ज्योतिषी

हरतालिका तीज व्रत, जल त्याग का अदृश्य संकल्प, दांपत्य सुख का दिव्य वरदान

हरतालिका तीज, माता पार्वती की तपस्या का स्मरण कराता है, जहाँ स्त्रियाँ शिव-पार्वती की पूजा करके 24 घंटे निर्जल व्रत रखती हैं। यह व्रत सौभाग्य, दांपत्य सुख और उत्तम संतान की प्राप्ति का प्रतीक है।

हरतालिका तीज निर्जला व्रत, माता पार्वती की तपस्या की स्मृति है, स्त्रियां शिव-पार्वती पूजन कर 24 घंटे जल त्यागती हैं। यह व्रत सौभाग्य, दांपत्य सुख और उत्तम संतान की प्राप्ति का प्रतीक है, श्रृंगार, उपवास और दान के माध्यम से स्त्री अपने भीतर की दिव्यता जाग्रत करती है।

व्रत कथा के अनुसार, पार्वती जी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया था। उन्होंने जंगल में बिना अन्न और जल के कई दिनों तक ध्यान और उपवास किया। इस कठोर तपस्या की स्मृति में व्रती स्त्रियां भी हरतालिका तीज के दिन बिना जल ग्रहण किए व्रत करती हैं। यह व्रत शारीरिक संयम के साथ-साथ मानसिक और आत्मिक नियंत्रण करता है। जल न पीना व्रतधारिणी के संकल्प, भक्ति, निष्ठा और समर्पण को दर्शाता है।

हरतालिका व्रत यानी बड़ी तीज की मान्यता है कि जो स्त्रियां इस दिन पूरे दिन निर्जला उपवास रखकर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन करती हैं, उन्हें अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और सुखी वैवाहिक जीवन का वरदान प्राप्त होता है। अगर कोई कन्या यह व्रत करे, तो उसे जीवन में उत्तम पति, शुभ संतान की प्राप्ति होती है। जिन स्त्रियों का वैवाहिक जीवन कलह के कारण उथल-पुथल हो रहा हो, उन्हें इस दिन पार्वती जी की पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन की मंगलकामना अवश्य करनी चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से जैसे माता पार्वती की इच्छा पूर्ण हुई थी, उसी प्रकार व्रतकर्ता स्त्री की मनोकामना पूर्ण होती है।

हरतालिका व्रत की विधि
व्रती स्त्रियां सोलह श्रृंगार करती हैं, हाथों में सुंदर मेहंदी, पैरों में महावर और हरे-लाल नवीन वस्त्र धारण करती हैं। प्रमुख रूप से शिव-पार्वती तथा गणेशजी की पूजा की जाती है। इस व्रत में 24 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है, जो अगली सुबह जल ग्रहण कर पारण के साथ पूर्ण होता है। पारण से पूर्व व्रती महिलाएं सौभाग्य, द्रव्य और वायन छूकर ब्राह्मणों को दान देती हैं, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और संतुलन बना रहे। हालांकि हरतालिका की विधि में लोक परम्पराओं और कुल परम्पराओं के अनुसार भिन्नताएं हो सकती हैं, परंतु व्रत का मूल भाव एक ही है, शिव-पार्वती के प्रेम और आशीर्वाद के प्रतीक इस पर्व में स्त्री अपने भीतर की दिव्य शक्ति को जागृत करें। व्रत की यह तपस्या स्त्री के भीतर की दिव्य शक्ति को जागृत करती है जो उसके जीवन में केवल दांपत्य सुख को बढ़ाकर आत्मिक संतुलन और आध्यात्मिक शांति से भी भर देती है।

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