गुरु तेग बहादुर, औरंगजेब व वाल्मीकि समाज…

ईमानदार रहना, सत्य व्यवहार करना, अन्याय का यथाशक्ति प्रतिकार सभी का धर्म है। इस लिहाज से धर्म को कत्र्तव्य भी कहा जाता है। सामान्य स्थिति में तो सभी अपने-अपने धर्म या कत्र्तव्य का पालन करते ही हैं। लेकिन परीक्षा तब होती है जब धर्म के पालन के रास्ते में कोई बड़ी बाधा आ खड़ी होती है…
मुगल बादशाह औरंगजेब को लेकर बहस बंद होने का नाम नहीं ले रही। कुछ विद्वान औरंगजेब के गुणों को तलाशने में अपनी सारी बुद्धि खपा रहे हैं। जिन दिनों औरंगजेब और उसके दरबारी उसको हिंदुस्तान का बादशाह बता रहे थे, उन दिनों हिंदोस्तान के लोग गुरु तेग बहादुर को हिंदुस्तान का सच्चा पातशाह मान रहे थे। एक बादशाह लोगों के शरीर पर राज कर रहा था और दूसरा पातशाह उनकी चेतना का बादशाह था। औरंगजेब ने हिंदुस्तान के इस सच्चे पातशाह को दिल्ली के चांदनी चौक में अमानवीय यातनाएं देकर शहीद कर दिया था। लेकिन देश का यह सच्चा पातशाह मर कर भी जिंदा रहा, लेकिन औरंगजेब जिंदा होते हुए भी मर गया था। चांदनी चौक की मस्जिद के पास गुरु जी का धड़ और सिर अलग-अलग पड़े थे। मुगल शासन ने गुरु जी की देह को उठाने पर प्रतिबंध लगा दिया था ताकि जनमानस में स्थायी भय डाला जा सके। लेकिन क्या मुगल सत्ता के इस अमानवीय कार्य से सचमुच आम भारतीय डर गया था या फिर गुरुजी और उनके साथियों के इस आत्मबलिदान से उनमें एक नई चेतना और ऊर्जा जागृत हुई? गुरु जी ने आनंदपुर से चलने से पहले ही अनुमान लगा लिया था कि उनके बलिदान से आम जनता में तूफान खड़ा हो जाएगा। औरंगजेब का अनुमान था कि इस भयानक मंजर से भारत के लोग और अधिक डर जाएंगे और स्वतंत्रता के प्रयास सदा के लिए समाप्त हो जाएंगे। लेकिन इस शहादत के बाद पता चला कि गुरु तेग बहादुर जी का अनुमान ही सही था।
उसका कारण यही था कि दशगुरु परंपरा भारतीय चेतना व ऊर्जा का ही स्वरूप था। भारत की आत्मा को इस परंपरा से ज्यादा और कौन जानता था? घटनास्थल पर मुगल सेना का पहरा था। मौसम बहुत ही खराब होने लगा था। रात्रि का अंधकार। तूफान। बादल और बिजली की गर्जना। गुरुजी के शरीर को वहां से कैसे उठाया जाए, ताकि विधिवत उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। मुगल शासन से इसकी गुहार लगाना निरर्थक था क्योंकि मुगल साम्राज्य तो अपने इस अमानुषिक कृत्य से भविष्य में भी भारतीय समाज को आतंकित और भयभीत करना चाहता था, ताकि आने वाले समय में भी कोई साम्राज्य के सामने सिर उठा कर न चल सके। लेकिन गुरु जी के इस आत्मबलिदान ने तो जनमानस में आग भर दी थी। शायद चिडिय़ों के बाज बनने की पहली इबारत लिखी गई थी। लवाना समाज का लक्खी शाह बंजारा। बंजारा में न जाने कहां से अदम्य साहस का संचार हो गया। उसने निर्णय कर लिया कि वह गुरु जी के शरीर का संस्कार करेगा, चाहे उसे इसके लिए कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। उसके तीनों पुत्र नगाहिया, हेमा और हाडी भी इस पवित्र कार्य में अपने पिता के सहयोगी बने। उसका व्यवसाय अपने छकड़ों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर सामान पहुंचाने का था। जब छकड़े गुरु जी की शहादत से पावन हो चुकी उस जमीन पर पहुंचे तो लक्खी और उसके बेटों ने किसी तरह चौकीदारों को भुलावे में डालते हुए, अपने प्राणों की भी चिंता न करते हुए गुरु जी का धड़ उठाकर अपने एक छकड़े में रख लिया। वे सभी गुरु जी की देह को लेकर रायसीना अपने गांव में पहुंचे। लेकिन प्रश्न था कि वे इसका विधिवत संस्कार कहां करें? कहीं भी करते तो मुगल शासकों को शक हो सकता था। ‘माघ सुदि पंचमी विक्रमी सम्वत् 1732 की रात को उसने गुरुजी के मृत शरीर को अपने सारे सामान के साथ अपने घर में ही जला दिया।’ (मोहिंदर पाल कोहली, गुरु तेग बहादुर-पृ. 40)। आकाश को छूती हुई अग्नि की लपटें उठने लगीं। गुरु जी का शरीर पंचभूतों में विलीन हो गया। ज्योति अग्नि की ज्योति में जा मिली। गांव के लोग एकत्रित हो गए। वे लक्खी के साथ, उसका घर जल जाने पर दुख जताने लगे। लेकिन लक्खी तो जानता था कि इस अग्निकुंड में एक पावन शरीर का संस्कार हुआ है, जिसके कारण उस गांव की धरती पावन हो गई है। वह तीर्थ क्षेत्र बन गई है।
