संपादकीय

‘विकसित देश’ बनना है तो…

हम हररोज और निरंतर सुनते रहे हैं कि 2047 में भारत एक ‘विकसित राष्ट्र’ होगा। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार और भाजपा-एनडीए का यह संकल्प है और देश की जनता का भी आह्वान किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने भारत को दुनिया के लिए ‘कारखाना’ करार दिया है, जबकि यह अद्र्धसत्य लगता है, क्योंकि भारत मैन्यूफैक्चरिंग (विनिर्माण, उत्पादन आदि) में पिछड़ता जा रहा है। लक्ष्य तय किया गया था कि इस क्षेत्र का जीडीपी में योगदान कमोबेश 25 फीसदी होना चाहिए, लेकिन यह हिस्सेदारी 15 फीसदी से भी कम हो गई है। यह ऐसा क्षेत्र है, जिसमें रोजगार के व्यापक अवसर बनते हैं। दरअसल भारत ‘मैन्यूफैक्चरिंग हब’ के बजाय ‘टे्रडिंग देश’ बनता जा रहा है। चीन से आयात बढऩा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इधर विश्व बैंक के साथ-साथ कुछ अन्य एजेंसियों और संस्थाओं की भी रपटें सामने आई हैं। ऐसी रपटें भारत की अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थितियों, श्रम-शक्ति और भागीदारी, हमारी औसत आय आदि के विभिन्न पहलुओं के अध्ययन और सर्वेक्षण पर आधारित होती हैं, लिहाजा उन्हें सिरे से नकारा नहीं जा सकता। यदि भारत सरकार पारदर्शी, स्पष्ट और निष्पक्ष डाटा देश के सामने पेश करती रहती, तो इन रपटों की कोई जरूरत ही नहीं थी और देश के औसत नागरिक के सामने तमाम स्थितियां साफ होतीं। जो भी डाटा सरकारी विभाग जारी करते हैं, वे या तो अद्र्धसत्य होते हैं अथवा यथार्थ को ढक कर चलते हैं। बहरहाल अब आकलन यह किया जा रहा है कि यदि भारत को 2047 में ‘विकसित राष्ट्र’ बनना है, तो उसकी सालाना आर्थिक विकास दर 7.8 फीसदी लगातार होनी चाहिए, लेकिन अभी 2025-26 के बजट में विकास दर 6.5 फीसदी का अनुमान लगाया गया है। लगभग यही अनुमान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का है। वास्तव में यह विकास दर 5 फीसदी के करीब होगी, क्योंकि कई समीकरणों, तथ्यों, उत्पादन, मुद्रास्फीति की दर आदि का सही मूल्यांकन बाद में ही किया जा सकता है। अभी भारत में प्रति व्यक्ति आय करीब 2.20 लाख रुपए सालाना बताई जाती है, जबकि विकसित देश बनने के लिए यह कमोबेश 15.48 लाख रुपए होनी चाहिए। भारत में करीब 100 करोड़ लोगों के पास इतना अतिरिक्त पैसा नहीं है कि वे गैर-जरूरी चीजों पर भी खर्च कर सकें। मात्र 10 फीसदी भारतीयों के पास ही निरंतर खर्च करने की क्षमता है। क्या भारत की अर्थव्यवस्था और जीडीपी 10 फीसदी लोगों के बूते ही है?

यदि भारत को वाकई ‘विकसित देश’ बनना है, तो श्रम की भागीदारी 65 फीसदी या उससे अधिक होनी चाहिए, जबकि यह भागीदारी फिलहाल 56.4 फीसदी है। आम आदमी की औसत आय करीब 28 फीसदी बढ़ी है, जबकि उद्योगपतियों और अमीरों की आय में 350 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह आर्थिक असमानता भारत का यथार्थ है, लिहाजा विकसित अर्थव्यवस्था को लेकर इतराना नहीं चाहिए। अभी तो भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने से काफी पीछे है, लिहाजा 5 ट्रिलियन डॉलर तो बहुत दूर की कौड़ी है। वैसे दावे तो 30 ट्रिलियन डॉलर के भी किए जा रहे हैं। जिस देश में 81 करोड़ से अधिक लोगों को, हर माह, मुफ्त अनाज मुहैया कराया जा रहा हो और यह योजना 2029 तक जारी रहनी हो, तो वह देश 2047 तक विकसित देशों की जमात में शामिल कैसे हो सकता है? दरअसल मुफ्तखोरी की राजनीति देश के एक वर्ग को आलसी, निकम्मा बना रही है और अर्थव्यवस्था को खोखला कर रही है, लिहाजा भारत में कौशल की कमी है, उत्पादन की कमी है, आय-व्यय के समीकरण असंतुलित हैं। अर्थव्यवस्था कैसे विस्तार पाएगी? 10 फीसदी लोगों के सहारे ही देश कब तक चलेगा? यह भारत का भीतरी यथार्थ है। चूंकि आय में अधिक बढ़ोतरी नहीं है अथवा आय के स्रोत सूखते जा रहे हैं, तो असर औसत बचत पर भी पड़ेगा। भारत में बचत में करीब 44 फीसदी की कमी आई है। जो बचत 2019-20 में 11 लाख करोड़ रुपए से अधिक थी, अब 2024-25 में वह घट कर 6.52 लाख करोड़ रुपए हो गई है। देश में बेरोजगारी और महंगाई पर कोई नियंत्रण नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य में कोई महत्वपूर्ण विकास नहीं है। हमारी मुद्रा ‘रुपया’ लगातार गिर रहा है। यदि विकसित देश बनना है, तो भारत की सरकार और जनता को एक लंबा, थकाऊ सफर तय करना पड़ेगा।

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