संपादकीय

आस्था का विराट रूप

अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में आज प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इस कार्यक्रम ने जितना व्यापक रूप ले लिया है, इसकी पहले से शायद ही किसी को कल्पना रही हो। यह सही है कि देश के हिंदू समाज का बड़ा हिस्सा इस घड़ी का लंबे समय से इंतजार कर रहा था, लेकिन फिर भी इसे लेकर जिस तरह का माहौल बना है, उसे असाधारण ही नहीं, अभूतपूर्व कहा जा सकता है।

राजनीतिक सर्वसम्मति : इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तो यह है कि मंदिर निर्माण को लेकर देश में पूरी तरह से सर्वसम्मति बन चुकी है। जो भी किंतु-परंतु थे, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समाप्त हो गए। देश के तमाम राजनीतिक दल इस मसले पर साथ खड़े दिख रहे हैं। जो प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं हो रहे, वे भी इसका विरोध नहीं कर रहे, किसी न किसी तरह से समर्थन ही जता रहे हैं।

सुनियोजित प्रयास : 
दूसरी वजह यह है कि मंदिर निर्माण की प्रक्रिया से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े संगठनों ने इस काम में किसी तरह की खेमेबाजी को आड़े नहीं आने दिया। हिंदुत्व से जुड़े तमाम पंथों, समूहों, संप्रदायों को खुले दिल से इस कार्यक्रम में शामिल किया गया। आबादी के बड़े से बड़े हिस्से को सांकेतिक रूप में ही सही, पर इस प्रक्रिया में शामिल करने के विशेष प्रयास किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और उनकी छवि व लोकप्रियता का भी इस पूरी प्रक्रिया पर साफ असर देखा जा सकता है।

संचार के साधन : अगर अतीत में पहले कभी इस तरह का परिदृश्य नहीं दिखा तो उसकी एक वजह संचार के वे नए-नए साधन भी हैं जो विज्ञान ने हाल के समय में मुहैया कराए हैं। टीवी चैनल ही नहीं, सोशल मीडिया की मौजूदगी, हर हाथ में स्मार्टफोन और इंटरनेट तक आसान पहुंच की इसमें बड़ी भूमिका रही है।

नफरत की जगह नहीं : इस पूरे अभियान की सबसे अच्छी बात यह है कि यह किसी के खिलाफ नहीं है। इसमें किसी भी पंथ, संप्रदाय या समूह के लिए नफरत नहीं दिख रही है। सबका पॉजिटिव नजरिया ही सामने आ रहा है।

सतर्कता की जरूरत : 
सवाल है कि पॉजिटिविटी और उत्साह भरे इस माहौल में सबकुछ सिर्फ अच्छा ही अच्छा है या इसमें कुछ ऐसा भी है जिससे सावधान रहने की जरूरत है। तात्कालिक तौर पर भले सब ठीक लग रहा हो लेकिन लंबे फलक पर देखा जाए तो एक खास समूह की आस्था का यह जुनून देश और समाज के लिए समस्या भी पैदा कर सकता है। एक तो शासन और धर्म के बीच सम्मानजनक दूरी बनाए रखने की जो भावना संविधान में प्रतिष्ठित की गई है, वह कमजोर पड़ते जाने का खतरा है और दूसरी बात कि देशवासियों के जीवन की बुनियादी जरूरतों से जुड़े मसलों के लिए राजनीति में स्पेस कम होते जाने की आशंका है।

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