संपादकीय

आर्थिकी का केंद्र बने आधी आबादी…

कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से देश को विकसित बनाने में ही सफलता नहीं मिलेगी बल्कि लैंगिक समानता के लक्ष्य को पाने में भी सहायता मिलेगी । कामकाजी महिलाएं महिला सशक्तीकरण का पर्याय हैं । इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि जो देश विकसित हैं उनमें कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी भी अधिक है ।

 विश्व बैंक की हाल में आई रिपोर्ट ‘बिकमिंग ए हाई इनकम इकोनमी इन ए जेनरेशन’ बताती है कि 2047 तक भारत को उच्च आय वाला देश बनने के लिए औसतन 7.8 प्रतिशत की दर से विकास करना होगा। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वित्तीय क्षेत्र के साथ-साथ भूमि और श्रम सुधार भी करने होंगे।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2000 से अब तक भारतीय आर्थिकी लगभग चार गुना बढ़ी है और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पादन करीब तीन गुना हो गया है। इसी दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 2000 में 1.6 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 3.4 प्रतिशत हो गई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट इस पहलू पर जोर देती है कि 2047 तक भारत को महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर को 35.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करके जनसंख्यिकीय लाभ उठाना चाहिए।

पिछले छह वर्षों में महिला रोजगार से संबंधित आंकड़े आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, बेरोजगारी दर में कमी, कार्यबल में शिक्षित महिलाओं की बढ़ती संख्या और आय में लगातार वृद्धि की ओर इशारा करते हैं। दुनिया भर के आंकड़े यह बता रहे हैं कि महिलाओं द्वारा संचालित उद्यम निरंतर बढ़ रहे हैं और महिलाएं घरेलू आय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

आर्थिक विकास को गति देने में ‘सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम आकार के उद्यम’ (एमएसएमई) वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में हैं। इंटरनेशनल फाइनेंस कारपोरेशन के मुताबिक एमएसएमई वैश्विक अर्थव्यवस्था में 90 प्रतिशत से अधिक व्यवसायों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो 70 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार देते हैं। भारत की जीडीपी में एमएसएमई का योगदान वित्त वर्ष 2017-18 में 29.7 प्रतिशत था, जो 2022-23 में बढ़कर 30.01 प्रतिशत हो गया।

पुरुषों के एकाधिकार वाले उद्यमों में भी महिलाओं ने अपनी जगह बनाई है। इसका प्रमाण यह है कि सात मार्च, 2025 तक कुल एमएसएमई पंजीकरण में जहां पुरुषों का प्रतिशत 59.52 था, वहीं महिलाओं का 40.10 प्रतिशत। ये आंकड़े मिसाल हैं कि महिलाएं आर्थिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने के लिए तत्पर हैं। देश में लगभग 15 प्रतिशत यूनिकार्न स्टार्टअप की संस्थापक कम से कम एक महिला है। महिलाओं के नेतृत्व वाले इन यूनिकार्न का संयुक्त मूल्य 4,000 करोड़ रुपये से अधिक है।

विश्व बैंक के शोध पत्र ‘फोस्टरिंग फीमेल ग्रोथ आंत्रप्रेन्योरशिप इन रूरल इंडिया’ के अनुसार महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों को बढ़ावा देने से ग्रामीण भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर और आर्थिक विकास को काफी बढ़ावा मिल सकता है। उसके अनुसार अगर इस क्षेत्र में प्रयासों में तीव्रता लाई जाए तो 2030 तक महिलाओं के स्वामित्व वाले 3.95 करोड़ उद्यम हो सकते हैं।

बैन एंड कंपनी और गूगल की एक संयुक्त रिपोर्ट-‘वुमन आंत्रप्रेन्योरशिप इन इंडिया-पावरिंग द इकोनमी विद हर’ के अनुसार भारत में महिला उद्यमी 2030 तक 15-17 करोड़ नौकरियां पैदा कर सकती हैं, जो पूरी कामकाजी आबादी के लिए जरूरी नई नौकरियों के 24 प्रतिशत से अधिक हैं। भारत के आर्थिक विकास में ग्रामीण आर्थिकी वह आधार स्तंभ है, जिसकी मजबूती से विकसित भारत की संकल्पना साकार हो सकती है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार ग्रामीण महिलाओं में स्वरोजगार वाले श्रमिकों/ नियोक्ताओं की हिस्सेदारी 2017-18 में 19 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 31.02 प्रतिशत हो गई है, जो स्वतंत्र कार्य और उद्यमिता की ओर महत्वपूर्ण कदम है।

नीति आयोग की एक रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण महिलाओं में स्वरोजगार उन सभी क्षेत्रों में हुआ है, जहां सरकारी सहायता प्रमुख रही है। राष्ट्रीय स्तर पर 15 मंत्रालयों के तहत 70 केंद्रीय योजनाएं उद्यमिता को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं। इसके अतिरिक्त सरकार ने महिला श्रमिकों की रोजगार क्षमता में सुधार लाने में योगदान देने वाली विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू किया है, जिसमें सबसे आशाजनक है ‘प्रधानमंत्री कौशल भारत योजना।’

लगभग नौ करोड़ महिलाएं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हुई हैं। कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र सरकार की कई योजनाएं चल रही हैं। ऐसी योजनाएं राज्य सरकारें भी संचालित करें। इसके साथ ही उन्हें कानून एवं व्यवस्था पर भी अतिरिक्त ध्यान देना चाहिए। इससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपने समक्ष उपस्थित संभावनाओं को भुनाने के लिए प्रेरित होती हैं।

महिला श्रमबल भागीदारी 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है। आर्थिक समीक्षा के अनुसार इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला कृषि रोजगार 2017-18 में 73.02 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 76.9 प्रतिशत हो गया। इस प्रकार यह कार्य बल के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रवेश की एक शक्तिशाली लहर को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त महिला बेरोजगारी दर में उल्लेखनीय गिरावट नौकरी की उपलब्धता में वृद्धि का संकेत देती है।

कार्यबल में महिलाओं की उपस्थिति आर्थिक विकास का एक शक्तिशाली चालक सिद्ध हो रही है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का उत्पादकता बढ़ाने, नवाचारों को बढ़ावा देने और अधिक वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देने पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अर्थव्यवस्था में ज्यादा महिलाओं का योगदान आंकड़ों से कहीं अधिक एक मजबूत अर्थव्यवस्था का संकेत देता है। इसके साथ ही यह सतत आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने और 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण को प्राप्त करने में महिलाओं की परिवर्तनकारी भूमिका का प्रतीक भी है।

कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से देश को विकसित बनाने में ही सफलता नहीं मिलेगी, बल्कि लैंगिक समानता के लक्ष्य को पाने में भी सहायता मिलेगी। कामकाजी महिलाएं महिला सशक्तीकरण का पर्याय हैं। इस तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि जो देश विकसित हैं, उनमें कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी भी अधिक है।

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