आज उस स्थान पर रकाबगंज गुरुद्वारा लक्खी के त्याग का साक्षी है। उधर चांदनी चौक के बलिदान स्थल पर साहस का एक दूसरा अध्याय लिखा जा रहा था। गुरु जी का शीश अभी भी वहीं पड़ा था। वहीं भीड़ में वाल्मीकि समाज के कुछ युवक बेचैन हो रहे थे। काजी को देखते ही उनका रक्त खौलने लगा था। इसी वाल्मीकि समाज के पुरखों ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में कभी शस्त्र और शास्त्र का गहरा अभ्यास किया था। आज वह ऋण चुकाने का अवसर आ गया था। इन वाल्मीकि युवकों में से भाई जैता ने संकल्प लिया कि वह गुरु जी के शीश को किसी भी तरह ले जाकर उनके सुपुत्र श्री गोविंद सिंह जी के पास पहुंचाएगा ताकि वे उसका विधिवत अंतिम संस्कार कर सकें। भाई जैता ने अपने साथियों ननुआ और ऊदा के साथ मिल कर इस साहसी अभियान को अंजाम दिया। उसने रात के अंधेरे में घटनास्थल से गुरु जी का शीश उठाया और घोड़े पर सवार होकर आनंदपुर की ओर चल पड़ा। कुछ देर बाद उसके दो अन्य साथी भी उसके साथ आ मिले। लेकिन तीनों अपने बीच में एक सुरक्षित अंतराल बनाए हुए थे ताकि किसी को शक न हो जाए। उधर मुगल शासन आग बबूला हो रहा था। हर जगह धरपकड़ हो रही थी। लेकिन भाई जैता और उसके साथियों ने मौत की भी परवाह न करते हुए पांच दिन बाद गुरु जी का शीश आनंदपुर में उनके बेटे गोविंद सिंह जी को सौंप दिया। 16 नवंबर 1675 को गोविंद सिंह जी ने अपने पिता के शीश का विधिवत अंतिम संस्कार किया। आजकल वहां एक गुरुद्वारा मौजूद है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि कुछ दिनों के उपरांत लक्खी दास अपने बेटों के साथ गुरु तेग बहादुर जी की अस्थियां लेकर आनंदपुर साहिब पहुंचा। उसने गोविंद सिंह जी को गुरु जी के शरीर के संस्कार की सारी घटना बताई और उनकी अस्थियां उन्हें सौंप दीं। सभी ने मिल कर अस्थियों को विधिवत पावन सतलुज में प्रवाहित कर दिया। तिब्बत से चली हुई सतलुज गुरु जी की अस्थियों को लेकर आगे चल पड़ी। इस प्रकार भारतीय इतिहास के एक अविस्मरणीय अध्याय का पटाक्षेप हुआ।
अपने धर्म यानी स्वधर्म की रक्षा करते हुए प्राणोत्सर्ग का यह अनुपम उदाहरण कहा जा सकता है। कहा भी गया है, ‘स्वधर्मे निधनं श्रेष्ठ’ अर्थात अपने धर्म में निधन ही श्रेष्ठ है। धर्म के बारे में कथन है, ‘धर्मों रक्षति रक्षत:।’ धर्म उसकी रक्षा करते हैं जो धर्म की रक्षा करते हैं। यह समाज के संदर्भ में और भी सटीक है। समाज धर्म के अनुसार चले, तभी सभी प्रकार की उन्नति होती है। जो समाज धर्म की रक्षा नहीं करता, धर्म भी उस समाज की रक्षा नहीं करता। उस समाज में अराजकता फैल जाती है और वह अधर्म के रास्ते पर चलते हुए अंतत: नष्ट हो जाता है। धर्म के कुछ तत्व शाश्वत या सनातन होते हैं और कुछ कालक्रमानुसार बदलते रहते हैं। धर्म के स्वरूप भी अनेक होते हैं। उदाहरण के लिए समाज धर्म, राजधर्म, व्यक्ति धर्म इत्यादि। प्रत्येक व्यवसाय का भी अपना-अपना धर्म होता है। उदाहरण के लिए अध्यापक का धर्म सभी छात्रों से व्यक्तिगत राग-द्वेष को परे रखते हुए समान व्यवहार करना। डाक्टर या चिकित्सक का धर्म बिना किसी भेदभाव से बीमार का इलाज करना। न्यायाधीश का धर्म भय या लालच से निरपेक्ष रह कर न्याय करना। इसी प्रकार ईमानदार रहना, सत्य व्यवहार करना, अन्याय का यथाशक्ति प्रतिकार सभी का धर्म है। इस लिहाज से धर्म को कत्र्तव्य भी कहा जाता है। सामान्य स्थिति में तो सभी अपने-अपने धर्म या कत्र्तव्य का पालन करते ही हैं। लेकिन परीक्षा तब होती है जब धर्म के पालन के रास्ते में कोई बड़ी बाधा आ खड़ी होती है। वाल्मीकि समाज ने संकट की घड़ी में इतिहास लिखा।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री



