुरुषों की शिकार हुई। ऐसी जानकारी मिली है कि उसकी आयु से कई वर्ष बड़े वे बलात्कारी थे। उसके पिता की आयु से भी बड़े, बड़े भाई से भी बड़े।

एक व्यक्ति तो 57 वर्ष की आयु का था और सबसे छोटा 34 वर्ष का। अब प्रश्न यह है कि क्या लडक़ी उन्हें अपनी वासनापूर्ति का साधन दिखाई देती है? उसको संरक्षण देने की बात, उसे उसके ठिकाने पहुंचाने की बात किसी के मन में नहीं आती? आखिर ऐसी अपराध वृत्ति देश के इन पुरुषों में क्यों पैदा हो गई? एक नहीं अनेक घटनाएं अगस्त की हैं। बैंगलोर के एडीशनल पुलिस कमिश्नर रमन गुप्ता ने भी बताया कि एक लडक़ी जो रात को घर लौट रही थी, वह किसी से लिफ्ट मांगने का अपराध कर बैठी और फिर लूटी गई। तमिलनाडु के एक स्कूल में नाबालिग छात्राओं के साथ यौन उत्पीडऩ किया गया। एक छात्रा के साथ यौन शोषण भी हुआ। यह सारा दुष्कर्म एक फर्जी एनसीसी कैंप के दौरान किया गया। पुलिस ने स्कूल के प्रिंसिपल समेत 11 लोगों को गिरफ्तार किया। तमिलनाडु के त्रिची में दस वर्षीय मासूम का यौन शोषण हुआ। राजस्थान के जोधपुर से तीन वर्षीय बच्ची से दरिंदगी का मामला सामने आया है। कूड़ा बीनने वाले परिवार की बच्ची उठाकर ले गए और अपनी हवस का शिकार बनाया। अभी ताजी घटना है। अमृतसर के एक होटल में लुधियाना से लाई गई बच्ची की भी यही किस्मत रही। यह ठीक है कि पुलिस ने केस दर्ज कर लिया। गिरफ्तारी भी हो गई, पर जो चोट इन बेटियों को सहनी पड़ी, उसका उपचार कभी नहीं हो सकेगा। घटनाएं तो इस समय भी हो रही होंगी, जब यह संदेश लिखा जा रहा है देश को पहुंचाने के लिए, पर इसका हल क्या है? जो समर्थ लोग हैं, उन्हें अपना रंग-ढंग बदलना होगा। यहां फैशन मेले होते हैं। अधिकतर वस्त्र आभूषण के प्रदर्शन के लिए नहीं, महिलाओं के अर्धनग्न शरीरों का प्रदर्शन किया जाता है। अमीरों का बदनुमा रिवाज चल पड़ा, विवाह-शादियों में शराब पिलाने के लिए देशी-विदेशी लड़कियों को किराए पर लिया जाता है। तथाकथित स्पा सेंटरों में थाईलैंड तक की लड़कियां पंजाब में कितनी पहुंच चुकी हैं, सरकार को भी पता नहीं। जैसे अमृतसर में स्पा सेंटर पकड़ा गया, लड़कियां हाथ में आ गईं। जो बड़े बड़े ग्राहक थे, वे न कानून को दिखाई दिए, न समाज को, क्योंकि वे पैसे वाले थे। मुंबई जैसे महानगरों के डांस बार में डांस देखने कितने लोग जाते हैं।

वे उनके हाव-भाव, अश्लील इशारे देखने और करने के लिए उन पर नोट उड़ाते हैं। कामुकता को ही बढ़ावा देते हैं और महिलाओं के शरीर इस तरह खरीदे जाते हैं। मुझे लगता है कि हमने बहुत महिला दिवस मना लिए। बाल दिवस, पिता दिवस, माता दिवस, चाकलेट दिवस, वेलेंटाइन डे, बहुत कुछ मना लिया। अब देश में पुरुष दिवस मनाना चाहिए। वर्ष में एक बार नहीं, हर महीने। उस दिन हर घर की महिला अपने पुत्र, पिता, पति, भाई आदि सभी पुरुष रिश्तेदारों से यह संकल्प ले कि देश की हर बेटी को अपनी बेटी, अपनी बहन, अपनी मां के रूप में ही देखेंगे। फैशन मेलों में उनके शरीर पर नोट उड़ाने नहीं जाएंगे। डांस बार में शराब के साथ शबाब के नजारे नहीं लेंगे। अगर दुर्गा पूजन व कन्या पूजन करना ही है तो दुनिया की किसी भी बेटी को न अश्लील शब्द कहेंगे, न कुदृष्टि डालेंगे। यह भी समझाना होगा कि जो गालियां वे निकालते हैं, वे गालियां महिलाओं की शालीनता के विरुद्ध हैं, उनका अपमान करने वाली हैं।

मुझे तो सरकारों की अक्ल पर कभी-कभी रोना आता है कि जो जाति के लिए अपमानजनक शब्द कहने पर कानून पकड़ता है, वही कानून महिला सूचक गालियां निकालने के लिए इन पुरुषों को क्यों नहीं पकड़ता? क्या इस देश में डांस बार में महिलाओं को नचाना जरूरी है? अगर डांस ही देखना है तो क्या शराब पिलाना जरूरी है? विवाह शादियों में शराब जैसा जहर पिलाना ही है तो क्या उसे पिलाने के लिए लड़कियां ही चाहिए और लड़कियां भी वे जिन्हें आधे अधूरे वस्त्रों में वहां लाया जाता है। आखिर किस किताब में यह लिखा है कि शरीर पर मालिश करने के लिए देशी-विदेशी लड़कियां ही चाहिए। जब पुरुषों के लिए मालिश करने वाली लड़कियां लाई जाती हैं तो इसका सीधा अर्थ यही है कि यह उनका कामुकता को शांत करने का नहीं, बल्कि और भडक़ाने का एक ढंग है। क्या भारत सरकार बता सकती है कि पूरे देश के स्पा सेंटरों या डांस बार या विवाह-शादियों में शराब पिलाने के लिए विदेशों से कितनी लड़कियां देश में लाई गई हैं? ऐसे कौनसे गिरोह हैं जो इन लड़कियों को लाते हैं और फिर वही हालत होती है जो अमृतसर के स्पा सेंटर में थाईलैंड की लड़कियां छत से कूदीं।-लक्ष्मीकांता चावला

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