चीनी की बढ़ती कीमतों पर भारत सरकार की सफाई: इथेनॉल नहीं, ये हैं असली वजहें

नई दिल्ली: देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर चर्चा तेज है। पिछले कुछ हफ्तों में चीनी के दाम में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 20 जुलाई 2026 को चीनी की औसत कीमत ₹48.18 प्रति किलोग्राम थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर ₹55.70 प्रति किलोग्राम पहुंच गई। यानी करीब एक महीने में कीमत में ₹7.52 प्रति किलो का इजाफा हुआ है।
इथेनॉल उत्पादन को लेकर उठे सवाल
कीमतों में इस बढ़ोतरी के बीच इथेनॉल उत्पादन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने साफ किया है कि चीनी की मौजूदा महंगाई के लिए इथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। मंत्रालय के मुताबिक चीनी की कीमतों में हालिया उछाल को इथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से गलत है।
‘अक्टूबर तक पर्याप्त है चीनी का स्टॉक’
सरकार के मुताबिक मौजूदा चीनी उत्पादन अनुमान से कम रहने के बावजूद देश में इतना स्टॉक मौजूद है कि अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा किया जा सके।
सरकार पहले ही चीनी की जमाखोरी और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के लिए कदम उठा चुकी है। 1 अगस्त 2026 से देशभर में चीनी कारोबारियों के लिए स्टॉक होल्डिंग लिमिट लागू की गई है, जो 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगी। इसका उद्देश्य जमाखोरी रोकना, बाजार में लगातार आपूर्ति बनाए रखना और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है।
आखिर चीनी महंगी क्यों हुई?
सरकार के अनुसार कीमतों में मौजूदा तेजी के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं..
1. उम्मीद से कम घरेलू चीनी उत्पादन
2. त्योहारों के मौसम से पहले मांग में बढ़ोतरी
3. मौसम की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान
4. वैश्विक स्तर पर चीनी की सप्लाई में कमी
5. बाजार के कुछ हिस्सों में सट्टेबाजी और जमाखोरी
यानी सरकार का कहना है कि इसे सिर्फ इथेनॉल उत्पादन से जोड़कर देखना सही नहीं है।
वैश्विक बाजार में भी बढ़ रही चीनी की कीमत
सरकार ने बताया कि चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी केवल भारत की समस्या नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की आपूर्ति पर दबाव है और वैश्विक स्तर पर कीमतों में तेजी देखी जा रही है। ऐसे में घरेलू बाजार पर भी इसका असर पड़ रहा है।
इथेनॉल पर सरकार की सफाई क्यों अहम है?
चीनी उद्योग में गन्ने और उससे बने उत्पादों का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में भी होता है। इसी वजह से यह सवाल उठ रहा था कि क्या इथेनॉल के लिए चीनी/गन्ने के डायवर्जन से घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हुई और कीमतें बढ़ीं। सरकार का तर्क है कि मौजूदा कीमत वृद्धि को सीधे इथेनॉल डायवर्जन से जोड़ना सही नहीं है।



