देव संस्कृति के आलोक में

महा शिवरात्रि की चहलकदमी में अपने सांस्कृतिक महत्त्व की प्रस्तुति दे रहा है। देव संस्कृति की परंपराओं में विराजित विश्वास सारे माहौल को रुहानियत से जोड़ देगा और तब परंपराओं के दर्पण में यह शहर अपनी संस्कृति की फेहरिस्त पर हस्ताक्षर करता दिखेगा। इस अद्भुत नजारे से असली हासिल है क्या और यह उत्सव साल भर के दर्शन में आखिर मंडी के भरोसे क्या छोड़ जाता। शिवरात्रि चार दिन की चांदनी नहीं, मंदिरों के शहर का वर्ष भर का उजाला क्यों न बने। हर देवता के पीछे अगर एक इतिहास चलता है, तो आस्था के ये पुंज निरंतर प्रदर्शित होने चाहिएं। देव संस्कृति के आलोक में शिवरात्रि का महत्त्व इसके हर पहलू की जानकारी है, तो मंडी विश्वविद्यालय में देव संस्कृति की खंडपीठ स्थापित होनी चाहिए। शहर में एक ऐसे कला-संस्कृति केंद्र की जरूरत है, जहां एक शाखा में अध्ययन की परिपाटी हो, तो दूसरी ओर कला संग्रह के माध्यम से देव संस्कृति की जीवंतता, पृष्ठभूमि में उपजता बोध तथा वाद्य यंत्रों के मार्फत गूंजती कला का स्थायी प्रदर्शन हो। कुछ इसी परिप्रेक्ष्य में मंडी की पृष्ठभूमि में काशी का उद्घोष अगर हर दिन सुनाना है, तो एक व्यापक योजना की जरूरत है। बेहद दुख की बात है कि मंडी का विस्तार शहर की मानसिकता में ही होता रहा, जबकि यह एक तीर्थ, हिमाचल का धार्मिक हृदय तथा सांस्कृतिक उजास का चेहरा रहा है। गलियों में गूंजते मंदिरों के घंटे अब अतिक्रमण की दीवारों ने रौंद दिए। प्रदक्षिणा की खोज में आस्था के पांव थक जाते हैं। इस मामले में सरकारों की नीतियां भी कम दोषी नहीं। एडीबी के सामथ्र्य में पर्यटन के कंगूरे खड़े करने वालों ने मंडी के धार्मिक व सांस्कृतिक महत्त्व पर क्या किया। क्या सारे मंदिरों का एक सर्किट बना कर हम एलिवेटिड परिक्रमा की शुरुआत नहीं कर सकते। ब्यास के तट पर मंडी शहर का वैभव अगर स्थायी घाट तथा कृत्रिम झील के आधार पर होता, तो शिव की धरती को साल भर पूजा जाता। बेशक महोत्सव की धाक में एक सरकारी आचार संहिता बन गई है। जलेब अब उत्सव और शानो शौकत की तरह पगडिय़ां गिनते हैं, तो राजसी ठाठ में सरकार के ओहदे दिखाई देते हैं। बड़े होते शहर में गिनती के कदम, ये तेरा अनुशासन था कि हम भीड़ से देखें। अब जनता देखती है, त्योहार के साथ चलती नहीं।
आएंगे बड़े से बड़े गायक और झूमेंगे उस ताल पर, जो हमारी है ही नहीं। सुना है बड़ा झूला आकाश से दिखाएगा मेला, जहां व्यापार की मोमबत्तियां शहर के बाजार में पिघलेंगी। हमें क्यों लगता है कि सभी मेले एक सरीखे हो गए हैं। सभी के सभी कार्बन कापी। क्या मंडी की शिवरात्रि का गीत-संगीत और हरोली उत्सव का म्यूजिक एक जैसा होना चाहिए। क्यों नहीं हम वृंदावन की परिक्रमा जैसा कोई कोरिडोर या एलिवेटिड परिक्रमा मार्ग बना कर इस स्थान को स्थायी रुतबा प्रदान कर दें। आश्चर्य यह भी है कि सुजानपुर और चंबा के चौगानों की तरह मंडी का पड्डल मैदान भी इतना सिकुड़ गया है कि नए विकल्प चाहिएं। ऐसी अधोसंरचना चाहिए ताकि देवता आसानी से विश्राम करें। विडंबना यह भी है कि बिना पारंपरिक मान्यताओं और सांस्कृतिक महत्त्व के आजकल देवयात्रा के सफर पर यह संस्कृति बदनाम होने लगी है, तो पवित्रता को बनाए रखने की चुनौती भी दिखाई देती है। देव आगमन व प्रस्थान की रिवायत के बीच जब वाद्य यंत्र गूंजते हैं, तो यह संगीत का महोत्सव भी है। बजंतरियों का मेला और मेले में इतिहास को संजोए रखने का अहसास सदा जिंदा रहना चाहिए। इसलिए हम यह मांग रखते हैं कि शिवरात्रि एक पक्ष नहीं, एक कक्ष, एक स्थायी परंपरा का निर्वहन है, लेकिन इसके कारणों को हम शहरीकरण में न गंवा दे। मंडी शहर का विकास मांग करता है कि इसके बीच मंदिरों की पवित्रता, उनके दायरों की सुरक्षा तथा भक्तों के सदाबहार आचरण को देखते ऐसी अधोसंरचना विकसित हो कि दुनिया हर दिन यहां की धूलि और ओज में पलती संस्कृति, कला व आस्था को महसूस कर सके।



